मालिनी गौड़ : गृहिणी से बनीं नेता और शहर को बना दिया नंबर वन

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मालिनी गौड़ : गृहिणी से बनीं नेता और शहर को बना दिया नंबर वन

छाया : युअर स्टोरी डॉट कॉम 

• रुखसाना मिर्ज़ा 

जब शादी हुई तो वे घूंघट में रहती थीं। 50 सदस्यों के बड़े संयुक्त परिवार में उनका ससुराल  था। उस वक्त राजनीति में आने के बारे में सोचा भी नहीं था। यह कहना है इंदौर - 4 से विधायक और पूर्व महापौर मालिनी गौड़ का जिनके कार्यकाल में ही इंदौर, स्वच्छता में देश में नंबर वन बना। 

भारतीय जनता पार्टी के विधायक लक्ष्मण सिंह गौड़ की 2008  में सड़क दुर्घटना में मृत्यु के बाद उनकी पत्नी मालिनी गौड़ को टिकट दिया गया और तभी से वे लगातार विधायक हैं। हालांकि शुरुआत में वे राजनीति में आने के लिए उत्सुक नहीं थीं पर तत्कालीन मुख्यमंत्री  शिवराज सिंह चौहान के जोर देने की वजह से वे राजी हुईं। 
 

पहला भाषण दिया जब कांप रहे थे पैर

लक्ष्मण सिंह जी के गुजर जाने के कुछ समय बाद उनकी मूर्ति के अनावरण कार्यक्रम में पहली बार भाषण दिया था। मालिनी जी बताती हैं कि उस वक़्त मंच पर चढ़ते हुए पैर कांप रहे थे। तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी वहां मौजूद थे। मैं भाषण लिख कर लाई थी पर पढ़ते हुए मेरा गला भर आया था। इस घटना के कुछ ही दिन बाद फाग यात्रा  में बोलना भी मेरे लिए बहुत कष्टदायी था, क्योंकि मुझे उनके साथ बिताया हर पल याद आ रहा था। उन यादों से उबरना मेरे लिए आसान नहीं रहा। पहला चुनाव लड़ा तब भी मैं लिखा हुआ भाषण ही देती थी। 

विधानसभा में मुख्यमंत्री ने हौसला बढ़ाया 

श्रीमती गौड़ जब पहली बार विधानसभा में पहुंची तो विधायकों की कार्यशाला में कायदे-कानूनों को ध्यानपूर्वक समझा। राज्यपाल के अभिभाषण के बाद मैने भाषण दिया तो घबराई हुई थी, पर सब कुछ ठीक रहा और मुख्यमंत्री ने हाथ के इशारे से तारीफ़ की जिससे मेरा हौसला बढ़ा। धीरे-धीरे मैने बिना लिखे भाषण देना सीख लिया। 

बचपन से देखा संघर्ष

मालिनी जी का जन्म उनके नाना के घर झाबुआ में 19 जून 1961 में हुआ। उनके पिता मणिलाल खत्री इंदौर में फ्लाइंग क्लब में स्टोरकीपर थे और मां मीनाक्षी जी गृहिणी थीं।  पांच भाई- बहनों में उनका नंबर तीसरा है। पिताजी बड़ी मुश्किल से सब बच्चों को पढ़ा रहे थे। मालिनी जी शुरू से ही पढ़ाई में अच्छी थीं, साथ ही एनसीसी में घुड़सवारी भी करती थीं। जब बीए अंतिम वर्ष में आई तो खस्ता माली हालत के चलते पिताजी ने फीस भरने से मना कर दिया। उस वक्त एक सहेली ने मदद की और वे ग्रेज्युएट हो सकीं। 

विरोध के बावजूद किया अंतरजातीय विवाह 

लक्ष्मण सिंह जी और मालिनी जी के घर लोधीपुरा में आमने-सामने ही हुआ करते थे। मालिनी जी 11 वीं कक्षा में थी और लक्ष्मण सिंह जी कॉलेज में, तभी से दोनों के बीच प्रेम का अंकुर फूटा, उन्होंने तय कर लिया था कि वे एक-दूसरे को जीवनसाथी बनायेंगे। हालांकि इस मामले में जाति एक बड़ी बाधा थी। मालिनी जी स्वर्णकार और लक्ष्मण सिंह जी क्षत्रिय।  मालिनी जी के माता-पिता बेहद नाराज़ थे। तब इस जोड़े ने तय किया कि मालिनी जी कि दो बड़ी बहनों की शादी के बाद ही वे शादी करेंगे। इस बीच मालिनी जी ने एक स्कूल में और फिर एक बैंक में नौकरी भी की। 1981 में जब शादी हुई तो उसमें उनके मेरे माता- पिता शामिल नहीं हुए। जब बेटे एकलव्य का पहला जन्मदिन मनाया तब उनके जेठ पिताजी को आमंत्रित करने गए। उसके बाद से मालिनी जी का मायके में आना- जाना शुरू हुआ। बाद में जुड़वां बेटे कर्मवीर और धर्मवीर का जन्म हुआ। कर्मवीर डॉक्टर हैं और धर्मवीर रेस्तरां का संचालन करते हैं। एकलव्य, मालिनी जी के राजनीतिक सहयोगी हैं। 

शहर को बनाया सफाई का ब्रांड

सफाई में इंदौर को नंबर वन बनाना महापौर के रूप में मालिनी गौड़ की सबसे बड़ी उपलब्धि है। उन्होंने 2015 में महापौर बनते ही सोच लिया था कि शहर को कचरे से उफनती कचरा पेटियों से मुक्त किया जाये। इसके लिये उन्होंने पहले एक वार्ड में डोर टू डोर कचरा उठवाने और कचरा पेटियां हटाने की शुरुआत की। जब यह प्रयोग सफल रहा तो पूरे शहर में इसे लागू किया।

जुनून की तरह किया काम

मालिनी जी ने सफाई के काम को जुनून की तरह लिया। रात में सफाई के लिए विदेशों से मशीनें मंगवाईं। इस काम की निगरानी के लिए आधी रात को वे खुद सडक़ों पर होतीं। सडक़ पर कचरा फैंकने वालों को खुद ही पकड़तीं और स्पॉट फाइन करतीं। इस तरह के जुर्माने से उन्होंने एक लाख रुपए निगम के खजाने में जमा करवाये। कचरे के पहाड़ इस तरह खत्म किये कि वहां पर प्री-वेडिंग शूट होने लगे। कचरे की रिसाइक्लिंग से कमाई भी शुरू की गई। स्वच्छता अभियान को सुचारू रूप से चलाने और सफल बनाने में  तत्कालीन निगम आयुक्त श्री मनीष सिंह की भी बड़ी भूमिका रही। 

पुराने गाने हैं पसंद 

जब राजनीति में नहीं थीं, तब मालिनी जी को किताबें पढ़ने का शौक था - खासतौर से विवेकानंद की। लेकिन राजनीति में आने के बाद अब समय नहीं मिलता। जो भी थोड़ा-बहुत वक़्त मिलता है तो उसे पोते-पोतियों के साथ बिताती हैं और पुरानी फिल्मों के गाने सुनती हैं। 

सन्दर्भ स्रोत : मालिनी गौड़ से रुखसाना मिर्ज़ा की बातचीत पर आधारित 

© मीडियाटिक

 

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