जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट : तलाक मामलों में

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जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट : तलाक मामलों में
फैसले से पहले सुलह की कोशिश जरूरी

जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने कहा है कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत दायर वैवाहिक याचिकाओं पर सुनवाई करने वाली अदालतों का पहला दायित्व सुलह की संभावना तलाशना है। अदालत ने स्पष्ट किया कि धारा 23(2) और सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC), 1908 के ऑर्डर 32-A की भावना के अनुसार, समझौते का प्रयास किए बिना पक्षकारों से जवाब या आपत्तियां दाखिल करने पर जोर नहीं दिया जा सकता।

जस्टिस राहुल भारती की सिंगल बेंच ने कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 23(2) के तहत वैवाहिक विवाद को सुलझाने या समझौते की संभावना तलाशने की कोशिश किए बिना सांबा के प्रिंसिपल डिस्ट्रिक्ट जज की अदालत ने प्रतिवादी से जवाब और आपत्तियां मांगकर प्रक्रिया में त्रुटि की। अदालत ने कहा कि प्रतिवादी से जवाब दाखिल कराने पर जोर देने से पति-पत्नी के बीच तनावपूर्ण संबंधों में सुधार नहीं होगा। इसलिए अदालत को पहले सुलह या मध्यस्थता का प्रयास करना चाहिए और उसके विफल होने पर ही तलाक की याचिका पर आगे की कार्यवाही करनी चाहिए।

मामले की पृष्ठभूमि

मामले में वैवाहिक संबंधों में खटास आने के बाद प्रतिवादी ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 के तहत प्रिंसिपल डिस्ट्रिक्ट जज, सांबा की अदालत में तलाक की याचिका दायर की। इसके बाद याचिकाकर्ता को समन जारी किया गया और वह अपने वकील के माध्यम से अदालत में पेश हुई।

याचिकाकर्ता का आरोप था कि निचली अदालत ने सुलह या समझौते का कोई प्रयास किए बिना और CPC के ऑर्डर 32-A की भावना की अनदेखी करते हुए उससे जवाब और आपत्तियां दाखिल करने को कहा। अदालत ने जवाब दाखिल करने का अंतिम अवसर भी दिया और चेतावनी दी कि ऐसा न करने पर जवाब दाखिल करने का अधिकार समाप्त माना जाएगा।

इस प्रक्रिया से असंतुष्ट होकर याचिकाकर्ता ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

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हाईकोर्ट की टिप्पणी

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने सबसे पहले निचली अदालत के आदेश में पदनाम संबंधी प्रक्रियागत त्रुटि पर ध्यान दिया। अदालत ने कहा कि आदेश 'प्रिंसिपल सेशंस जज, सांबा' के पदनाम से पारित किया गया, जबकि हिंदू विवाह अधिनियम के तहत वैवाहिक मामलों की सुनवाई प्रिंसिपल डिस्ट्रिक्ट जज के अधिकार क्षेत्र में आती है। इसलिए आदेश पर 'प्रिंसिपल डिस्ट्रिक्ट जज, सांबा' का पदनाम होना चाहिए था।

अदालत ने रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया कि सभी अधीनस्थ सिविल और आपराधिक अदालतों के पीठासीन अधिकारियों को उनके अधिकार क्षेत्र के अनुरूप सही पदनाम का उपयोग करने के संबंध में आवश्यक निर्देश जारी किए जाएं।

सुलह का प्रयास अनिवार्य

मुख्य मुद्दे पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 23(2) अदालत पर यह दायित्व डालती है कि वह तलाक की याचिका पर सुनवाई शुरू करने से पहले पक्षों के बीच सुलह कराने का हरसंभव प्रयास करे।

अदालत ने सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के ऑर्डर 32-A का भी उल्लेख किया, जिसके अनुसार परिवार से जुड़े मामलों में अदालत को परिस्थितियों के अनुरूप पहले पक्षकारों के बीच समझौता कराने का प्रयास करना चाहिए।

हाईकोर्ट ने पाया कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई आदेश नहीं था, जिससे यह स्पष्ट हो कि निचली अदालत ने सुलह की संभावना पर विचार किया हो। अदालत ने कहा कि प्रतिवादी से जवाब दाखिल कराने पर जोर देने का अर्थ है कि वह पहले आरोपों का जवाब दे, जबकि इस स्तर पर प्राथमिकता सुलह होनी चाहिए।

हाईकोर्ट का निर्देश

इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने अपने पर्यवेक्षी अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करते हुए याचिका का निपटारा किया। अदालत ने प्रिंसिपल डिस्ट्रिक्ट जज, सांबा को निर्देश दिया कि वह पहले सुलह या मध्यस्थता की प्रक्रिया शुरू करे। यदि यह प्रयास विफल हो जाए, तभी मामले के गुण-दोष के आधार पर सुनवाई आगे बढ़ाई जाए और उसके बाद ही प्रतिवादी को तलाक की याचिका पर अपना जवाब या आपत्तियां दाखिल करने का अवसर दिया जाए।

अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि आदेश की प्रति प्रिंसिपल डिस्ट्रिक्ट जज, सांबा तथा हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को भेजी जाए, ताकि इसे सभी अधीनस्थ न्यायिक अधिकारियों के बीच प्रसारित किया जा सके।

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