आदिवासियों के उत्थान के लिए प्रतिबद्ध सीमा प्रकाश

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आदिवासियों के उत्थान के लिए प्रतिबद्ध सीमा प्रकाश

छाया : स्व सम्प्रेषित 

• सीमा चौबे

खंडवा जिले के खालवा आदिवासी अंचल में कोरकू आदिवासी महिला और बच्चों के उत्थान के लिए काम करने वाली समाजसेवी सीमा प्रकाश किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं। केवल आदिवासी ही नहीं, शहरी बुद्धिजीवी वर्ग भी उनकी सराहना करता है क्योंकि उन्होंने अपना जीवन कोरकू महिलाओं और बच्चों के जीवन को बेहतर बनाने में लगा दिया है। सीमा ने न केवल उन्हें स्वास्थ्य के प्रति जागरूक किया, बल्कि उन्हें पारंपरिक अनाज की खेती के लिए भी प्रेरित किया। करीब 16 वर्ष से इस समुदाय के लिए काम कर रही सीमा ने अंचल की कई लड़कियों को आत्मनिर्भर भी बनाया है। उनके प्रयासों का ही नतीजा है कि पुरुषों के कार्यक्षेत्र वाले कठिन कार्यों को भी ये युवतियां कुशलता से अंजाम दे रही हैं। उनके लिए काम करने के लिए उन्हें राष्ट्रपति पुरस्कार से भी नवाज़ा जा चुका है।

सीमा का जन्म 4 जुलाई 1966 में कानपुर में हुआ। उनके पिता श्री राम बिहारी मिश्रा कानपुर नगर निगम में बाबू थे और माँ श्रीमती प्रेमा मिश्रा गृहिणी। चार भाई बहनों में सबसे बड़ी सीमा की शिक्षा कानपुर से हुई। उन्होंने कानपुर महिला महाविद्यालय से संगीत (गायन) विषय से ग्रेजुएशन किया। एनसीसी की स्टूडेंट सीमा खेलकूद में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती थीं। उनकी माँ का स्वर बहुत अच्छा था और वे बहुत अच्छा गाती थीं, सामाजिक उत्सवों में उनके गीतों की सराहना हुआ करती थी। सीमा के नाना स्व. मोतीलाल तिवारी ढोलक-वादक, गायक और रंगकर्मी थे, वे मंचीय प्रस्तुतियां दिया करते थे। प्रेमा जी को अपने पिता से ही गायन की प्रेरणा मिली। हालांकि उनके पति को उनका इस तरह गाना पसंद नहीं था तो प्रेमा जी ने धीरे-धीरे गाना छोड़ दिया। लेकिन वे चाहती थीं कि उनकी बेटी संगीत सीखे। सीमा जी का संगीत के प्रति प्रेम भी मां के कारण ही उपजा, संगीत उनका प्रिय विषय था, लेकिन जैसे-जैसे बड़ी हुईं, उनका मन समाजसेवा में रमने लगा। कारण - वे बचपन से ही अपने पिताजी को जरुरतमंदों की मदद करते देखती रहीं, नगर निगम के अनेक सफाई कर्मचारी, जो उनके पिताजी के अधीनस्थ थे और अत्यंत दयनीय स्थिति में होते थे, उनकी सहायता के लिए उनके पिताजी हमेशा खड़े रहते। सीमा बताती हैं उनके ज़रूरत का जो भी सामान घर में उपलब्ध होता पिताजी बिना सोचे समझे, उन्हें उठाकर दे दिया करते। हालांकि हमारी खुद की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी। इसके अलावा पिताजी छुआछूत की भावना से भी कोसों दूर थे, वे उन्हें ससम्मान घर में साथ में बैठाकर भोजन कराते, यहाँ तक कि उनके लिए कोई अलग से बर्तन भी नहीं होते थे, जबकि उस समय भी अधिकांश लोग इन मेहनतकशों को छूते तक नहीं थे। कई बार तो एक साथ 10-15 लोगों के लिए माँ  को खाना बनाना पड़ता।  

सीमा बताती हैं शुरू-शुरू में मुझे यह सब अच्छा नहीं लगता था। इसलिए एक बार मैंने पिताजी से गुस्से में कह दिया “आप तो नरक निगम में काम करते हैं”। उस दिन पिताजी ने जो फटकार लगाई, वह मुझे आज तक याद है। इसके बाद उन्होंने सभी बच्चों को साथ में बैठाया और समझाया कि हर इंसान एक समान है और हमें अपनी सामर्थ्य के अनुसार उनकी मदद के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए। उस दिन के बाद सीमा के भीतर भी समाज सेवा की कुछ-कुछ समझ पैदा होने लगी। इस घटना के बाद वे अपने आसपास जब ऐसे लोगों को देखती तो उनकी हर संभव मदद किया करती।

सामान्य परिस्थिति के बावजूद सारा परिवार हमेशा खुश रहता था, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था तभी सीमा के ग्रेजुएशन करने से पहले ही वर्ष 1984 में उनके पिताजी अचानक चल बसे। इस घटना के बाद उनकी माँ गहरे अवसाद में चली गईं, जिसके चलते अनुकम्पा नियुक्ति भी उन्हें नहीं मिल सकी। उनका लम्बा उपचार चला। चूंकि सीमा सभी भाई बहनों में बड़ी थीं, तो सारी ज़िम्मेदारियां उनके कंधों पर आ गईं और आगे की पढ़ाई उन्हें प्राइवेट करना पड़ी। उस समय सीमा मात्र 19 वर्ष की थीं। उन्हें परिवार की जिम्मेदारियों के साथ अपनी माँ को भी सम्हालना पड़ा। भाई बहन सब छोटे थे और सभी की पढ़ाई चल रही थी। कई तरह की परेशानियों का सामना करते हुए जब  घर चलाना मुश्किल होने लगा तो सीमा ने कानपुर के बाल श्रमिक विद्यालय में बतौर शिक्षक कार्य करना शुरू किया। उस समय उनके कॉलेज के संगीत शिक्षक सीमा को घर पर आकर अभ्यास करा दिया करते थे, इस तरह सीमा ने स्नातक की पढ़ाई पूरी की।
इसी स्कूल में उन्हें अभ्युदय संस्थान के ‘चाइल्ड लेबर’ प्रोजेक्ट पर काम करने का अवसर मिला। वर्ष 1997-98 में कानपुर में ही इसी काम से जुड़े प्रकाश जी से सीमा की मुलाकात हुई और दोनों साथ मिलकर काम करने लगे। इसी बीच धार जिले के पटवारी प्रदीप साकल्ले - जो सरकारी कार्यक्रमों से जुड़े थे, ने सीमा से सम्पर्क किया और मध्यप्रदेश में आदिवासियों के लिए काम करने की सलाह दी। उनके कहने पर सीमा और प्रकाश दोनों वर्ष 2000 में धार आ गये। यहाँ उन्होंने दलित-आदिवासी महिलाओं के लिए काम करना शुरू किया। उस समय प्रदेश में दलित और आदिवासी अत्यंत दयनीय स्थिति में थे।

वर्ष 2002 में सीमा और प्रकाश ने मिलकर ‘स्पन्दन’ समाज सेवा समिति का रजिस्ट्रेशन करवाया और 2003 से संस्था ने विधिवत कार्य करना शुरू किया। उसी समय सीमा को 'राईट टू फ़ूड' कैम्पेन के लिए ‘एक्शन एड’ से फैलोशिप (2004)  मिली, जिसके तहत उन्हें तीन जिलों - खंडवा, धार और बड़वानी में सार्वजनिक वितरण प्रणाली की विसंगतियों और कुपोषण से होने वाली मौतों पर काम करना था लेकिन यह काम इतना आसान नहीं था, क्योंकि हिस्सेदारी हर जगह बंटी थी।

खंडवा जिले के खालवा ब्लॉक में कुपोषण से बच्चों की लगातार मौत के मामले में सीमा प्रकाश ने अन्य सामाजिक संस्थाओं के साथ मिलकर इस मुद्दे को उठाते हुए जबलपुर हाईकोर्ट में जनहित याचिका लगाकर जीत हासिल की। इस लड़ाई के बाद प्रदेश सरकार ने बच्चों में कुपोषण होना स्वीकार करते हुए उनके स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता दिखाई। सीमा बताती हैं कि आवाज उठाए जाने के बाद ही सरकार ने प्रदेश भर में पुनर्वास केंद्र खोलने शुरू किए। खालवा ब्लॉक में आंगनबाड़ियां और पुनर्वास केंद्र खोले गए। इससे काफी हद तक व्यवस्थाओं में सुधार आया।

पारंपरिक अनाज बचाने शुरू किया बीज बैंक, गांव-गांव चलाया अभियान

वर्ष 2006-07 में उन्होंने कोरकू समाज के लिए काम शुरू किया। सबसे पहले सीमा ने मोटे अनाजों (मिलेट्स) का अध्ययन किया और वर्ष 2013-14 में झोली अभियान गांव-गांव में चलाकर मोटा अनाज एकत्रित करना शुरू किया। लगभग ढाई क्विंटल बीज इकट्ठा  करने के बाद खालवा के बाराकुड, बावडिया, बिचपुरी, रेहटिया में परंपरागत अनाज के बीज बैंक स्थापित किये। शुरुआत में खेती करने के लिए  कोरकू समाज के करीब 100  लोगों को 50 किलो सात  प्रकार के अनाज (कोदो, कुटकी, सवा, भादली, राला, लड़गया, जुवार) बांटे। आज तीन हजार से अधिक किसान मोटे अनाज की खेती कर रहे हैं। सीमा के प्रयासों से ही आदिवासी क्षेत्रों में अब कोदो-कुटकी के प्रति जनजातीय समुदाय का लगाव बढ़ा है, इतना ही नहीं, धीरे-धीरे मोटे अनाजों का उत्पादन भी बढ़ने लगा है। सीमा कहती हैं  "अब हमारा प्रयास इन किसानों के उत्पादों को समर्थन मूल्य पर खरीदी करवाना है। ताकि प्रोत्साहित होकर क्षेत्र के सभी किसान केवल मोटे अनाज की ही खेती करे। इस हेतु हम सरकार के सतत संपर्क में हैं।"

घर-घर पहुंच रहा पोषण आहार

कोरोनाकाल में आंगनबाड़ी केंद्र बंद होने से खालवा ब्लॉक के कुपोषित बच्चों तक पोषण आहार नहीं पहुंच पाया। ऐसे में सीमा की संस्था 'स्पंदन' समाज सेवा समिति ने आदिवासी बच्चों की विशेष देखभाल की। इतना ही नहीं, कुपोषण के दायरे में आने वाले बच्चों को पोषण आहार के लिए खाद्यान्न के पैकेट अब हर महीने संस्था द्वारा पहुंचाए जा रहे हैं। इस पैकेट में दो किलो चना, दो किलो तुवर, दो किलो चावल, एक लीटर तेल, एक किलो मूंगफली, आधा किलो गुड़, एक किलो दलिया दिया जा रहा है। सीमा कहती हैं - मोटा अनाज कुपोषण की लड़ाई में हमारा हथियार बना है। लोगों को इनके फायदों के बारे में लगातार जागरूक किया जाता रहा है। खंडवा जिले के लोग कुपोषण से लड़ने के लिए कोदो कुटकी और मक्के का सेवन कर रहे हैं।

मुश्किल भरा रहा दलित महिलाओं के लिए काम करना

जब सीमा ने धार और खंडवा जिले में चमड़ा निकालने वाली दलित महिलाओं के लिए काम करना शुरू किया, तो इसका बड़ा विरोध हुआ, कारण था छूआछूत। लोग कहते अगर आप उनकी बस्ती में जायेंगी तो हमारी बस्ती में कदम भी नहीं रखना। उन्हें रोकने के लिये पेट्रोल से जलाने की धमकी तक दी गई। लेकिन सीमा अपने इरादों पर अडिग रहीं और अपना काम करती रहीं। सीमा बताती हैं चमड़ा नहीं मिलने के कारण आदिवासी महिलाओं को रोज काम नहीं मिलता था जिसके कारण वे वेश्यावृत्ति में भी लिप्त थीं। उन्हें उस दलदल से निकालना हमारे लिए बड़ी चुनौती थी। संयोग से उसी समय में ‘स्पन्दन’ को एक सरकारी प्रोजेक्ट ‘पढ़ना-बढना’ के लिए काम मिल गया। ख़ास बात यह रही कि उन्हें उसी दलित बस्ती में काम करने को मिला। 

यहाँ उन्होंने दलित-आदिवासी महिलाओं को संगठित करना शुरू किया। उन्हें अनार-आम नहीं पढ़ाया, बल्कि उनके अधिकारों के प्रति जागरूक किया। उन्हें पंचायत के जरिये काम  दिलाया गया। लेकिन काम दिलवाने के साथ ही दूसरी समस्या खड़ी हो गई उन्हें न्यूनतम मजदूरी देने के लिए कोई तैयार नहीं था। उन्हें काम के बदले कम मजदूरी दी जाती जिसका सीमा और साथियों ने विरोध किया तो सरपंच से लेकर उच्च अधिकारी तक उनके खिलाफ खड़े हो गए। उस दौरान उन्हें डराने के लिए घर पर तोड़फोड़, नारेबाजी और अन्य कई घटनाक्रम चले। एक बार लोगों ने उन्हें थाने में ही घेर लिया। तब थानेदार ने कहा - “मैडम, आप इनके साथ मिलकर ही काम कर सकती हैं, नहीं तो गांधी जी की तरह मरने के लिए तैयार रहिये। ये लोग आपको ईमानदारी से यहाँ काम करने नहीं देंगे”। बहरहाल, सीमा उन महिलाओं को उनका अधिकार दिलाकर उन्हें उस दलदल से बाहर निकालने में कामयाब रहीं।

मैकेनिक और पशु सखी बनाकर लड़कियों को बनाया आत्मनिर्भर

सीमा ने अपने प्रयासों से खालवा ब्लॉक की लड़कियों को पलायन करने से भी रोका है। दरअसल यहाँ की लड़कियां शहरों और आसपास के क्षेत्रों में मजदूरी करने को विवश थीं लेकिन कोरोना काल में उनके सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया। ऐसे समय में सीमा उनके लिए आशा की एक उम्मीद बनकर आईं उन्होंने इन लड़कियों को मोटर सायकल मैकेनिक का प्रशिक्षण देकर उन्हें अपने पैरों पर खड़ा किया। सीमा कहती हैं कि मोटर-सायकल गैराज का काम सिखाते हुए मैंने सोचा नहीं था कि ये लड़कियां इस काम में इतनी माहिर हो जायेंगी। आज 50 लड़कियां बखूबी अपना गैराज चला रही हैं। ख़ास बात यह रही कि उन्होंने सभी लड़कियों को खंडवा में अपने घर में ही रखकर स्थानीय मैकेनिक ‘लड्डू भाई’ से यह प्रशिक्षण दिलवाया। खालवा में एक गैराज का रिनोवेशन भारत पेट्रोलियम के सहयोग से हुआ है। बाकी गाँव-गाँव में झोपड़ीनुमा गैराज हैं जिन्हें लड़कियां चलाती हैं। इस तरह उन्होंने जिले के करीब 30 पिछड़े गाँवो की 50 युवतियों को रोज़गार से जोड़ा है।

इन लड़कियों के अलावा अन्य युवतियों को लखनऊ के 'द गोट ट्रस्ट' के माध्यम से पशु सखी की ट्रेनिंग दिलाई गई। इसके पीछे सीमा की सोच थी कि यहाँ मुर्गी-बकरी पालन बहुतायात से होता है, लेकिन इनके बीमार पड़ने पर यहाँ कोई पशु चिकित्सक नहीं आता। आज यहाँ 38 लड़कियां पशु सखियाँ हैं। इन सखियों को आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराए गए, ताकि वे मुर्गियां और बकरियों का इलाज कर सकें। ये पशु सखियां अब 3 सौ से 4 सौ रुपये प्रतिदिन कमा लेती हैं।

कोरकू भाषा संरक्षण के प्रयास

स्पन्दन समाज सेवा समिति विलुप्त हो रही कोरकू भाषा के संरक्षण और संवर्धन के लिए भी प्रयासरत है। सीमा बताती हैं कि कोरकू भाषा का लिखित दस्तावेज उपलब्ध नहीं है। यह भाषा मौखिक आम बोलचाल तक ही सीमित है। कोई लिपि नहीं होने से इसे देवनागरी में लिखा जा रहा है। इतिहास, रीति रिवाज़, भाषा और जीवन के कई पहलुओं पर शोध कर दस्तावेज तैयार किये हैं। संस्था द्वारा आंगनबाड़ी तथा स्कूल पूर्व शिक्षा के लिए नवाचार के तहत कोरकू भाषा में अनेक चार्ट और पोस्टर तैयार किये गए हैं। कोरकू भाषा में बारहखड़ी तैयार की है। स्पन्दन यह काम इसी समुदाय से पढ़े-लिखे बच्चों के साथ मिलकर कर रही है। आदिवासियों के बच्चे ही अपने आसपास के 10-10 गाँव सम्भाल रहे हैं।

पुरस्कार/ सम्मान

आदिवासी महिला और बच्चों के उत्थान तथा समाजसेवा में उत्कृष्ट कार्य के लिए सीमा अनेक पुरस्कारों से नवाज़ी जा चुकी हैं। उन्हें वर्ष 2014-15 में कुपोषित बच्चों के पालकों में जागरूकता लाने और उन्हें सही पोषण आहार उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने पर महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की ओर से तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी 'स्त्री शक्ति' पुरस्कार सम्मानित कर चुके हैं। इसके अलावा वर्ष 2006 में Alex Bhopal diocese फादर अलेक्स मेमोरियल अवार्ड, दुनिया की अग्रणी संस्था असोका इंटरनेशनल द्वारा वर्ष 2006 में असोका फैलोशिप प्राप्त हुई (इसमें पूरे विश्व से समाजसेवा के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वाले लोगों का चयन किया जाता है ), इंदिरा गांधी बिजनेस काउन्सिल, दिल्ली द्वारा इंदिरा गांधी सद्भावना अवार्ड (2015), कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा नेशनल सीएसआर अवार्ड, बैंगलोर (2015), कल्याणी संस्था- झाबुआ द्वारा कल्याणी अवार्ड (2017)  से भी सम्मानित किया जा चुका है।

7-8 वर्ष साथ में काम करने के बाद सीमा और प्रकाश जी वर्ष  2011 में परिणय सूत्र में बंध गए। सीमा कहती हैं कि संतान के रूप में हमें ईश्वर ने आदिवासी अंचल के ढेर सारे बच्चों की सौगात दी है, जिनका भविष्य संवारना ही जीवन का उद्देश्य है। सीमा वर्तमान में मोटे अनाज के जरिये आदिवासियों के जीवन की दिशा बदलने, मिलेट्स उत्पादन के लिए उन्हें उनका वाजिब मूल्य दिलाने और कोरकू समाज को प्राचीन जनजाति का दर्जा दिलाने के लिए प्रयासरत हैं। वे कहती हैं अगर इस समाज को प्राचीन जनजाति  समाज में शामिल कर लिया जाता है तो न सिर्फ इसका दस्तावेज तैयार होगा, बल्कि  उन्हें अपना हक़ भी मिलेगा। आदिवासी परिवारों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए तरह-तरह के उद्योगों का संचालन भी खालवा विकासखंड में संस्था द्वारा कराया जा रहा है। अभी श्योपुर, शिवपुरी और खंडवा जिले में किचन गार्डन, मुर्गी पालन, बकरी पालन, आंगनबाड़ियों के उन्नयन को लेकर काम चल रहा है।  

सन्दर्भ स्रोत : सीमा चौबे की सीमा प्रकाश से हुई बातचीत पर आधारित 

© मीडियाटिक

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