खराब प्लास्टिक बोतलों का अनूठा उपयोग कर शहडोल जिले के स्व-सहायता समूह की महिलाओं ने एक ऐसी मिसाल पेश की है, जिसकी चर्चा अब पूरे प्रदेश में हो रही है। शहडोल जिले में महिलाओं ने बेकार प्लास्टिक बोतलों से ड्रिप इरिगेशन सिस्टम तैयार कर न केवल जल संरक्षण की दिशा में कदम बढ़ाया है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का भी संदेश दिया है।
कचरे से क्रांति की शुरुआत
शहडोल जिले के अमरहा गांव की कुसुम बाई और छतवई गांव की शशि तिवारी अपने घरों में छोटे पौधों की सिंचाई अब बोतल ड्रिप इरिगेशन सिस्टम से कर रही हैं। उनका कहना है कि स्व-सहायता समूह की महिलाओं ने यह संकल्प लिया है कि फेंकी जाने वाली प्लास्टिक बोतलों को कचरा बनने के बजाय उपयोगी बनाया जाए।
खेती और पर्यावरण दोनों को फायदा
महिलाओं के अनुसार, बोतल ड्रिप इरिगेशन के कई लाभ हैं। इससे पौधों को बूंद-बूंद पानी मिलता है, जो सीधे जड़ों तक पहुंचता है और लंबे समय तक नमी बनाए रखता है। पारंपरिक सिंचाई की तुलना में इसमें पानी की बर्बादी बेहद कम होती है।
इसके साथ ही, प्लास्टिक कचरे का पुनः उपयोग होने से पर्यावरण प्रदूषण भी कम होता है। इस प्रकार यह पहल जल संरक्षण और कचरा प्रबंधन दोनों क्षेत्रों में प्रभावी साबित हो रही है।
30 हजार से अधिक ड्रिप सिस्टम तैयार
मध्य प्रदेश राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत जिले में महिलाओं ने जल संरक्षण की दिशा में अनूठी पहल की है। जल गंगा संवर्धन अभियान के दौरान महिलाओं ने खेतों, घरों और सड़कों पर फेंकी गई प्लास्टिक बोतलों को एकत्र कर कम लागत वाला ड्रिप सिस्टम तैयार किया। अब तक जिले की लगभग 5 हजार महिलाओं ने अपने प्रयासों से 30 हजार से अधिक बोतल ड्रिप इरिगेशन मॉडल तैयार किए हैं, जिनकी व्यापक सराहना हो रही है।
ऐसे तैयार किया गया बॉटल ड्रिप सिस्टम
ड्रिप सिस्टम बनाने के लिए सबसे पहले प्लास्टिक बोतलों को एकत्र किया गया। इसके बाद पौधों के पास लकड़ी का स्टैंड बनाकर बोतलों को बांधा गया। बोतलों का ऊपरी हिस्सा काटकर नीचे ढक्कन में छोटा छेद किया गया, जिससे पानी धीरे-धीरे बूंदों के रूप में निकलता रहे।
जहां पानी का प्रवाह अधिक था, वहां उसे नियंत्रित करने के लिए रुई (कॉटन) का उपयोग किया गया।
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बारिश में भी करेगा काम
महिलाओं का कहना है कि बारिश के दौरान बोतलों में स्वतः पानी भर जाएगा और धीरे-धीरे पौधों की सिंचाई होती रहेगी। इससे जल संरक्षण के साथ खेती को भी लाभ मिलेगा। यही वजह है कि अब जिले के कई किसान स्वयं इस तकनीक को अपना रहे हैं।
जिलेभर में विस्तार की तैयारी
• जिला पंचायत सीईओ शिवम प्रजापति के अनुसार, पहले किसान फ्लड इरिगेशन या पाइप से सिंचाई करते थे, जिससे बड़ी मात्रा में पानी बर्बाद होता था। महिलाओं ने स्वयं पानी बचाने के लिए यह अभिनव प्रयोग शुरू किया।
• उन्होंने बताया कि प्लास्टिक बोतल को ऊपर से काटकर पौधे के पास बांधा जाता है और नीचे कॉटन लगाकर पानी की गति नियंत्रित की जाती है। इससे पानी सीधे पौधे की जड़ों तक पहुंचता है और अनावश्यक बर्बादी रुकती है।
• सीईओ ने कहा कि जिले में इस मॉडल के विस्तार की व्यापक संभावनाएं हैं और इसे आगे भी अभियान के रूप में जारी रखा जाएगा। हालांकि यह तकनीक मुख्य रूप से छोटे पौधों के लिए अधिक उपयोगी है।
पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय
छोटे पौधों के लिए विकसित यह ड्रिप इरिगेशन मॉडल अब पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बन गया है। गर्मी के मौसम में यह लंबे समय तक नमी बनाए रखता है, जबकि बारिश के दौरान जल संरक्षण में भी मदद करता है। इससे भूजल स्तर सुधारने और प्लास्टिक कचरे के पुनः उपयोग को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।
स्व-सहायता समूह की महिलाओं का कहना है, "हमारा छोटा सा प्रयास आने वाली पीढ़ियों के लिए मिसाल बनेगा। जो प्लास्टिक बोतलें कचरा बन जाती थीं, वे आज फसलों की सिंचाई में उपयोग हो रही हैं। हम कचरे से क्रांति लाएंगे और बूंद-बूंद से हर पौधे को बचाएंगे।"
सन्दर्भ स्रोत/छाया : ईटीवी
सम्पादन : मीडियाटिक डेस्क



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