• सीमा चौबे
इंदौर में पदस्थ एडिशनल डीएसपी डॉ. सीमा अलावा न केवल पुलिस सेवा में उत्कृष्ट कार्य कर रही हैं, बल्कि पारंपरिक पिथौरा कला को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। वे संभवत: अकेली ऐसी अधिकारी हैं, जिन्होंने अपनी ड्यूटी के साथ-साथ जनजातीय कला के संरक्षण और संवर्धन को अपना मिशन बना लिया है। एक ओर वे अपराध और कानून-व्यवस्था की जटिल चुनौतियों से जूझती हैं, तो दूसरी ओर पिथौरा कला जैसी विलुप्त होती आदिवासी परंपरा को नया जीवन देने में जुटी हैं।
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
डॉ. अलावा का जन्म 15 अगस्त 1976 को धार जिले के मनावर में हुआ। उनके पिता श्री मंगल सिंह मंडलोई वाणिज्य कर विभाग में अधिकारी थे, जबकि माता श्रीमती हंसा मंडलोई गृहिणी हैं। पिता के स्थानांतरण के कारण उनका बचपन नीमच, रतलाम और खरगोन जैसे शहरों में बीता। जहाँ से उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की। आगे चलकर उन्होंने विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन से स्नातकोत्तर तथा देवी अहिल्या विश्वविद्यालय इंदौर से अर्थशास्त्र में एम।फिल की उपाधि प्राप्त की। इसके साथ ही ‘चैलेंजेस ऑफ पुलिस एट वर्कप्लेस’ विषय पर पीएचडी पूरी की तथा मानव तस्करी (Human Trafficking) पर शोध कार्य करते हुए डिप्लोमा भी प्राप्त किया।
पुलिस सेवा में सफ़र
चार भाई-बहनों में दूसरे नम्बर की सीमा का पुलिस सेवा में आना पहले से तय नहीं था, लेकिन समाज के लिए कुछ करने की भावना हमेशा रही। बचपन से ही लोगों की मदद करने का स्वभाव उन्हें इस दिशा में ले आया। वर्ष 1996 में पिता का तबादला इंदौर हो गया। सीमा ने इसी साल मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग की परीक्षा दी और दो साल बाद उनका चयन राज्य पुलिस सेवा में हो गया। उस समय वे महज 21 वर्ष की थी विभिन्न जिलों में उप पुलिस अधीक्षक रहने के बाद 2012 में उज्जैन अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक के पद पर प्रमोशन हुआ। वर्तमान में वे इंदौर में अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक के रूप में सेवाएं दे रही हैं।
अपने सेवाकाल में अब तक उन्होंने कई चुनौतीपूर्ण मामलों को सुलझाया है। अलीराजपुर में तैनाती के दौरान उन्होंने चाइल्ड ट्रैफिकिंग के एक जटिल मामले का पर्दाफाश किया, जिसमें 17 बच्चों को सुरक्षित बचाया गया। वर्ष 2015 में हुए पेटलावद विस्फोट कांड की जांच उनके करियर का सबसे कठिन दौर रहा, जहां लगभग 90 लाशों और 200 से अधिक घायलों की स्थिति से निपटना एक बड़ी चुनौती थी। पेटलावद में रहते हुए उन्होंने डायन प्रथा के उन्मूलन के लिए डॉक्यूमेंट्री बनाई और जन जागरूकता अभियान चलाए। महिलाओं और वंचित समुदायों के अधिकारों के लिए काम किया।
पारिवारिक जीवन
वर्ष 2003 में उनका विवाह धरमपुरी निवासी अंतर सिंह अलावा (सिविल जज) से हुआ। उनके दो बच्चे हैं बेटा आर्यन, जो डिज़ाइनिंग की पढ़ाई कर रहा है और बेटी जान्हवी बारहवीं करने के बाद उच्च शिक्षा की तैयारी कर रही हैं।
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कला से परिचय और पिथौरा से जुड़ाव
कला के प्रति उनका झुकाव बचपन से ही था, लेकिन इसे नई दिशा अलीराजपुर और झाबुआ में उनकी पोस्टिंग के दौरान मिली। वर्ष 2015 में झाबुआ में एक हत्याकांड की जांच के सिलसिले में वे एक गांव पहुँची, जहाँ घरों की दीवारों पर बनी पिथौरा कला से पहली बार उनका परिचय हुआ। यह अनूठी चित्रकला उन्हें इतनी प्रभावित कर गई कि उनके मन में इसके प्रति गहरी जिज्ञासा उत्पन्न हो गई।
जांच पूरी कर वे अपने दफ़्तर लौट तो आईं, लेकिन उनका मन उसी चित्रकारी में अटका रहा। उन्होंने इस कला का गहराई से अध्ययन किया और इसे सीखने का निर्णय लिया। वे स्वयं गांवों में जाकर कलाकारों से मिलीं, उनसे इस कला की बारीकियां समझीं और धीरे-धीरे इसमें दक्षता हासिल की। हालांकि एक निश्चित स्तर की निपुणता प्राप्त करने में उन्हें कई वर्ष लग गए। शुरुआत में, कई कलाकारों ने उन्हें सिखाने से इनकार कर दिया क्योंकि उनका मानना था कि इससे उन्हें नुकसान होगा।
वर्ष 2018 में उन्होंने अलीराजपुर कलेक्टर कार्यालय के लिए अपनी पहली बड़ी पिथोरा पेंटिंग बनाई।
कला का विस्तार और पहचान
समय के साथ उन्होंने अपनी बनाई पेंटिंग्स को कार्यालयों और सार्वजनिक स्थानों पर प्रदर्शित करना शुरू किया। वे जब भी किसी नई जगह स्थानांतरित होती हैं, अपने दफ़्तर में पिथौरा पेंटिंग अवश्य लगाती हैं। अन्य अधिकारी जब इन पेंटिंग्स को देखते हैं, तो वे उन्हें इस कला की विशेषताओं और इसके सांस्कृतिक महत्व के बारे में बताती हैं।
अब तक वे 200 से अधिक पेंटिंग्स बना चुकी हैं, जो देश-विदेश के अनेक महत्वपूर्ण स्थानों पर प्रदर्शित हैं। उनके इस प्रयास के कारण पिथौरा कला को व्यापक पहचान मिलने लगी है। उनकी बनाई पेंटिंग्स खंडवा के कलेक्ट्रेट और अन्य सरकारी भवनों से आगे बढ़कर मध्यप्रदेश राजभवन तथा दोहा स्थित भारतीय दूतावास तक पहुँच चुकी हैं। इसके अलावा, कई पुलिस अधिकारियों के घरों में भी उनकी पेंटिंग्स सजाई गई हैं। सामान्य जन भी अपने घरों व कार्यालयों को सजाने के लिए उनकी कलाकृतियां खरीदते हैं।
खंडवा में ‘लोक कला का सार’ शीर्षक से आयोजित अपनी पहली एकल प्रदर्शनी में उन्होंने 32 पेंटिंग्स प्रस्तुत कीं। इसके अतिरिक्त, उन्होंने अब तक की अपनी सबसे बड़ी पेंटिंग भी बनाई है, जिसकी लंबाई 147 वर्ग मीटर है।
जब कला लुप्त होने लगी
आर्थिक कठिनाइयों के कारण कई पारंपरिक कलाकार इस कला को छोड़कर मजदूरी करने लगे, नतीजतन पिथौरा जैसी समृद्ध परंपरा धीरे-धीरे समाप्त होने की कगार पर पहुंच रही थी। ऐसे समय में डॉ. अलावा ने इस स्थिति को गंभीरता से लिया और इस कला को पुनर्जीवित करने का संकल्प लिया। यूनिसेफ के साथ मिलकर पिथोरा कला को वैश्विक मंच दिलाया, अलीराजपुर कलेक्टर कार्यालय में पेंटिंग प्रदर्शित कराई, पुलिस लाइन की महिलाओं को प्रशिक्षण दिया, कार्यशालाओं के माध्यम से कलाकारों को जोड़ा और इस तरह उनके प्रयासों से यह कला फिर से चर्चा में आई।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कला की पहचान
डॉ. अलावा की पेन्टिग्स विदेशों में भी कुछ खास शख्सियतों के घर की शोभा बढ़ा रही हैं, जिनमें यूनाइटेड किंगडम के पहले अप्रवासी भारतीय हाई शेरिफ़ रेशम सिंह संधू और पत्रकार सह उद्यमी रोमेल गुलज़ार शामिल हैं। इसके अलावा लेसेस्टेरशायर के डिप्टी चीफ कॉन्स्टेबल डेविड सैन्डल को भेंट की गई पेंटिंग्स आज लेसेस्टेर के पुलिस मुख्यालय में भारतीय जनजातीय संस्कृति की झलक प्रस्तुत कर रही हैं। एक पेंटिंग दोहा स्थित भारतीय दूतावास में भी प्रदर्शित की गई है।
अवसाद से उबरने में कला का योगदान
वर्ष 2021 में कोरोना काल में पति के निधन के बाद वे गहरे अवसाद में चली गईं। उस कठिन समय में पेंटिंग उनके लिए संबल बनी। वे कहती हैं कि जब वे पेंटिंग करती थीं, तब और कोई ख्याल मन में नहीं आते थे। उन्होंने अपनी पीड़ा को रंगों में ढालकर खुद को फिर से संभाला।
ऐतिहासिक उपलब्धि और विश्व रिकॉर्ड
डॉ. सीमा ने अपनी कला के माध्यम से एक और ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की। SGSITS (इंदौर) के प्रतिबिंब क्लब द्वारा 3 एवं 4 फरवरी 2024 को कॉलेज परिसर में एक विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसमें प्रतिभागियों को लगातार 30 घंटे तक पेंटिंग बनाने की चुनौती दी गई थी। इस कठिन और चुनौतीपूर्ण कार्यक्रम में डॉ. सीमा ने अपने सहयोगियों के साथ अद्भुत समर्पण, धैर्य और एकाग्रता का परिचय देते हुए निर्धारित समय तक काम किया। इस दौरान उन्होंने पिथौरा कला में 6×15 फीट की एक विशाल पेंटिंग तैयार की। उनकी इस असाधारण उपलब्धि के परिणामस्वरूप पिथौरा चित्रकला को Guinness Book of World Records में दर्ज किया गया
कला संरक्षण की दिशा में पहल
कला संरक्षण और आदिवासी कलाकारों को बेहतर मंच उपलब्ध कराने के उद्देश्य से उन्होंने वर्ष 2025 में अपने बेटे के सहयोग से ‘कीप इट अप फाउंडेशन’ की स्थापना की। इस संस्था के माध्यम से वे ट्राइबल कलाकारों को मंच, प्रशिक्षण और संसाधन उपलब्ध करा रही हैं। वे मानती हैं कि कलाकारों की सबसे बड़ी समस्या बाजार की कमी है। इसलिए वे वर्कशॉप्स, प्रदर्शनियों और पेंटिंग्स की बिक्री से प्राप्त राशि का उपयोग कलाकारों को कैनवास और रंग उपलब्ध कराने में करती हैं।
भविष्य का सपना और मिशन
डॉ. अलावा का सपना दुनिया की सबसे बड़ी पिथोरा पेंटिंग बनाने का है। इसके लिए वे रामायण सीरीज़ पर काम कर रही हैं, जो उनकी अब तक की सबसे बड़ी पेंटिंग परियोजना है। इसे एक से डेढ़ साल में पूरा करने का लक्ष्य है और इसे वर्ल्ड रिकॉर्ड तक पहुंचाने की योजना है। अब तक, उनकी सबसे बड़ी पिथोरा पेंटिंग 341 फीट की है, जो खंडवा में है। उन्होंने इसे बड़ी पेंटिंग बनाने से पहले एक तरह के अभ्यास के तौर पर बनाया था।
व्यस्तता के बावजूद वे प्रतिदिन पेंटिंग के लिए एक घंटे का समय निकालती हैं। उनका सपना है जिस प्रकार मधुबनी कला को वैश्विक पहचान मिली है, उसी तरह पिथौरा कला भी अपनी अलग पहचान बनाए। वे स्वीकार करती हैं कि नौकरी की व्यस्तता के कारण वे इस कला से जुड़े ग्रामीण कलाकारों को पर्याप्त सहयोग नहीं दे पाई हैं, लेकिन सेवानिवृत्ति के बाद वे अपना पूरा समय इसी कला को समर्पित करना चाहती हैं।
उपलब्धियां/सम्मान
• महिलाओं के विरुद्ध अत्याचारों के खिलाफ किए गए कार्यों के लिए ‘श्री संपत्ति देवी विजयवर्गीय महिला कल्याण सम्मान’ (2022)
• पारंपरिक एवं रचनात्मक आदिवासी कला और शिल्प के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान के लिए ‘जनगढ़ श्याम सम्मान’ राष्ट्रीय पुरस्कार (2022)
• उत्कृष्ट सामाजिक कार्यों के लिए ‘शक्ति अवॉर्ड’ (2023)
• वंचित एवं पीड़ित वर्ग को न्याय की सुलभता सुनिश्चित करने से संबंधित विषय पर किए गए उत्कृष्ट शोध एवं लेखन कार्य के लिए PRIMAL (Pracademic Action Research Initiative for Multidisciplinary Action Lab) द्वारा “JIVA” प्रशस्ति पत्र प्रदान
उन्हें विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए 80 से अधिक प्रशंसा-पत्र (Appreciations) प्राप्त हुए हैं। उन्होंने नकली मुद्रा एवं यात्रा दस्तावेजों की जालसाजी के मामलों में महत्वपूर्ण कार्य किया है। साथ ही, मानव तस्करी से संबंधित मुद्दों एवं चुनौतियों से निपटने में पुलिस की भूमिका पर कार्य किया तथा इस विषय पर पोस्टर प्रेजेंटेशन भी प्रस्तुत किया।
सन्दर्भ स्रोत : सीमा अलावा से सीमा चौबे की बातचीत पर आधारित
© मीडियाटिक



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