आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट: वैवाहिक अधिकारों की

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आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट: वैवाहिक अधिकारों की
डिक्री न मानने पर पति को तलाक का हक

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(1A)(ii) के तहत पति को तलाक देने का आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि पत्नी यह साबित नहीं कर सकी कि पति अपने किसी गलत आचरण का लाभ उठाकर तलाक की याचिका दायर कर रहा था।

मामला क्या था?

• पक्षकारों का विवाह 5 फरवरी 1992 को हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुआ था। उनके एक पुत्र भी हैं।

• वर्ष 1999 में पति ने तलाक की याचिका दाखिल की।

• पत्नी ने धारा 9 के तहत वैवाहिक अधिकारों की बहाली की याचिका दायर की।

• 12 जुलाई 2001 को फैमिली कोर्ट ने पति की याचिका खारिज कर दी और पत्नी की याचिका स्वीकार की।

• पत्नी को पूर्व में भरण-पोषण का आदेश भी मिला था।

•  पति का कहना था कि वैवाहिक अधिकारों की बहाली की डिक्री के बावजूद पत्नी उसके साथ नहीं रही। इसलिए एक वर्ष की वैधानिक अवधि पूरी होने के बाद उसने धारा 13(1A)(ii) के तहत तलाक की मांग की।

• पत्नी ने इसका विरोध किया और दावा किया कि उसने पति के साथ रहने की कोशिश की, लेकिन पति ने उसे घर में प्रवेश नहीं दिया।

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फैमिली कोर्ट का फैसला

फैमिली कोर्ट ने पति की तलाक याचिका खारिज कर दी।

•  कोर्ट का मानना था कि वैवाहिक अधिकारों की बहाली की डिक्री का पालन न होने भर से तलाक स्वतः नहीं दिया जा सकता, खासकर जब पति की ओर से डिक्री पालन में सद्भावना न हो।

•  कोर्ट ने पत्नी और उसके गवाहों के बयान को भरोसेमंद माना।

हाईकोर्ट में दलीलें

हाईकोर्ट में पति ने दावा किया कि

•  वैवाहिक अधिकारों की बहाली की डिक्री के बावजूद दांपत्य संबंध बहाल नहीं हुए

•  एक वर्ष से अधिक समय बीत चुका था, इसलिए उन्हें धारा 13(1A)(ii) के तहत तलाक का अधिकार था।

हाईकोर्ट का कानूनी विश्लेषण

हाईकोर्ट ने निर्णय में स्पष्ट किया कि

• धारा 13(1A)(ii) के तहत पति या पत्नी तलाक की याचिका दाखिल कर सकता है, यदि वैवाहिक अधिकारों की बहाली की डिक्री के बाद एक वर्ष से अधिक समय तक दांपत्य संबंध बहाल न हों

• वैवाहिक अधिकारों की बहाली की डिक्री 12 जुलाई 2001 को पारित हुई थी।

• एक वर्ष की अवधि 12 जुलाई 2002 को पूरी हो गई थी, और पति ने 22 जुलाई 2002 को तलाक की याचिका दाखिल की।

• कोर्ट ने धारा 23(1)(a) के तहत यह भी देखा कि क्या पति अपने ही गलत आचरण का लाभ उठा रहे हैं।

• सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि केवल पुनर्मिलन के प्रस्ताव को अस्वीकार करना गलत आचरण नहीं माना जाएगा।

• कोर्ट ने स्पष्ट किया कि "गलत आचरण" का अर्थ है ऐसा गंभीर दुराचरण जो तलाक की राहत को रोक सके।

• हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का फैसला रद्द करते हुए 5 फरवरी 1992 के विवाह को भंग कर दिया और पति को तलाक देने का आदेश दिया।

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