वीणा जैन : चित्रकला पढ़ी और पढ़ाई भी, बन गईं मशहूर कलाकार

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वीणा जैन : चित्रकला पढ़ी और पढ़ाई भी, बन गईं मशहूर कलाकार

छाया: वीणा जैन के फेसबुक अकाउंट से 

• सारिका ठाकुर 

कलाकारों के बारे में आम धारणा यह है कि वे जन्मजात होते हैं, वे बनाए नहीं जाते। लेकिन असल बात तो मिली-जुली सी होती है। यानी हर बच्चा एक बीज लेकर पैदा होता है और उचित खाद पानी मिलते ही वह अंकुरित हो जाता है, जिसे वह खाद पानी नहीं मिलता उसे शायद कभी पता भी नहीं चल पाता कि वह क्या लेकर पैदा हुआ था।  

चित्रकार वीणा जैन इस बात की आदर्श उदाहरण हैं। उनका जन्म 4 जुलाई 1961 में उज्जैन में हुआ। उनके पिता श्री राजमल जैन बैंक में सेवारत थे और माँ श्रीमती विभा जैन, परिवार के लिए समर्पित गृहणी। सात भाई-बहनों में तीसरे स्थान पर जन्मी वीणा का बचपन खुशहाल था। जैन परिवार में बेटे की ख्वाहिश में पांच बेटियां हो गईं, इसके बावजूद वहां लड़का-लड़की का भेद नहीं था। सभी बच्चों को पढ़ने-लिखने,हंसने- खेलने के भरपूर मौके मिले और साथ ही दादी और नानी का प्यार भी क्योंकि दोनों साथ रहती थीं। बच्चे बड़े हुए तो उनके बीच घर की जिम्मेदारियां बराबरी से बांटी गयीं। लड़कियां घरेलू कामकाज संभालतीं तो लड़के बाज़ार और बाहर के दूसरे कामों में हाथ बंटाते।

वीणा जी की प्रारंभिक शिक्षा नूतन माध्यमिक विद्यालय उज्जैन से हुई। जब वे पांचवी-छठवीं में थीं तभी उन्होंने सुप्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता और चित्रकार डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर की चित्रकला की कक्षा में जाना शुरू कर दिया था। वरिष्ठ जन वहां जो चित्र बनाते, उनका अनुकरण करते हुए उन्होंने अपनी शुरुआत की। उस दौरान वाकणकर जी भीम बैठका और सरस्वती नदी की खोज जैसे अभियानों में जुटे हुए थे। लेकिन वे जब भी उज्जैन आते, हर बच्चे के बनाए हुए चित्रों को ज़रूर देखते थे। वीणा जी बताती हैं कि डॉ साहब हमारे चित्रों को देखने के बाद पीठ पर एक जोरदार धौल जमाते थे और कहते थे, ‘ये रहा तुम्हारा झम्मक लड्डू।.” हर बच्चे को उनके ‘झम्मक लड्डू’ का इंतज़ार रहता था।

इसके बाद उनका दाखिला विजयाराजे सिंधिया गर्ल्स स्कूल में हुआ, जहां नौवीं में में ऐच्छिक विषय का चुनाव करना था। वीणा जी ने ‘चित्रकला’ का चुनाव किया। अब स्कूल और वाकणकर जी की कक्षा - दोनों जगहों पर उन्हें कला की बारीकियों को सीखने का अवसर मिला। वाकणकरजी की कक्षाओं में अब वे कक्षा से नज़र आने वाले चौराहे के दृश्यों को देख देखकर चित्र बनाने लगी थीं। 1977 में हायर सेकेंडरी के बाद उनका दाखिला गर्ल्स डिग्री कॉलेज, उज्जैन में हुआ। वहां उन्होंने विषय के तौर पर चित्रकला, सितार और राजनीति विज्ञान लिया। वीणा जी कहती हैं, “हालाँकि राजनीति विज्ञान का चित्रकला और सितार से कोई लेना देना नहीं है, लेकिन पढ़ाई में औसत विद्यार्थी होने के नाते मुझे लगा कि मैं सितार को निभा लूंगी और राजनीति विज्ञान में बड़ी बहन - जो यही विषय लेकर पढ़ रही थीं, से मदद मिल जाएगी।

तब तक आगे क्या करना है, किस क्षेत्र में जाना है जैसी कोई सोच भी नहीं थी और इसी तरह 1980 में ग्रेजुएशन और 1982 में पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी हो गयी। यह ज़रुर था कि पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई फ़ाइन आर्ट लेकर ही उन्होंने की और वह भी विक्रम विश्वविद्यालय की प्रावीण्य सूची में दूसरे स्थान के साथ। पढ़ाई पूरी होने के बाद उन्होंने गर्ल्स डिग्री कॉलेज में चित्रकला की कक्षाएं लेना शुरू कर दिया लेकिन यह कोई नियमित नौकरी नहीं थी। बस थोड़े बहुत पैसे मिल जाते थे।

जुलाई 1983 में उनकी शादी हो गई और वे उज्जैन छोड़कर भोपाल आ गईं। उनके पति बैंक में काम करते थे। उनकी माताजी (सास) का निधन हो चुका था अतः घर की सारी जबावदारियों को भी उन्हें निभाना पड़ा। उनके घर में पति के तीन छोटे भाई, एक बहन और पिता श्री शीलचंद जैन थे जो अपने जमाने के मशहूर चित्रकार थे एवं वे शासकीय स्कूल में प्रिंसिपल थे। वे चाहते थे कि उनके घर एक  चित्रकार बहू आए। लिहाजा यह शादी उन्हीं की पसंद से हुई थी, वे वीणा जी की कला से बहुत प्रभावित थे।  करीब एक साल के बाद बड़ी बिटिया का जन्म हुआ। ससुर और पति को भान था कि घर में बहू बनकर एक कलाकार आई है, इसलिए वे बीच बीच में चित्र बनाने के लिए प्रोत्साहित भी करते। वीणा जी समय-समय पर चित्र बनातीं, लोगों को उपहार में देतीं और लोग तारीफ करते। उनके पारिवारिक जीवन में कोई कमी नहीं थी लेकिन एक किस्म के खालीपन का एहसास उन्हें होने लगा। वे कहती हैं, ऐसा कभी नहीं हुआ कि रंग और कूची मेरे हाथ से छूट गई हो लेकिन उसका जिस तरह विस्तार होना चाहिए वह नहीं हो रहा था और यही मेरी बेचैनी का कारण था।
 

वीणा जी महारानी लक्ष्मीबाई कॉलेज भोपाल में चित्रकला विभाग में लगभग आठ महीने कक्षाएं लेती रहीं। लेकिन अधूरापन मन में बना रहा। बेचैनी इस कदर बढ़ी कि रात में उठ-उठ के बैठ जातीं। तब तक दूसरी बेटी का जन्म भी हो चुका था। इस बेचैनी से बचने के लिए उन्होंने घर में चित्रकला सिखाने का काम शुरू किया। छोटे बड़े सभी उम्र के लोग चित्रकला सीखने आने लगे।

भोपाल में ही एक चित्रकला शिविर के दौरान कुछ साथियों के सुझाव पर वे भारत भवन से जुड़ीं। वीणा जी के लिए भारत भवन से जुड़ना किसी उपलब्धि से कम नहीं था जहाँ दुनिया भर के चोटी के कलाकार आते-जाते रहते थे। उनके काम को देखना और समझना अपने आप में एक नई अनुभूति थी। उससे पहले वे ‘वास्तविक’ विषयों पर ही चित्र बनाती थीं लेकिन ‘एब्सट्रैक्ट’ को समझने का मौक़ा उन्हें वहीं मिला। वे काफी समय भारत भवन में गुजारतीं। उन दिनों श्री युसूफ रुपंकर कला के प्रभारी थे। वे कलाकारों को खूब सहयोग करते थे। ख़ास बात यह थी कि एक साथ अभ्यास करते हुए वहाँ सभी कलाकार अपने ख़ास शैली को विकसित कर रहे थे। वीणा जी ने भारत भवन में काम करते हुए अमूर्तन (एब्सट्रेक्ट) शैली को सीखा और रियलिस्टिक में गाँव में बने कच्चे घरों को अपने चित्र का विषय बनाया।

जब भारत और बाकी दुनिया में पर्यावरण की चिंता शुरू हुई और उसे जीवन शैली में शामिल किए जाने की ज़रुरत महसूस होने लगी तो वीणा जी को भी अहसास हुआ कि वे जिन चित्रों का निर्माण कर रही हैं, उसमें प्रयुक्त होने वाली सामग्री में कागज / कैनवास को छोड़कर अन्य सारी रंग सामग्री में रसायन शामिल हैं। उन्हें यह भी विचार आया कि पुरातन काल में गुफाओं में हमारे पूर्वजों ने जो चित्रकारी की थी उनमें जो रंग उन्होंने इस्तेमाल किए, वे तो आज भी सुरक्षित हैं। निश्चित ही वे रासायनिक रंग तो नहीं रहे होंगे ? आज भी देश के जनजातीय समुदाय अपने त्योहारों पर मांडने वगैरह बनाने या कपड़ों को रंगने के लिए प्राकृतिक रंगों का उपयोग करते हैं, तो क्यों न मैं भी रासायनिक रंगों के बजाय जैविक रंगों का उपयोग करूं। इस सोच के साथ उन्होंने चायपत्ती, कॉफ़ी, गुलाब, बबूल, हरसिंगार, प्याज, कत्था, मंजिष्ठा, नील, आंवला और टेसू जैसी चीज़ों से रंग जुटाना शुरू किया और कागज़- कैनवास पर उनका प्रयोग किया। शुरुआत में वे सशंकित थीं कि ये रंग लंबे समय तक सुरक्षित रहेंगे या नहीं, लेकिन 15-20 साल पुराने उनके चित्रों के रंग आज भी तरोताजा हैं।

उनके बनाए चित्रों की अब देश के कला जगत में एक अलग ही पहचान है। उनके अनेक चित्रों में रंगों की एक समानता के बावजूद उनकी विविधता पूर्ण गतियों के कारण हर बार उनके काम में एक गहराई दिखाई देती है। यद्यपि उनके चित्र अमूर्त रूप में है लेकिन वह चित्रता गुण से भरपूर हैं और उनमें मानव आकृति की उपस्थिति न होने के बावजूद उसमें उनमें एक मानवीय उपस्थिति की पहचान को महसूस किया जा सकता है। उनकी रंग सामग्री कहीं घनी गाढ़ी तो कहीं इतनी तरल भी है कि पानी की चमकती सतह बन सके और कई बार बादलों जितनी भारहीन भी। उनके द्वारा लगाए ब्रशों के आघात, रंगों के निर्देश से विलग नहीं है, बल्कि अक्सर रंग ही है, जो ब्रश की गतियां तय करते हैं।

वीणाजी चित्र बनाने के साथ कविताएँ भी लिखती हैं। कहा जा सकता है कि उनकी कल्पनाएं - जो कैनवास से बाहर निकल जाती हैं, उनकी कविताओं में पनाह पाती हैं। वीणा जी कहती हैं, “कई बार मेरे मन में सवाल उठता है कि ज्यादातर चित्रकार संगीत और रंगमंच जैसी विधाओं को भी खूब पसंद करते हैं। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो एक अलग-अलग कलाओं से आसानी से जुड़ जाता है लेकिन इसका उलट कम ही हो पाता है। शायद यह एक नैसर्गिक गुण होता है कि रंग और आकृतियों की भाषा जानने वाले चित्रकार, कला की अन्य भाषाओं को आसानी से समझ जाते हैं।

सुश्री वीणा जैन को भारत सरकार संस्कृति मंत्रालय द्वारा वर्ष 2021 में "जैविक रंगों के प्रयोग" के लिए 2 वर्ष की सीनियर फैलोशिप भी प्रदान की गई है। इसके अलावा उन्हें उस्ताद अलाउद्दीन खान संगीत एवं कला अकादमी, मप्र द्वारा भी राज्य सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है। वे कालिदास अकादमी उज्जैन, प्रफुल्ल दहानुकर आर्ट फाउंडेशन मुंबई, साउथ सेंट्रल जोन कल्चरल सेंटर नागपुर, इंडियन एकेडमी ऑफ़  फ़ाइन आर्ट्स-अमृतसर, स्वराज संस्थान संचालनालय-भोपाल, तिलक स्मारक ट्रस्ट-पुणे सहित देश की अन्य अनेक संस्थाओं से पुरस्कार प्राप्त कर चुकी हैं।

वीणा जी के चित्रों का प्रदर्शन देश में अनेक स्थानों पर हो चुका है। मुंबई की प्रसिद्ध जहांगीर आर्ट गैलरी में उनके चित्रों की एकल प्रदर्शनी वर्ष 2012 एवं 2019 में लग चुकी है। इसके अलावा त्रिवेणी कला संगम - नई दिल्ली, इंडियन काउंसिल फॉर कल्चरल रिलेशंस (आई सी सी आर) - भोपाल, भारत भवन-भोपाल, हर्षदा आर्ट गैलरी-गोवा, देवलालीकर कला वीथिका-इंदौर, आलियांज द फ्रांसिस-भोपाल एवं रूफटॉप गैलरी-भोपाल, कालिदास संस्कृत अकादमी-उज्जैन में उनके एकल चित्र प्रदर्शित हो चुके हैं। लगभग 40 से अधिक समूह प्रदर्शनियों में उनके चित्र प्रदर्शित हुए हैं जिसमें मप्र शासन का खजुराहो उत्सव, ललित कला अकादमी-भुवनेश्वर, ललित कला अकादमी-नई दिल्ली, स्वराज संस्थान संचालनालय-भोपाल, मप्र कला परिषद भोपाल, नेहरू सेंटर-मुंबई, पार्लियामेंट एनेक्सी-नई दिल्ली, चित्रकला परिषद-बंगलुरु, सीमा गैलरी-कोलकाता आदि स्थान शामिल हैं।

सन्दर्भ स्रोत: सारिका ठाकुर की वीणा जैन से बातचीत पर आधारित 

© मीडियाटिक

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