बहुमुखी प्रतिभा की धनी दीप्ति कुशवाहा

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बहुमुखी प्रतिभा की धनी दीप्ति कुशवाहा

• सारिका ठाकुर

स्त्रियाँ स्वभावतः रचनात्मक होती हैं। उनके सौंदर्यबोध और रचनात्मक कौशल के कारण ही इस दुनिया में रंग, खुशबू और उनसे मिलने वाली खुशियों का जादू आज भी कायम है। दीप्ति कुशवाह इस बात की जीती जागती मिसाल हैं, वे सुई और धागे की मदद से न केवल लोक कला का सजीव चित्रण करती हैं, बल्कि एक सशक्त साहित्यकार और पत्रकार भी हैं। उनकी कल्पना कभी डिजाईन के रूप में आकार लेती हैं तो कभी शब्दों में बंधकर कविता या निबंध के रूप में व्यक्त होती है। जाहिर है दीप्ति कुछ उन गिने-चुने प्रतिभाशाली लोगों में से हैं जो कई माध्यमों से खुद को व्यक्त कर सकती हैं। 

15 दिसंबर 1963 को बालाघाट में जन्मी दीप्ति के पिता डॉ. जे.एल.पटेल पशु संवर्धन विभाग में उपनिदेशक रहे हैं, जबकि माता श्रीमती विमल पटेल गृहिणी हैं। तीन भाइयों- संजय, जयंत, संदीप - वाले इस खुशहाल परिवार की विशेषता उसका साहित्यिक-सांस्कृतिक वातावरण था। दीप्ति स्मरण करती हैं, “हमारे घर में ईंटों से अधिक किताबें थीं। घरों में जिस तरह राशन आता है, हमारे घर में पत्रिकाएँ आती थीं। पिताजी की समृद्ध लाइब्रेरी थी।” 

प्रारंभिक शिक्षा विभिन्न स्थानों पर प्राप्त करने के बाद उन्होंने नरसिंहपुर में शासकीय पुत्री शाला, कंदेली और महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या विद्यालय से अध्ययन पूरा किया। पिता स्वयं कवि और चित्रकार थे, वहीं माँ को भी पठन-पाठन में गहरी रुचि थी। वे पत्र-पत्रिकाओं से कविताएँ संकलित कर डायरी में संजोती थीं। घर की दीवारें उस समय के मूर्धन्य चित्रकार एस.एम.पंडित, दलाल, मूलगांवकर, रामकुमार वर्मा की कृतियों से सजी रहती थीं। इस परिवेश का प्रभाव दीप्ति के व्यक्तित्व पर स्वाभाविक रूप से पड़ा। 

बचपन में चम्पक, नंदन, पराग के साथ ‘सोवियत भूमि’ और ‘सोवियत नारी’ जैसी पत्रिकाएँ और ज्ञानभारती बाल पॉकेट बुक्स  उनकी प्रिय थीं। उनकी माँ  कढ़ाई-बुनाई करती थीं और  त्योहारों पर आँगन में चौक पूरा करती थीं। माँ की चित्रकला ने दीप्ति के भीतर लोककलाओं के प्रति प्रेम जगाया, दीप्ति ने कढ़ाई की तकनीक भीउनसे ही सीखी। मंडला में पदस्थापना के दौरान दीप्ति के पिता उन्हें महान चित्रकार हैदर रज़ा का जन्म स्थान दिखाने बाबरिया ले गए गए थे। इस साहित्यिक-सांस्कृतिक वातावरण का असर स्वाभाविक रूप से दीप्ति पर भी पड़ा। 

कॉलेज की पढ़ाई के दौरान दीप्ति शहर की साहित्यिक, सांस्कृतिक गतिविधियों में हिस्सा लेने लगी थीं। राज्य स्तरीय निबंध प्रतियोगिता में प्रथम आने पर उन्हें गणतंत्र दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में तत्कालीन वन मंत्री श्री अजय नारायण मुशरान के हाथों पुरस्कृत किया गया। खेलों में भी दीप्ति की रुचि थी। उन्होंने विश्वविद्यालय स्तर तक बैडमिंटन खेला है| पिता ने उन्हें शास्त्रीय संगीत और माँ ने सिलाई सीखने को प्रेरित किया। 

दीप्ति ने शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय में जीवविज्ञान विषय लेकर दाखिला लिया। प्रथम वर्ष में ही महाविद्यालय में छात्रसंघ चुनाव में दीप्ति ने, पिता के प्रोत्साहन से, सहसचिव के लिए चुनाव लड़ा| अब तक किसी छात्रा ने चुनाव नहीं लड़ा था । हालाँकि दीप्ति चुनाव हार गयीं लेकिन उनके व्यक्तित्व की बुनियाद तभी तैयार हो गयी। डॉ हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर से दीप्ति ने स्नातकोत्तर की उपाधि हासिल की। 

महाराष्ट्र विद्युत मण्डल में कार्यपालन अभियंता रहे विनय कुशवाह से विवाह और दो पुत्रों- दिव्य और यश के बड़े होने तक दीप्ति की प्रतिभा सही वक़्त के इंतज़ार में रही। नागपुर में उनके भीतर लम्बे समय से छिपे बीज का अंकुरण हुआ। उन्होंने शहर की सामाजिक-साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों में सक्रियता दिखाई। उनके मंच संचालन की कला को खूब सराहा गया और कई बड़े आयोजनों में उन्होंने यह काम बखूबी किया। नागपुर से बाहर भी उन्हें बुलाया जाता रहा। इस बीच उन्होंने टेक्सटाइल डिजाइनिंग की पढ़ाई भी की।
इस बीच उनके लेख और कविताएं स्थानीय और राष्ट्रीय स्तर की पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगे। लोककला आधारित उनके लेख और चित्रांकन कला पत्रिकाओं में सराहे जाते थे। उन्होंने शहर में आयोजित होने वाली बोनसाई पौधों की प्रदर्शनियों और पुष्प सज्जा प्रतियोगिताओं में भाग लिया और पुरस्कार जीते।

हाथ की सुईकारी (कढ़ाई ), चूंकि एक लुप्त होती कला है, तो दीप्ति ने उसे नवाचार से जोड़ा। ज़मीन पर बनाए जाने वाले चित्रों और भित्ति सज्जा की लोककलाओं को उन्होंने कढ़ाई के जरिए कपड़े पर उकेरा। मधुबनी, वारली, ऐपण, गोंड, मांडणा लोक चित्र शैली के नमूनों को उन्होंने सुई-धागे से आकार दिया। बंजारा (गुजरात), फुलकारी (पंजाब), कश्मीरी आदि शैलियों के तीन-चार फीट तक के वस्त्र-पैनल तैयार किए। हर लोककला की मौलिक प्रवृत्तियों का उन्होंने ध्यान रखा। वे कहती हैं, “मधुबनी चित्रकला से मुझे विशेष प्रेम है।  मेरा अधिकतर काम इसी में है। इसमें तरह-तरह के रंगों का प्रयोग होता है, जबकि वारली दो रंगी शैली है और पिथोरा और चित्रकथी बहुरंगी हैं। मैं जब सुई से लोक चित्रकारी का काम करती हूँ तो उसकी मूलभूत विशेषताओं, रेखाओं के अनगढ़पन और विषयवस्तु का पूरा ध्यान रखती हूँ।“

वर्ष 2002 में पहली बार उन्होंने नागपुर में अपनी कलाकृतियों की एकल प्रदर्शनी लगाई, जिसमें मधुबनी के साथ पिथोरा और साओरा के नमूने भी उन्होंने प्रदर्शित किये। मधुबनी कला आधारित अशोक वाटिका प्रसंग (सीता-राम प्रथम भेंट), स्वर्ण मृग प्रसंग जैसी कलाकृतियों ने कलाप्रेमियों का विशेष रूप से ध्यान खींचा। दीप्ति ने वृक्षारोपण और लड़कियों को पढ़ाओ जैसे विषयों को लेकर भी कशीदाकारी की। इनके अलावा  हस्त शिल्प के खूबसूरत नमूने भी प्रशंसित हुए, जैसे – शीशाकशी वाले बटुए, लोक कलाओं के बधाई पत्र, कपड़े से बनी चिड़ियों वाले झूमर, कढ़ाई के वंदनवार, टोकनियों और पंखों पर कलाकारी आदि। 

यह प्रदर्शनी उनके जीवन का अहम् मोड़ साबित हुई। इस पूरे आयोजन में उन्हें अपने पति और बच्चों का सहयोग मिला। एक तरफ कला समीक्षकों द्वारा इस प्रदर्शनी को भूरि-भूरि  प्रशंसा मिली, दूसरी तरफ व्यावसायिक रूप से भी यह आयोजन काफी सफल रहा। इस तरह दीप्ति के लिए अपनी रुचि को एक सफल उद्यम में बदलने का अवसर मिल गया। उन्होंने आसपास की झुग्गी बस्तियों की लड़कियों को सुईकारी सिखाई और अपने व्यवसाय का सफलतापूर्वक संचालन किया। दीप्ति को इस बात की खुशी है कि आगे चल कर उनमें से कई लड़कियों ने उनसे सीखी कला को अपनी जीविका का माध्यम बनाया। यहाँ दीप्ति अपनी ननद की बेटी स्मृति से मिले सहयोग को विशेष रूप से रेखांकित करती हैं |  

लोक कलाओं से अपने प्रेम को दीप्ति ने “मोतियन चौक पुराओ” नामक पुस्तक लिख कर एक और आयाम दिया। वर्ष 2017 में भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय की ओर से उन्हें ‘लोककला सुईकारी : दशा और दिशा पर शोधकार्य के लिए उन्हें सीनियर फैलोशिप मिली। कई विधाओं में स्वयं को सिद्ध करती हुई दीप्ति आगे बढ़ रही थीं, इस बीच उनका झुकाव साहित्य की ओर भी बढ़ा। कविताओं की पहली पुस्तक “आशाएँ हैं आयुध” को महाराष्ट्र राज्य साहित्य अकादमी ने काव्य विधा में प्रथम पुरस्कार के लिए चुना। बहुमुखी प्रतिभा रखने वाली दीप्ति का लेखन भी विभिन्न विधाओं से हो कर गुजरता है। ललित गद्य की उनकी पुस्तक “गही समय की बाँह” को भी अकादमी का निबंध श्रेणी का पुरस्कार मिला।

दीप्ति के बहुमुखी व्यक्तित्व का एक और पहलू अभी शेष था। उन्होंने दैनिक राष्ट्रप्रकाश से अपने पत्रकार- जीवन की शुरुआत की। कूची, कलम के बाद तीसरे “क” – कम्प्यूटर में निपुणता ने उन्हें इस मुकाम तक पहुँचाया। पति हमेशा उनकी बैकबोन बन कर रहे। दीप्ति कहती हैं, “शादी से पहले पिता और शादी के बाद पति ने मेरे सपनों में रंग भरा। दीप्ति की पत्रकारिता का अगला मुकाम दैनिक भास्कर, नागपुर रहा। उसके संपादक श्री प्रकाश दुबे से उन्होंने मित्र और गुरु के रूप में बहुत कुछ सीखा। दीप्ति के संपादन-संयोजन में निकलने वाले साप्ताहिक परिशिष्ट “डीबी इम्प्रेशन्स” को काफी लोकप्रियता मिली। हिन्दी और अंग्रेज़ी में छपने वाला यह परिशिष्ट युवाओं को उनसे संबंधित सामग्री देता था। इसके बाद दीप्ति ने साहित्यिक कॉलम “क किताब का” संभाला। दैनिक भास्कर में विभिन्न विषयों पर पन्ने तैयार करने की ज़िम्मेदारी भी दीप्ति ने संभाली। 

दीप्ति की एक और प्रदर्शनी उल्लेखनीय है। पत्रकारिता पर केंद्रित कोलाज शैली में बने पोस्टरों की प्रदर्शनी – “तस्वीरें बोलती हैं।” इसे दिल्ली की इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में भी प्रदर्शित किया गया। पौत्र दक्ष के लिए उन्होंने बाल कविताओं की पुस्तक “दक्ष की फुलवारी” लिखी जिसे अकादमी ने अनुदान के योग्य पाया।    

दैनिक भास्कर में काम करने का लाभ “विज्ञान वैभव” पुस्तक के रूप में सामने आया। प्रख्यात विज्ञान लेखक देवेन्द्र मेवाड़ी द्वारा लिखित भूमिका वाली इस किताब में विज्ञान के गूढ़ विषयों को लेकर सरस लेख संग्रहित हैं। वर्तमान में दीप्ति पुणे में निवास कर रही हैं और अपने आगे के उपक्रमों को लेकर व्यस्त हैं। पुत्र और पुत्रवधुएं आईटी क्षेत्र में कार्यरत हैं।  दीप्ति कुशवाह के काम को एक दो शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता, अलग-अलग क्षेत्र की अलग-अलग अनेक विधाओं को उन्होंने साधा है :-

प्रदर्शनी

• वर्ष 2002 में नागपुर में प्रथम एकल प्रदर्शनी – “दिव्यश आर्ट एन एम्ब्रायडरी” 

• वर्ष 2016 में पत्रकारिता आधारित कोलाज प्रदर्शनी

साहित्यिक  कृतियाँ 

• मोतियन चौक पुराओ (भारतीय भूमि - भित्ति अलंकरण लोक कला पर आधारित) - 2008

• आशाएँ हैं आयुध - काव्य संग्रह : संत नामदेव पुरस्कार (2016)

• गही समय की बांह - निबंध संग्रह : आचार्य रामचन्द्र शुक्ल पुरस्कार (2019)

• दक्ष की फुलवारी - बाल कविता संग्रह -2023  : महाराष्ट्र हिंदी अकादमी का अनुदान

• विज्ञान वैभव - विज्ञान आधारित सरस लेखों का संग्रह-2023

• संगीत महानाट्य “मयूरपंख” सौ कलाकारों वाले महानाट्य का लेखन और मंचन। पुस्तक प्रकाशनाधीन

• लोककला क्षेत्र में योगदान के लिए, लोककला सेवा निधि संस्थान द्वारा “पं. मन्नालाल मिश्र अलकंरण”, उरई, उप्र - 2004  

• जनार्दन स्वामी योग मंडल की आसन प्रवेश परीक्षा में स्वर्ण पदक-2004

• लोककला क्षेत्र में योगदान के लिए टीआर नेमा फाउंडेशन, मप्र द्वारा श्रीमती रामकुंवर पालीवाल संस्कृति सम्मान

• वर्ष 2004 से हिन्दी, मराठी एवं अंग्रेजी भाषाओं में व्यावसायिक अनुवाद जारी

• पाखी, नया ज्ञानोदय, पहल, समावर्तन, प्रगतिशील वसुधा, अहा ज़िन्दगी, वर्तमान साहित्य, कथाक्रम, नवनीत, सनद, वागर्थ, वर्तमान साहित्य, कादम्बिनी, नवनीत, लोकमत समाचार वार्षिकी, जनसत्ता वार्षिकी, किस्सा, कथादेश, सरिता, वामा, परिकथा, अक्षरा, ओजस्विनी, अक्षरम संगोष्ठी आदि पत्रिकाओं और अनेक प्रतिष्ठित दैनिकों में कविताएँ प्रकाशित  

•  ई पत्रिकाओं - समालोचन, जानकी पुल, पहली बार, सबद, पोएम्स इंडिया, मंतव्य, हिंदवी, सचना समय आदि पर कविताएँ और निबंध प्रकाशित

• साहित्य और लोककला पर आधारित सेमिनारों में सहभागिता और शोधपत्रों की प्रस्तुति. यथा, “कुशाभाई ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय, रायपुर” में आयोजित संगोष्ठी- “कला, संस्कृति एवं पत्रकारिता

•  आकाशवाणी, नागपुर और दूरदर्शन नागपुर से आलेखों, वार्ताओं, कविताओं का निरन्तर प्रसारण और गोष्ठियों में सहभागिता

सन्दर्भ स्रोत :  दीप्ति कुशवाह से  सारिका ठाकुर की बातचीत पर आधारित 

© मीडियाटिक

 

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