गोआ मुक्ति आंदोलन में जान की बाज़ी लगाने वाली सहोदरा बाई

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गोआ मुक्ति आंदोलन में जान की बाज़ी लगाने वाली सहोदरा बाई

चित्रांकन : ज़ेहरा कागज़ी

विशिष्ट महिला

1950 के दशक में सागर संसदीय क्षेत्र का नेतृत्व एक ऐसी महिला ने संभाला जो कम पढ़ी लिखी होकर भी किसी भी काम के लिए इंदिराजी का हाथ पकड़ लेतीं थीं। प्रधानमंत्री निवास में वे बेरोकटक पहुंच जाया करती थीं। वे तीन बार सागर से तथा एक बार दमोह से सांसद रहीं। सहोदरा बाई राव नामक इस निडर महिला का जन्म 30अप्रैल सन् 1919 को बोतराई थाना पथरिया जिला दमोह के एक साधारण किसान परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम नीरेन सिंह था। वे जन्मजात प्रतिभा की धनी थीं। किसी बात को सुनकर लम्बे समय तक याद रखने का उनमें अद्भुत गुण था। पास- पड़ोस की बच्चियों को सस्वर पढ़ते हुए सुनकर ही उन्होंने कई पाठ अपने आप याद कर लिये। इसी प्रतिभा के बल पर उन्होंने अपने जीवन में ज़रूरी शिक्षा प्राप्त कर ली। यह केवल अक्षर ज्ञान तक सीमित नहीं था। उन्होंने कई पौराणिक ग्रंथों के  अध्ययन के साथ ही कई भाषाएं सीख लीं। यहां तक कि तलवारबाज़ी और निशानेबाज़ी जैसी कलाओं में भी वह पीछे नहीं रहीं।

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देशभक्ति की भावना उनमें बचपन से ही कूट-कूटकर भरी हुई थी। 1942 में पति की असामयिक मृत्यु के पश्चात अपनी ससुराल ग्राम कर्रापुर, ज़िला सागर में थोड़ी सी ज़मीन पर किसानी और  मजदूरी करके गुज़ारा करती रहीं। फिर  वे भारत छोड़ो आंदोलन से जुड़ गईं। उसी दौरान उन्हें छः माह के लिए उन्हें जेल में डाल दिया गया। बाहर आने के बाद वे आंदोलनों में और भी बढ़ चढ़कर हिस्सा लेने लगीं। 1945 में  उन्होंने गाँधीजी के साथ नोआखली के दंगा-पीड़ित क्षेत्रों का दौरा किया और वहां राहत कार्य संभाला और हिन्दू मुस्लिम एकता के लिये काम किया  । 1947 में लोकल बोर्ड की सदस्य बनीं  1948 में जनपद सभा की सदस्य, हरिजन कल्याण बोर्ड की सदस्य होने के साथ ही जबलपुर डिवीजन की अध्यापकों तथा प्राध्यापकों की नियुक्ति संबधी समिति की सदस्य रहीं। सहोदरा बाई अपने क्षेत्र की लोकप्रिय कार्यकर्ता तो थीं ही, गोवा सत्याग्रह में जान की बाज़ी लगाकर देश भर की प्रिय नेत्री भी बन गईं।

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सन् 1955 में पुतगालियों से गोवा की मुक्ति के आंदोलन में उन्होंने सक्रिय रूप से भाग लिया। अपने प्राणों की परवाह किए बिना उन्होंने पुर्तगालियों की सेना के सामने  तिरंगा हाथ में लेकर आंदोलन का नेतृत्व किया। इस दौरान उन्हे तीन गोलियां लगीं – दो दाएं हाथ में और  एक पेट में। इस तरह घायल होने के बावजूद वे तिरंगे को दाएं हाथ के बजाय बाएं हाथ से तब तक थामे रहीं, जब तक उसे उन्होंने निर्धारित स्थान पर फहरा नहीं दिया। बाद में पं.जवाहर लाल नेहरू ने स्वयं उनके इलाज का इंतज़ाम करवाया था। उनकी बहादुरी से  प्रसन्न होकर तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें वीरांगना कहकर संबोधित किया। पंडित जी ने का उन्हें इतना स्नेह मिला कि उन्हें सागर से लोकसभा का टिकट दे दिया, जिसमें वे भारी मतों से विजयी हुईं। सहोदरा बाई इस तरह 1957 से लेकर दि. 27 मार्च 1981 को अपनी मृत्यु तक चार बार संसद सदस्य रहीं।

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उन्होंने देश के लिए विभाजन के बाद सिंधियों के पुनर्वास के लिये सहायता प्रदान की।  हरिजन कल्याण , प्रौढ़ शिक्षा , हिन्दी के विकास , महिला संगठनों तथा गरीब किसानों की सहायता में रूचि ली ! नंगे पैर चलना और गरीबों की सेवा करने का उनमें जूनून सा था। सागर के नागरिक उन्हें मौसी के नाम से संबोधित करते थे। वे इसी नाम से देश-प्रदेश में भी जानी जाती थीं। सागर का पॉलिटेक्नीक कॉलेज सहोदरा बाई के नाम पर है और खुरई का एक वार्ड भी।

संपादन- मीडियाटिक डेस्क 

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