पूर्णिमा राजपुरा : वाद्ययंत्र ही बचपन में जिनके खिलौने थे

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पूर्णिमा राजपुरा : वाद्ययंत्र ही बचपन में जिनके खिलौने थे

छाया : स्व संप्रेषित 

• सीमा चौबे 

इंदौर की पूर्णिमा राजपुरा का नाम संगीत की उन शख्सियतों में लिया जाता है जिनकी उँगलियाँ एक-दो नहीं, बल्कि अनेक अलग-अलग वाद्य यंत्रों पर  बड़ी सहजता से थिरकती हैं। इतना ही नहीं, वे दो वाद्य एक साथ बजाने का हुनर भी रखती हैं। ख़ास बात यह कि वायलिन छोड़कर इतने सारे यंत्र बजा लेना उन्होंने अपने आप ही सीखा। चूंकि पिताजी संगीतज्ञ थे, तो घर में ढेर सारे वाद्य यंत्र भी थे। बचपन में उन्होंने अपने पिताजी से कभी ये नहीं पूछा कि कौन सा वाद्य कैसे बजाना है। अमूमन बच्चों को बचपन में खेलने के लिए खिलौने मिलते हैं लेकिन पूर्णिमा ने वाद्यों को ही अपना खिलौना बना लिया और उनसे खेलते-खेलते वे तरह-तरह के साज़ बजाने में इतनी माहिर हो गईं कि हर कोई देखकर दंग रह जाता था।

5 दिसम्बर 1987 को इंदौर में श्री राजेश उपाध्याय और श्रीमती प्रभा उपाध्याय के यहाँ जन्मीं पूर्णिमा ने अपना संगीत सफर महज चार वर्ष की उम्र से ही शुरू कर दिया था। उनकी मां गृहिणी थी, जबकि पिता स्वयं प्रसिद्ध गायक एवं वादक रहे। राजेश जी 20 से 25 तरह के वाद्य बजा लेते थे। इतना ही नहीं, तीन-तीन वाद्य यन्त्र (कांगो, ढोलक और माउथ ऑर्गन) एक साथ बजाने में उन्हें महारत हासिल थी। उन्होंने कई मालवी एल्बमों में संगीत भी दिया, लेकिन बीमारी के चलते उनका यह सफ़र बहुत जल्दी ख़त्म हो गया और पूर्णिमा को भी अपने पिता का सान्निध्य नहीं मिल सका।

दरअसल, पूर्णिमा जब तीन साल की थीं, तभी उनके पिता गंभीर रूप से बीमार हो गए। ऐसे में उनके दादाजी कमलाकर उपाध्याय - जो उस समय पुलिस अधीक्षक थे, ने पूरे परिवार को संभाला। घर की माली हालत ऐसी नहीं थी कि वे किसी नामी गुरु या संस्था से पूर्णिमा को प्रशिक्षण दिलवा पाते। तीन भाई बहनों में सबसे बड़ी होने के नाते पूर्णिमा ने दादाजी की मदद के लिए कक्षा दसवीं से ही ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया। वे दिन में पढ़ाई करतीं और शाम को संगीत स्कूल में कक्षा लेतीं। कॉलेज के प्रथम वर्ष से शाम के समय वे बाल निकेतन संघ में बच्चों को भी वाद्ययंत्र सिखाती थीं। इससे कुछ आर्थिक संबल मिला।

पूर्णिमा ने इंदौर के इंदिरा स्कूल से दसवीं करने के बाद 11वीं  और 12वीं  की पढ़ाई शासकीय मालव कन्या विद्यालय स्कूल से की।  इसके बाद संगीत विषय (वायलिन) के साथ इंदौर के न्यू गर्ल्स डिग्री कॉलेज  (जीडीसी) से बीए और एम.ए  (वायलिन) की डिग्री प्राप्त की। संगीत (वायलिन) में एमए गोल्ड मेडलिस्ट रहीं पूर्णिमा ने संगीत विशारद की उपाधि  खैरागढ़ वि.वि. से वायलिन में तथा कंठ संगीत में गन्धर्व संगीत महाविद्यालय, मुंबई से प्राप्त की है। इसके अलावा राजा मानसिंह तोमर वि.वि., ग्वालियर से संगीत विद की उपाधि भी उन्हें प्राप्त है। इस समय वे संगीत में पीएचडी (लोक और शास्त्रीय गज वाद्यों का तुलनात्मक अध्ययन) कर रही हैं, जो कि अंतिम चरण में है। वे बताती हैं 12वीं से लेकर स्नातकोत्तर की शिक्षा उन्होंने सरकार से प्राप्त स्कॉलरशिप से की, जिससे पढ़ाई पर होने वाला खर्च बच गया।

अपने पिता की तरह पूर्णिमा भी हारमोनियम, तबला, कांगो, बांगो, ढोलक, माउथ ऑर्गन सहित 18 से 20 तरह के वाद्य बजा लेती हैं। स्कूली शिक्षा के दौरान ही वायलिन की प्रारम्भिक शिक्षा घर पर ही श्री श्याम लासुरकर की गंडाबंध शिष्या बनकर शुरू हुई। इसके अलावा पं. देवकीनंदन गोस्वामी महाराज और डॉ. रमेश तागड़े से भी वायलिन वादन का मार्गदर्शन मिला। लेकिन यह विडम्बना ही रही कि पिता सहित किसी भी गुरु का मार्गदर्शन उन्हें लम्बे समय तक प्राप्त न हो सका। जब पूर्णिमा कॉलेज पहुँची तो उन्हें लगा यहाँ उन्हें संगीत के अच्छे गुरु मिल जायेंगे, लेकिन उनकी सोच के विपरीत कॉलेज में दाखिला होने के कुछ दिन बाद ही संगीत प्राध्यापक रमेश तागड़े जी का तबादला अन्यत्र हो गया और पूरे पांच साल उनकी जगह किसी और की नियुक्ति नहीं हुई। बाद में पूर्णिमा ने वायलिन वादन की बारीकियां तागड़े जी से उनके घर पर जाकर सीखीं।

पूर्णिमा दो वाद्य एक साथ बजाना भी जानती हैं। फिर वायलिन ही क्यों चुना - इस सवाल पर पूर्णिमा बताती हैं "उनके दादाजी एक बार किसी काम से दिल्ली गये। वहां एक कार्यक्रम में वीजी जोग साहब का वायलिन वादन और ज़ाकिर हुसैन साहब की तबले की जुगलबंदी सुनकर वे बहुत प्रभावित हुए। बस यहीं से उन्हें लगा मैं किसी एक साज में दक्षता प्राप्त करूं। उन्होंने ही मुझे वायलिन पर ध्यान केन्द्रित करने के लिए प्रेरित किया। हालांकि मुझे तबला ज्यादा पसंद था, लेकिन चूंकि इस क्षेत्र में महिलाएं गिनी-चुनी ही थीं तो दादाजी की सलाह पर मैंने वायलिन को चुना।"

चार साल की उम्र में पहली प्रस्तुति

पूर्णिमा की संगीत यात्रा महज चार साल की उम्र से ही शुरू हो गई थी। पहली बार उन्होंने स्कूल के वार्षिक कार्यक्रम में बिना किसी तैयारी के सिंथेसाइजर के साथ अपनी पहली प्रस्तुति दी। उन्होंने उस वक़्त का लोकप्रिय गीत 'लकड़ी की काठी, काठी पे घोड़ा.....' बजाया था। उस प्रस्तुति पर मिली तालियों की गड़गड़ाहट वे आज तक नहीं भूल पाई हैं। फिर तो वे हर साल स्कूल के कार्यक्रम में अलग-अलग वाद्य यंत्र बजाकर वाहवाही बटोरती रहीं। वे बताती हैं कि स्कूल के किसी भी कार्यक्रम में जब कोई साज़ बजाने की बारी आती, तमाम शिक्षक कहते “अरे उसे तो कुछ भी दे दो बजाने को, वो कमाल ही करेगी।” बारहवीं के बाद उन्होंने सविता गोडबोले जी के साथ काम करना शुरू किया। उनके साथ मंच के अलावा दूरदर्शन के अनेक कार्यक्रमों में गायन और वादन दोनों में संगत दी।

इसके बाद उन्होंने भोपाल में आयोजित राज्य स्तरीय बाल रंग महोत्सव में हिस्सा लिया, जहाँ उन्होंने दो वाद्य यंत्र कांगो और माउथ ऑर्गन एक साथ बजाकर सभी को आश्चर्यचकित कर दिया। यहाँ उन्होंने  दूसरा स्थान हासिल किया। तब वे दसवीं कक्षा में थीं। स्कूल से शुरू हुआ यह सिलसिला आज भी  जारी है। कॉलेज के दौरान राज्य स्तरीय युवा उत्सव प्रतियोगिता में सागर में उन्होंने प्रथम स्थान प्राप्त किया। पहला स्थान हासिल करने का यह सिलसिला फिर कभी थमा ही नहीं।

कॉलेज में मुख्य प्रतिस्पर्धा उस समय शुरू हुई जब युवा उत्सव के लिए उनका चयन होना था। उस समय उन्होंने पहली बार कॉलेज के प्राध्यापकों के सामने  वायलिन पर राग भैरव बजाया था। वे कहती हैं - मेरी असली जीत वहीं से शुरू हुई जब उनसे पहले उनके सीनियर - जो काफ़ी समय से संगीत सीख रहे थे और कई गुना बेहतर बजा रहे थे, लेकिन मुझे सुनने के बाद उपस्थित सभी लोगों ने कहा कि इसे देखकर ऐसा लग रहा है जैसे इसकी कई वर्षों की तैयारी थी। इसके बाद उन्होंने  जिला स्तर, संभाग स्तर और राज्य स्तर भी प्रथम स्थान प्राप्त किया। सागर विश्वविद्यालय में आयोजित युवा उत्सव में उन्हें श्रीमती यशोधरा राजे सिंधिया के हाथों सम्मानित किया गया था। उस समय उन्हें श्रीमती सिंधिया की ओर से 5 हज़ार और विश्वविद्यालय की तरफ से 10 हज़ार की राशि प्राप्त हुई थी। इस कार्यक्रम में देश के हर राज्य से एक-एक वादक आये थे, लेकिन जैसे ही पूर्णिमा अपना वादन पूरा कर मंच से उतरीं, दर्शक दीर्घा में लोगों ने खड़े होकर बहुत देर तक तालियाँ बजाईं।

इसके बाद उन्हें राष्ट्रीय स्तर के नामी और प्रतिष्ठित लोगों  (पं. गोस्वामी श्री देवकीनंदन महाराज, गोस्वामी श्री दिव्येश कुमार जी महाराज, विट्ठल राजपुरा जी, सविता गोडबोले, आशीष पिल्लई) के साथ संगत करने का अवसर मिलने लगा।

मार्गदर्शक बने जीवनसाथी

पांच साल तक विट्ठल जी का मार्गदर्शन और साथ उन्हें मिलता रहा। पूर्णिमा बताती हैं - मैंने कभी नहीं सोचा था जिनके साथ मै संगत कर रही हूँ, उनका साथ मुझे जीवन भर के लिए मिल जायेगा। 2 नवम्बर 2010 को दोनों विवाह सूत्र में बंध गये। विट्ठल जी राष्ट्रीय स्तर के प्रतिभाशाली पखावज वादक हैं। वे ऑल इंडिया रेडियो में 'ए'  ग्रेड आर्टिस्ट भी हैं। कदम-कदम पर पूर्णिमा जी का साथ देने वाले विट्ठल जी उन्हें कुछ न कुछ नया करने के लिए प्रोत्साहित करते रहते हैं। इन दोनों ने राष्ट्रीय स्तर पर अनगिनत प्रस्तुतियां दी हैं। इनका ‘पंचम सिद्धि’ नाम से एक ग्रुप भी है, जिसमें इनके साथ राष्ट्रीय स्तर के कलाकार पांच वाद्यों (तबला, वायलिन, पखावज, सितार और सरोद) की जुगलबंदी प्रस्तुत करते हैं।

यादगार लम्हा

पूर्णिमा बताती है “ कई कार्यक्रम हैं, जो भूले नहीं भूलते, लेकिन वर्ष 2018 में दिल्ली में आयोजित ‘साधना महोत्सव’ कार्यक्रम में बिरजू महाराज जी के सामने प्रस्तुति देना और उनका आशीर्वाद मिलना अविस्मरणीय है। यहाँ मैंने विट्ठल जी के साथ संगत की थी। बिरजू महाराज ने विट्ठल जी की सराहना के बाद पूर्णिमा से कहा “ वाह बेटी ! तुम तो लय की बड़ी  पक्की हो, तुमने ज़बरदस्त संगत की इनके साथ। बहुत बढ़िया बजाया तुमने।”  इस युवा प्रतिभाशाली वादिका की सधी हुई संगत के कायल गुंदेचा बंधु, एल.सुब्रमण्यम जैसे राष्ट्रीय स्तर के कलाकार भी हैं।

पूर्णिमा ने कई झंझावात झेलते हुए अपना एक रास्ता बनाया और बेहतर मुकाम हासिल किया है। आर्थिक तंगी के चलते किसी हुनरमंद बच्चे का भविष्य खराब न हो, इसलिए वे कई बच्चों को संगीत - खासकर वायलिन की नि:शुल्क तालीम दे रही हैं। उनके कई शिष्य इस क्षेत्र में नाम कमा रहे हैं। वे कहती हैं “जीवन में कई परेशानियां आती हैं, लेकिन ललक और लगन आपको मुकाम तक पहुँचाने में सहायक होती है।” उनका 11 साल का एक बेटा लय - जो अभी कक्षा 8वीं  में पढ़ रहा है, अपने माता-पिता की तरह प्रतिभावान है। वह भी कई सारे वाद्य यन्त्र बजा लेता है, लेकिन पखावज पर उसकी पकड़ बहुत अच्छी है। पूर्णिमा के दोनों छोटे भाई-बहन इंदौर में रहते हैं। भाई अंबरीश  उपाध्याय होटल व्यवसाय और बहन शाश्वती उपाध्याय वेब डिज़ाइनिंग के व्यवसाय से जुड़ी हैं।

वर्ष 2020 वर्ष में मप्र राज्य लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद पूर्णिमा जवाहर नवोदय विद्यालय, चारूवा (हरदा) में संगीत शिक्षिका के पद पर कार्यरत हैं और असिस्टेंट प्रोफेसर बनने की तैयारी भी कर रही हैं।

उपलब्धियां/सम्मान

• बी.ए में प्रथम स्थान प्राप्त करने पर पुरस्कार स्वरूप देवी अहिल्या वि.वि.द्वारा छात्रवृत्ति प्राप्त

• राज्य स्तरीय युवा उत्सव विजेता ( 2005 )

• एम.ए (वायलिन) में विश्वविद्यालय में प्रथम स्थान करने पर दो स्वर्ण पदकों से सम्मानित, आर.सी जाल चैरिटी ट्रस्ट एवं देवी अहिल्या विवि इंदौर द्वारा

• शास्त्रीय वायलिन वादन में आकाशवाणी, इंदौर से बी ग्रेड प्राप्त  

• अन्ना हजारे के हाथों दैनिक भास्कर समूह द्वारा वुमन अचीवर कैटेगरी में मध्यप्रदेश प्राइड अवार्ड  (2013 )

 

• रेडियो मिर्ची 93.4 एफएम द्वारा सम्मानित

• श्री विशा श्रीमाणी सोनी समाज द्वारा समाज रत्न पुरस्कार

• महेश्वर संस्था द्वारा  निमाड़ अवार्ड (2015) के अलावा कई राज्य स्तरीय अवॉर्ड भी मिल चुके हैं।

प्रमुख प्रस्तुतियां

• त्रिवेणी संग्रहालय, सिंहस्थ 2016- उज्जैन

• साधन उत्सव दिल्ली-2019 (पद्म विभूषण पंडित बिरजू महाराज की संस्था कलाश्रम द्वारा आयोजित)

• पं. ओमकारनाथ ठाकुर स्मृति संगीत समारोह-2020 (गुजरात राज्य संगीत नाटक अकादमी द्वारा पोरबंदर, जूनागढ़ एवं अहमदाबाद में आयोजित)

• चक्रधर संगीत समारोह, छग-2020 (डिजिटल स्टेज पर वायलिन वादन)

• उस्ताद अलाउद्दीन खां संगीत एवं कला अकादमी द्वारा आयोजित गमक श्रृंखला के अंतर्गत पखावज के साथ वायलिन की प्रस्तुति-2021

• श्री सप्तमेश उत्सव हेमू गढ़वी हॉल-राजकोट

• वायलिन सप्तक, भारत भवन-भोपाल

• उत्तराधिकार श्रृंखला वायलिन जुगलबंदी, जनजातीय संग्रहालय- भोपाल

• महाकाल महोत्सव-उज्जैन (2019 )

• गणेश उत्सव  इंदौर का राजा में पंचनाद में वायलिन वादन, ओशो ध्यान केंद्र, श्री भूतेश्वर महादेव मंदिर, श्री सत्य साईं विद्या विहार सभागार, श्री शनैश्चर संगीत समारोह, मल्हार उत्सव, नदी उत्सव, रविन्द्र नाट्य गृह, जाल सभागृह, ओशो ध्यान केंद्र (सभी इंदौर)

• युवा उत्सव- डॉ हरिसिंह गौर केन्द्रीय वि.वि, सागर

• बाबा साहेब अम्बेडकर वि.वि.-औरंगाबाद

• जीवाजी वि.वि - ग्वालियर आदि कई संगीत समारोहों में एकल वादन तथा संगतकार के रूप में वायलिन वादन की प्रस्तुतियां दे चुकी हैं.

सन्दर्भ स्रोत : सीमा चौबे की पूर्णिमा राजपुरा से हुई बातचीत पर आधारित 

© मीडियाटिक

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