छाया : स्व संप्रेषित
• सारिका ठाकुर
कुछ लोग ताउम्र ख़ामोशी से काम करने में यकीन रखते हैं, अगर बोलना ज़रूरी हो तो भी वे नहीं, उनका काम बोलता है। विदुषी डॉ. रजिया हामिद ऐसी ही एक हस्ती हैं। आज उम्र के चौथे पड़ाव पर भी ऊर्जा से भरपूर हैं और अपनी किताबें पूरी करने का हौसला रखती हैं। उनकी ज़्यादातर किताबें उर्दू में हैं जिसमें से कुछ कहानी संग्रह को छोड़कर विभिन्न विषयों पर उनके शोध और कुछ आलोचनात्मक पुस्तकें हैं। उनकी कुछ किताबें देवनागरी में भी अनुदित हैं।
डॉ. रज़िया का जन्म 1 सितम्बर 1946 को भोपाल में हुआ। उनके पिता जनाब सैयद फ़तह अली, नवाब हमीदुल्लाह के निजी सचिव थे। उनकी माँ सय्यदा बेगम गृहणी थीं। पाँच भाई बहनों में रज़िया सबसे बड़ी हैं। इनकी सगी बहन डॉ. राहत बद्र, मशहूर शायर बशीर बद्र की जीवन संगिनी हैं।
डॉ. रज़िया और उनके सभी भाई-बहनों ने ऊँची तालीम हासिल की। उनकी तरह उनकी छोटी चारों बहनों ने पीएचडी की। इसके पीछे वजह उनकी वह परवरिश है जो उन्हें मिली। उल्लेखनीय है कि भोपाल में चार पीढ़ियों तक नवाब बेगमों का शासन रहा। उन्होंने भोपाल के सामाजिक-सांस्कृतिक मजबूती देने के साथ ही लड़कियों की शिक्षा पर भी ज़ोर दिया। खासतौर पर सुलतान जहाँ बेगम लड़कियों की शिक्षा को लेकर बहुत ही गंभीर थीं।
उन दिनों डॉ. रज़िया का परिवार शीश महल में रहा करता था। रज़िया जी ने हायर सेकेण्डरी तक की शिक्षा सुल्तानिया गर्ल्स हायर सेकेण्डरी स्कूल से हासिल की। ग्रेजुएशन के लिए उनका दाखिला महारानी लक्ष्मीबाई कॉलेज में हुआ जो उस समय विक्रम विवि,उज्जैन से सम्बद्ध था। दाखिले के पहले वर्ष उनकी शादी 1964 में डॉ. सैयद मोहम्मद हामिद से हो गयी। डॉ. हामिद बीएचईएल में कार्यरत थे और सीनियर डी.जी.एम.के पद से सेवानिवृत्त हुए। शादी के बाद रज़िया शीश महल से बुधवारे में स्थित असगर मंजिल आ गयीं। यह एक बहुत बड़ी हवेली थी जिसमें हामिद साहब के परिवार के अलावा अलग-अलग हिस्सों में उनके चार चाचाओं के परिवार भी रहते थे। ससुराल में सभी पढ़े-लिखे थे। महिलाएँ स्कूल नहीं गयीं थीं लेकिन उन्हें अंग्रेज़ी पढ़ाने के लिए एक ‘मेम साहब’ आती थीं। पढ़ाई-लिखाई का महत्व सभी जानते थे इसलिए रज़िया को पढ़ाई जारी रखने में कभी दिक्कत नहीं आई। शादी के बाद एक साल कॉलेज भी गयीं लेकिन पहली संतान के जन्म के बाद घर से पढ़ने लगीं।
इसी तरह उन्होंने 1972 में भोपाल विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर की उपाधि हासिल कर ली। वर्ष 1979 में हामिद साहब का तबादला दिल्ली हो गया और रज़िया भी बच्चों को लेकर दिल्ली आ गयीं. भरे-पूरे घर में रहने की आदत रखने वाली रज़िया दिल्ली में जल्द ही ऊबने लगीं, क्योंकि पति नौकरी पर और बच्चे स्कूल चले जाते, फिर उनके लिए कोई काम ही नहीं बचता था। उन्होंने जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय में दाखिला ले लिया और उर्दू विषय लेकर डबल एम.ए. किया। इधर दिल्ली जाने से पहले वे पीएचडी के लिए पंजीयन करवा चुकी थीं, जो 1982 में पूरी हो गई। इसके बाद उन्होंने किसी कॉलेज में पढ़ाने का मन बनाया। उस समय जवाहरलाल नेहरु विवि में रिक्ति निकली थी, वे आवेदन करतीं उससे पहले ही उनके पति के नागपुर तबादले की बात चलने लगी। वे सोच में पड़ गयीं। आखिरकर उन्होंने आवेदन न करने का फ़ैसला किया, इधर उनके पति का तबादला भी टल गया। वे तेईस सालों तक इसके बाद दिल्ली में रहीं। आवेदन न कर पाने का मलाल उन्हें आज भी है।
हामिद साहब के सेवानिवृत्त होने के बाद सन् 2000 में वे भोपाल लौट आयीं। इस बीच उनमें पढ़ने और लिखने का जूनून बरकरार रहा। छठवीं से ही वे कुछ-कुछ लिखने लगीं थी। आगे चलकर मशहूर हस्तियों पर शोध करने को लेकर उनकी दिलचस्पी जागी। सबसे पहले उन्होंने अपने पीएचडी के विषय ‘नवाब सिद्दीकी हसन खां’ साहब पर आधारित किताब प्रकाशित करवाया. इसके बाद तो जैसे सिलसिला सा चल निकला। खूब पढ़ना और खूब लिखना उनकी जिंदगी का हिस्सा बन गया।
उनके लेखन को दो हिस्सों में बांटा जा सकता है। पहली के तहत उनकी ग़ज़लें और कहानियाँ हैं और दूसरी के तहत उनके शोधकार्य हैं।
वे सन 1987 से सह माही फिक्र-ओ-आगही नाम से एक पत्रिका निकालने लगीं। यह वार्षिक पत्रिका किसी एक मशहूर हस्ती पर आधारित विशेषांक होता। इन विशेषांकों में बशीर बद्र, रिफ़त सरोश, बेकल उत्साही, मोहम्मद अहमद सब्ज़वारी, अख्तर सईद खां आदि का नाम उल्लेखनीय है। इस कड़ी में मशहूर हस्तियों के अलावा कुछ विशेषांक भोपाल और अलीगढ़ पर भी आधारित थे।
इसी तरह उनकी किताबें भी मशहूर हस्तियों पर उनके द्वारा किये गए शोध पर आधारित हैं। इस कड़ी में नवाब सिद्दीकी हसन साहब के अलावा कासिम रज़ा, मोहम्मद खालीद आबिदी, नवाब सुलतान जहाँ बेगम, नवाब शाहजहाँ बेगम आदि का नाम उल्लेखनीय है। उनकी ये किताबें और विशेषांक उर्दूभाषी शोधकर्ताओं के लिए प्रमाणिक सन्दर्भ ग्रंथ मानी जाती हैं। डॉ. रज़िया की ज्यादातर किताबें उर्दू भाषा में लिखी गयीं हैं, कुछ-कुछ किताबें हिन्दी और उर्दू दोनों भाषाओँ में छपी हैं।
उर्दू की विदुषी महिला के रूप में स्थापित डॉ. रज़िया हामिद, जामिया मिलिया इस्लामिया में संचालित बज़्म-ए-उर्दू की 1982-83 की सचिव रहीं। वे इकबाल पुस्तकालय की सदस्य हैं। इसके अलावा भी वे कई संस्थाओं से जुडी रही हैं। साहित्यिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेने डॉ. रज़िया सऊदी अरब, अरब अमीरात, पाकिस्तान, इंग्लैण्ड, इंडोनेशिया और मलेशिया की यात्रा कर चुकी हैं।
वर्तमान में वे भोपाल के ईदगाह हिल्स इलाके में रहती हैं और सात-आठ किताबों पर काम कर रही हैं। वे हाथ से लिखती हैं जिन्हें कम्प्यूटर पर टाइप करने के लिए उनके सहायक हर दिन आते हैं। हामिद साहब स्मृतिभ्रम (डिमेंशिया) से पीड़ित हैं। डॉ. रज़िया के चार बच्चे हैं, जो अपनी अपनी जगह कामयाब जिन्दगी जी रहे हैं।
प्रकाशित कृतियाँ
• नवाब सिद्दीक हसन खां : 1983
• लम्हों का सफ़र : 1984
• मुआविने हज (हिन्दी-उर्दू) : 1985
• एतबार : 2004
• शज़र-ए-सायादार : 2005
• अरमुगान-ए-अख्तर सईद खां
• ऐतराफ़ : कासिम रज़ा - शख्सियत और शायरी: 2006
• मोहम्मद खालिद आबिदी –एक मुतालया: 2006
• भोपाली उर्दू : 2006
• यादों की महक : 2007
• कायनात –फिक्र-ओ-नज़र : 2009
• नवाब सुल्तान जहाँ बेगम: 2010
• सरमाया-ए-फ़िक्र-ओ-नज़र: 2011
• रुदाद-ए-चमन (अलीगढ़ से मुतअल्लिक यादें): 2013
• नवाब शाहजहां बेगम : 2015
• सर सैय्यद अहमद खां : 2017
• मता-ए-कलम : 2017
• आसार-ए-हर्फ़ : 2018
• नज़्र-ए-भोपाल : 2019
• अलीगढ़ तहरीक, सर सैय्यद, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी : 2020
• फ़हम-ओ-इदराक : 2020
• अलीगढ़ तहरीक : 2021
• ज़िंदगी ऐ ज़िन्दगी : 2023
• इंतज़ार-ए-बहर : 2025
पुरस्कार/सम्मान
• ऑल इण्डिया मगरिबी बंगाल उर्दू अकादमी अवार्ड -1984
• यूपी उर्दू अकादमी अवार्ड -1984
• बिहार उर्दू अकादमी अवार्ड -1984
• मगरिबी बंगाल उर्दू अकादमी अवार्ड -1990
• इम्तियाज़-ए-मीर अवार्ड, मीर अकादमी, लखनऊ-1997
• निशान-ए-सिपास : भोपाल इंटरनेशनल फोरम, कराची -2000
• एज़ाज़ व सिपास नामा, कहकशान-ए-अदब, भोपाल -2000
• बिहार उर्दू अकादमी अवार्ड -2003
• यूपी उर्दू अकादमी अवार्ड - 2010
• मौलाना अबुल कलाम आजाद अवार्ड(मप्र शासन) –2011
• उर्दू अकादमी, बिहार अवार्ड -2012
• उर्दू अकादमी, उत्तर प्रदेश अवार्ड -2013
• उर्दू अकादमी बिहार अवार्ड -2015
सन्दर्भ स्रोत : डॉ. रजिया हामिद से सारिका ठाकुर की बातचीत पर आधारित
© मीडियाटिक



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