महिला बैंक के जरिए स्वावलंबन की राह दिखाई आरती ने

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महिला बैंक के जरिए स्वावलंबन की राह दिखाई आरती ने

छाया : आरती बिसारिया के फेसबुक अकाउंट से 

• सीमा चौबे 

पिछले 26 वर्षों से महिलाओं को सशक्त करने की दिशा में जी जान से जुटी भोपाल की आरती बिसारिया ने भोपाल में महिलाओं के लिए ‘आस्था वूमन को-ऑपरेटिव बैंक’ की स्थापना कर इस मिथक को तोड़ दिया कि महिलाएं, पुरुषों के एकाधिकार वाले काम नहीं कर सकतीं। ख़ास बात यह है कि इस बैंक के संचालन का 60 फीसद हिस्सा केवल और केवल महिलाओं के हाथों में हैं। आरती जी के इस उपक्रम की सफलता का अंदाज़ इसी बात से लगाया जा सकता है कि आज आस्था बैंक का सालान टर्न ओवर डेढ़ करोड़ है और उनके साथ आज तीन हज़ार से भी ज़्यादा महिलाएं जुड़ी हुई हैं।

आरती जी का मानना है कि जब घर की वित्तीय व्यवस्थाएं महिला बखूबी निभा सकती हैं, तो एक बैंक को संभालना उनके लिए कोई बड़ी बात नहीं है। हालांकि महिला बैंक की स्थापना करना जितना कठिन कार्य था उससे कहीं अधिक मुश्किल था उसका संचालन करना, लेकिन तमाम तरह की मुश्किलों से पार पाते हुए आरती जी ने न सिर्फ स्वयं को सिद्ध किया बल्कि कई गरीब महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने में भी वे सफल रहीं।

8 जनवरी 1963 को भोपाल में जन्मी आरती के पिताजी श्री एसबीएल श्रीवास्तव भारत सरकार द्वारा संचालित राष्ट्रीय तकनीकी शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान भोपाल में विभागाध्यक्ष थे और माँ सत्या श्रीवास्तव गृहिणी थी। साथ ही माँ का रुझान सामाजिक कार्यों में अधिक था। उनकी माँ जबलपुर के उस ब्यौहार परिवार से ताल्लुक रखती थीं, जो सामाजिक कार्यों के लिए  जाना-पहचाना जाता था। यही कारण था कि सत्या जी बचपन से ही समाजसेवा के कार्यों में परिवार के साथ शामिल रहती थीं। मां की तरह ही समाजसेवा के भाव आरती में भी बचपन से आ ही गए थे। स्कूल द्वारा आयोजित सोशल वेलफेयर के कार्यक्रमों में वे बढ़ चढ़ कर भाग लिया करती थीं। भोपाल में आशा निकेतन सामाजिक संस्था में स्कूल के समय से ही उनके समाज सेवा के कार्यक्रमों में भाग लिया करती थीं। वयस्क होते-होते उनके मन में कुछ अलग करने का विचार आता था, लेकिन आगे चलकर वे ऐसा कुछ अलग काम करेंगी, खुद आरती भी नहीं जानती थीं।

परिवार में तीन संतानों में सबसे बड़ी आरती से छोटे दो भाई हैं। आरती की स्कूली शिक्षा भोपाल के सेंट जोसफ कान्वेंट में हुई। आरती पढ़ाई के साथ साथ अन्य गतिविधियों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेतीं, ख़ास तौर से खेलों में उनकी विशेष रुचि थी। यही कारण था कि स्कूली दिनों में तैराकी, बास्केटबॉल क्रिकेट एवं हॉकी खेलती थीं। वे एनसीसी कैडेट भी थीं और स्कूल की तरफ से लाल परेड मैदान में गणतंत्र दिवस की परेड में भाग लेती थीं। कक्षा चौथी से ही उन्होंने तैराकी सीखना शुरू कर दिया था। तैराकी में राज्य तथा राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित प्रतियोगिताओं में उन्होंने जिला स्तरीय चैम्पियनशिप का खिताब भी जीता। इतना ही नहीं, उन्होंने बरकतउल्ला विवि की तरफ से बतौर कप्तान इंटर यूनिवर्सिटी तैराकी प्रतियोगिता का प्रतिनिधित्व भी किया। राज्य स्तरीय चैम्पियनशिप में उन्हें तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह द्वारा पुरस्कार प्रदान किया गया।

आरती बताती हैं कॉलेज का पहला दिन उनके लिए एक यादगार पल बन गया. उसी दिन शाम को उनके पिताजी ने उन्हें लूना भेंट की। उस समय नूतन कॉलेज में वे एकमात्र छात्रा थीं, जिसके पास लूना थी। बी. एससी. की पढ़ाई के दौरान ही 1983 में उनका विवाह जबलपुर निवासी श्री राजेश बिसारिया से हो गया। राजेश जी उस समय बतौर असिस्टेंट इंजीनियर मप्र सेतु निगम (ब्रिज कॉर्पोरेशन), सिवनी में पदस्थ थे। शादी और पति के बार-बार तबादले के कारण आरती जी की पढ़ाई बीच में ही छूट गई। लेकिन विवाह के दो साल बाद ही फिर से पढ़ाई शुरू की और बरकतउल्ला विवि से अंग्रेजी विषय के साथ एमए (प्रायवेट) किया। वे यहीं नहीं रुकीं, इसके बाद बैंकिंग एंड फाइनेंस में एमबीए भी कर लिया।

शादी के दस साल तक वे केवल पारिवारिक ज़िम्मेदारियां ही निभाती रहीं। इसी बीच वे दो बच्चों की मां भी बन गईं। 1993 में राजेश जी का तबादला भोपाल होने के बाद लगा कि अब जीवन को नया रंग देना है और अपने लिए कुछ करना है। परिवार का सहयोग तो हमेशा से ही मिलता रहा, इसलिए उन्हें अपने निर्णय लेने में कभी कोई दिक्कत नहीं आई। आरती जी ने पार्ट टाइम काम करना शुरू किया और भास्कर समूह के ‘नेशनल मेल’ में उप संपादक की हैसियत से काम करने लगी। रिपोर्टिंग के दौरान उनका रुझान धीरे-धीरे बैंकिंग एवं फाइनेंस की तरफ हो गया।

वर्ष 1995 में भारतीय रिज़र्व बैंक की एक कार्यशाला में उन्हें पहली बार महिला बैंक योजना के बारे में पता चला। आरती कहती हैं “मैंने महसूस किया कि अनपढ़ और कमज़ोर वर्ग की महिलाओं के लिए बैंकिंग जटिल प्रक्रिया है। इसे आसान बनाने के मकसद से ही मैंने महिला सहकारी बैंक की स्थापना करने का मन बनाया।” इसके बाद उन्होंने इसके नियम कायदे समझे और खुद को इस कार्य के लिए तैयार करने में करीब डेढ़ साल का समय लिया। उस समय (1996 में) महिला बैंक की स्थापना करना बहुत कठिन कार्य था, लेकिन उनकी माँ उनका हौसला बढ़ाती  रहीं। हालांकि उस समय उनकी माँ डायलिसिस पर थीं। ख़राब सेहत के बावजूद उन्होंने अपने नाती-नातिन को सम्भाला और आरती जी को घर की ज़िम्मेदारियों से बरी करते हुए नए काम के लिए स्वतंत्र छोड़ दिया। उस समय आरती जी का बेटा 8 साल का और बेटी केवल 3 साल की थी।

बैंक शुरू करने की प्रकिया बड़ी जटिल थी। सर्वप्रथम बैंक का पंजीयन म.प्र. सहकारी सोसायटी अधिनियम के तहत सहकारिता विभाग में पंजीयन एवं  रिज़र्व बैंक से लाइसेंस प्राप्त करना था। रिजर्व बैंक द्वारा निर्धारित मानदंडों को पूरा करने के लिये उन्होंने सबसे पहले एक बैठक बुलाकर भोपाल जिले की प्रगतिशील महिलाओं को इसकी जानकारी दी और फिर भोपाल की ही लगभग 10 हज़ार महिलाओं से मुलाकात कर बैंक बनाने के उद्देश्य को साझा किया। उस समय तक आरती के पास न तो ऑफिस था और न स्टाफ, सिर्फ बैंक शुरू करने के लिए एक अवधारणा थी। उस समय बैठक में लोगों को महिला बैंक का यह प्रस्ताव तो बहुत अच्छा लगता था लेकिन यह बात उनके गले नहीं उतरती थी कि महिलाएं बैंक कैसे खोल सकती हैं या कैसे चला सकती हैं। बहरहाल, कुछ खट्टे मीठे अनुभवों और काफ़ी जद्दोजहद के बाद आखिरकार 20 जनवरी 1997 में 2200  शेयर धारकों और 20 लाख रुपये की अंश पूँजी के साथ इस बैंक की शुरुआत हुई। ख़ास बात यह रही कि बैंक की स्थापना का काम निर्धारित समय सीमा से पहले ही हो गया, लेकिन उसी साल 29 नवम्बर को उनकी माँ का स्वर्गवास हो गया। आरती जी कहती हैं लेकिन इस बात का मुझे यह संतोष है कि मेरी माँ ने अपने जीवन में समाज के लिए समाज में महिलाओं के लिए कुछ सार्थक प्रयास को फलीभूत होते देखा।

जब बैंक बनाया तो आरती जी के दिमाग में केवल यही बात थी महिलाओं को आप सारी ज़िन्दगी सहायता नहीं कर सकते इसीलिए उन्हें कुछ ऐसा करना था कि महिलाएं खुद के बारे में सोचें और आत्मनिर्भर बन सकें। उन्होंने बैंक को सामाजिक सरोकारों और सहकारिता से जोड़ते हुए काम करना शुरू किया। आज बैंक में 75 फीसदी महिला ग्राहक हैं जो औपचारिक रूप से पढ़ी-लिखी नहीं हैं और आर्थिक रूप से कमज़ोर परिवार से आती हैं।

महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने प्रोत्साहन और काउंसलिंग

आरती जी बताती हैं हमारा यह भी अनुभव रहा है कि बहुत सी महिलाएं कुछ काम तो करना चाहती हैं पर उन्हें यह समझ में नहीं आता कि वे क्या करें। ऐसी महिलाओं की काउंसलिंग कर यह सुनिश्चित किया जाता है कि वे पहले अपना मन बना लें कि वे क्या करना चाहती हैं। इसके बाद उन्हें बैंकिंग से जोड़ा जाता है। बैंक में ही एक काउंसिल सेल बनाया है जो महिलाओं को अपनी रुचि एवं हुनर के अनुसार काम करने के लिए प्रेरित करता है। महिलाओं के लिए समय-समय पर शिक्षण-प्रशिक्षण के कार्यक्रम भी आयोजित किये जाते हैं और उन्हें विभिन्न विषयों पर विषय विशेषज्ञ द्वारा प्रशिक्षण दिया जाता है। बहुत सी महिलाएं अपने पारिवारिक एवं अन्य दायित्व को निभाने की वजह से अकेले काम नहीं कर पाती हैं या उन्हें इस बात का भरोसा नहीं हो पाता है कि वे स्वयं अकेले कार्य कर पाएंगी। ऐसी महिलाओं को स्व सहायता समूह बनाने के लिए प्रेरित किया जाता है और उन्हें विभिन्न तरह के कौशल विकास के प्रशिक्षण दिये  जाते हैं ताकि वे सक्षम हो सकें तथा उन्हें आर्थिक एवं सामाजिक समानता प्राप्त हो सके।

महिला भागीदारी वाली कंपनियों को मिलता है लोन

महिला बैंक अन्य बैंक की तरह ही रिजर्व बैंक के दिशा-निर्देशानुसार काम करता है। किसी भी बैंक में मिलने वाली सुविधाएं यहां भी उपलब्ध हैं। यहाँ महिलाओं को 10 हजार रुपये से लेकर लाखों की राशि का ऋण दिया जाता है। लेकिन यह सिर्फ ऐसी फर्म या कम्पनी को दिया जाता जिसमें महिलाओं का 51 फीसदी शेयर हो। पुरुष उनके सहयोगी हो सकते हैं, लेकिन प्रोजेक्ट की बागडोर महिला के हाथ में होनी चाहिए। इस तरह महिलाओं को अपना मकान बनाने, बच्चों की परवरिश, पढ़ाई बिजनेस शुरू करने के लिए भी क़र्ज़ आसानी से मिल जाता है।

प्रेरणादायक और सार्थक काम में जुटी आरती जी कहती हैं  “कभी कभी बहुत कठिन दौर से भी गुजरना पड़ता है जब मानसिक एवं भावनात्मक रूप से काम करना कठिन हो जाता है। ऐसे समय में मेरा परिवार मेरा संबल बनता है। पिछले 26 वर्षों में आज महिलाएं काफी अच्छी स्थिति में पहुँच गई हैं पहले जिन महिलाओं को अपने लिए बात भी नहीं करना आता था, वे आज अपनी जिन्दगी के निर्णय लेने में सक्षम हो गई है। अब महिलाएं इतना जानती हैं कि उन्हें क्या चाहिए। वे अपने अधिकारों और जरूरतों के लिए आवाज भी उठाती हैं। यह मेरे काम की बड़ी उपलब्धि है। महिला बैंक महिलाओं को सशक्त बनाने की दिशा में केवल छोटा कदम है।”

आरती आस्था महिला नागरिक सहकारी बैंक के अतिरिक्त महिला सहकारी शिक्षा क्षेत्रीय परियोजना भोपाल की अध्यक्ष, नेशनल फ़िल्म एंड फ़ाइन आर्ट लि., नई दिल्ली की कार्यकारी अध्यक्ष, नेशनल को-ऑपरेटिव कमेटी फॉर वुमेन एम्पावरमेंट और भारतीय राष्ट्रीय सहकारी संघ, नई दिल्ली की कमेटी मेम्बर तथा इंटरनेशनल को-ऑपरेटिव एलायंस (आईसीए) की एग्जीक्यूटिव कमेटी मेम्बर भी हैं।

मल्टी स्टेट को-ऑपरेटिव सोसायटी की निदेशक आरती राज्य स्तरीय वुमन एंटरप्रेन्योर एसोसिएशन का गठन करना चाहती हैं जो  पूरे प्रदेश की महिलाओं के सामाजिक और आर्थिक उत्थान के लिए कार्य करेगा। उनके पति राजेश बिसारिया, म.प्र. शासन में अधिकारी हैं। उनके दोनों बच्चे बेटा आयुष बिसारिया और बेटी कृति बिसारिया रचनात्मक क्षेत्रों में काम करते हैं और अमेरिका में रहते हैं। कृति एक फ़ैशन फ़ोटोग्राफ़र हैं और पानी के भीतर (अंडरवाटर) फ़ोटोग्राफ़ी के लिए जानी जाती हैं।

पुरस्कार एवं सम्मान

• मप्र स्टेट को-ऑपरेटिव यूनियन भोपाल द्वारा आस्था महिला बैंक को ‘बेस्ट फायनेंसियल स्टेट अवार्ड 2003-04

 • इंडियन फार्म जर्नलिस्ट एसोसिएशन नई दिल्ली द्वारा ‘कंट्रीब्यूशन फॉर वीमेन एम्पावरमेंट’ हेतु लाल बहादुर शास्त्री नेशनल अवार्ड

• नेशनल फेडरेशन ऑफ़ अर्बन को-ऑपरेटिव बैंक एसोसिएशन नई दिल्ली द्वारा आस्था महिला बैंक को पूरे भारत में फर्स्ट आईएसओ 1999-2000 सर्टिफिकेट प्राप्त करने हेतु एक्सीलेंस अवार्ड

• दबंग दामिनी महिला सम्मान

• बैंकिंग फ्रंटियर अवार्ड, बेस्ट चेयरपर्सन

• ऑल इंडिया अर्बन को-ऑपरेटिव बैंकिंग अवार्ड (बेस्ट महिला बैंक) 2023

• ऑल इंडिया अर्बन को-ऑपरेटिव बैंकिंग अवार्ड (बेस्ट प्रोफेशनल डायरेक्टर) 2023 

सन्दर्भ स्रोत : सीमा चौबे की आरती बिसारिया से हुई बातचीत पर आधारित 

© मीडियाटिक

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