बाग प्रिंट की पहचान बनीं रशीदा बी खत्री

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बाग प्रिंट की पहचान बनीं रशीदा बी खत्री

• सीमा चौबे 

सादा कपड़ा, हाथ में ठप्पा और मन में एक सपना। जब रशीदा बी पहली बार प्राकृतिक रंगों से भरे ठप्पे को कपड़े पर दबाकर रख रही थीं, तब उन्होंने शायद ही सोचा होगा कि यह साधारण-सा काम उन्हें भारतीय शिल्प के इतिहास में अमर बना देगा। उनके ठप्पों ने न सिर्फ दम तोड़ती बाग प्रिंट कला को जीवनदान दिया, बल्कि कई घरों के लिए रोज़ी-रोटी का जरिया भी तैयार किया और इसी से आदिवासी और दलित समुदाय की महिलाओं को उन्होंने आत्मनिर्भरता के रास्ते पर चलना सिखाया। 

15 मार्च 1967 को आदिवासी बहुल अलीराजपुर जिले के छोटे से कस्बे जोबट में आमना बी और श्री इस्माइल के घर जन्मी रशीदा बी का जीवन सादगी और मेहनत से भरा रहा। चार बहनों में दूसरे नम्बर की रशीदा को पढ़ाई का अवसर नहीं मिला। बचपन की परवरिश में कला कोई औपचारिक विषय नहीं थी, परंतु भाग्य ने उन्हें उस खत्री परिवार की बहू बनाया, जो पीढ़ियों से बाग प्रिंट की परंपरा को आगे बढ़ा रहा था। 

15 वर्ष की उम्र में उनकी शादी धार जिले के 'बाग' गाँव में हुई। यह वही गांव है, जो आज बाग प्रिंट के लिये दुनियाभर में मशहूर हो चुका है। विवाह के बाद रशीदा बी को बाग की संस्कृति, रंगों की महक और हाथ से किए जाने वाले कामों ने गहराई से प्रभावित किया। ससुर इस्माइल सुलेमान, पति अब्दुल कादिर और सास हज्जानी जैतून बी - इन तीनों की प्रेरणा से रशीदा बी ने न केवल बाग प्रिंट की बारीकियां सीखी और धीरे-धीरे अपना जीवन ही इस कला को समर्पित कर दिया। 

उनके पति अब्दुल कादिर स्वयं इस कला के महान शिल्पकार थे। वे न सिर्फ बाग प्रिंट को एक नई ऊँचाई तक ले गए, बल्कि रशीदा बी को भी इस क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। अब्दुल जी को कई प्रतिष्ठित पुरस्कार प्राप्त हुए, जिनमें वर्ष 1991 में मध्यप्रदेश राज्य पुरस्कार, 2005 में भारत सरकार से राष्ट्रीय पुरस्कार, 2018 में यूनेस्को द्वारा हस्तशिल्प में उत्कृष्टता का पुरस्कार और 2015 में सूरजकुंड कला निधि पुरस्कार और शामिल हैं। 

रशीदा जी बताती हैं कि शादी के बाद मैंने देखा कि पूरा परिवार इस कला में लगा हुआ है। शुरुआत में मैं केवल सहयोग करती थी, लेकिन धीरे-धीरे रंगों और डिजाइनों के प्रति आकर्षण बढ़ता गया। मैंने हर चीज़ अपने ससुर, पति और सास को देखकर सीखी। कभी गलती होती तो डांट भी मिलती, लेकिन वह भी सीख थी। वे कहती हैं कि बाग प्रिंट जैसी पारंपरिक कला किताबों से नहीं, निरंतर काम और अनुभव से सीखी जाती है। शुरुआत में लोगों को यह स्वीकारने में समय लगा कि एक महिला भी इस कठिन काम को बखूबी कर सकती है। घर, बच्चे और काम का संतुलन चुनौतीपूर्ण था, लेकिन मैंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। 

वर्ष 1985 के बाद उन्होंने शहरी बाज़ार के लिए कपड़े पर नए-नए प्रयोग कर चादर, कुशन कवर, टेबल कवर, कॉटन साड़ी, सलवार सूट आदि एवं उसके बाद सिल्क साड़ी, टसर, सिल्क दुपट्टा, सिल्क स्टॉल, स्कार्फ आदि पर काम करना शुरू किया। वे लकड़ी के छापों एवं रंगों में आधुनिकता का समावेश कर विभिन्न प्रकार के प्रयोग इसलिए किया करती हैं  ताकि राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर यह कला लम्बे समय तक लोकप्रिय एवं स्थापित रहे। उन्होंने कपड़ों के अलावा बांस की चटाई, चमड़ा, टाट (जूट) आदि को भी छापा कला से नया रंगरूप दिया है। 

एलिजरीन से बाग प्रिंट तक 

रशीदा जी बताती हैं - बाग प्रिंट के डिज़ाइनों में नवाचार को 1987 में जब उनके ससुर ने प्रसिद्ध डिज़ाइनर मार्तंड सिंह को दिखाया तो उनके काम से प्रभावित होकर श्री सिंह ने उन्हें 'बाग प्रिंटर' का खिताब दिया। यहीं से इस छापा कला को एक नया नाम मिला 'बाग प्रिंट. इससे पहले इसे  'एलिजरीन' कहा जाता था और यह कला केवल आदिवासी महिलाओं की पारंपरिक वेशभूषा लुगड़ी-चोली तक सीमित थी। (वास्तव में एलिजरीन एक कार्बनिक यौगिक है जो मूल रूप से मजीठ (madder) पौधे की जड़ों से चमकीले लाल रंग के रूप में प्राप्त होता था और कपड़े रंगने के लिये इस्तेमाल किया जाता था।

संघर्ष का दौर और जीवटता  

12 मई 2019 में एक असाध्य बीमारी के बाद अब्दुल कादिर के निधन ने रशीदा बी  के जीवन में एक बड़ा खालीपन छोड़ दिया। जहां ज्यादातर महिलाएं ऐसे पलों में टूट जाती हैं, रशीदा बी ने खुद को फिर से समेटा और कला को ही अपने जीवन का केंद्र बना लिया। उन्होंने अपने बेटों को इस परंपरा से जोड़ा और खुद उनके लिए प्रेरणा बनीं। रशीदा बी ने इस कला को नया जीवन दिया। उन्होंने न सिर्फ खुद आत्मनिर्भरता की मिसाल पेश की, बल्कि 7 सौ से अधिक युवाओं खासकर गरीब, आदिवासी और दलित समुदाय के बच्चों को अपने खर्च पर प्रशिक्षण देकर उन्हें इस कला से जोड़ा। वे कहती हैं मैंने गरीबी देखी है, इसलिए चाहती हूँ कि और कोई भूखा न सोये। यही सोचकर मैंने प्रशिक्षण देना शुरू किया। 

परंपरा से तकनीक तक का सफ़र 

आज बाग प्रिंट केवल हस्तशिल्प की परंपरा नहीं, बल्कि एक ब्रांड बन चुका है। रशीदा बी और उनके पुत्रों ने सोशल मीडिया और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म के माध्यम से बाग प्रिंट को नई ऊँचाइयों तक पहुँचना है। उनकी सोच है-परंपरा और आधुनिकता का सही संतुलन ही भविष्य है। उनकी डिजाइन की प्रेरणा प्रकृति, परंपरा और बाग का सांस्कृतिक वातावरण हैं। नर्मदा नदी की शांति, पुराने लकड़ी के ब्लॉकों की बनावट और मिट्टी की सौंधी महक उनके कार्य में साफ़ झलकती है। 

सम्मान, पुरस्कार और पहचान 

उनके कार्य को न केवल शिल्प की दुनिया ने सराहा, बल्कि सरकार ने भी मान्यता दी। वर्ष 2012 और 2014 में उन्हें मध्यप्रदेश राज्य पुरस्कार मिला। बाग प्रिंट के लिए दो राज्य-स्तरीय पुरस्कारों से सम्मानित होने वाली वे एकमात्र महिला शिल्पकार हैं। उनकी सबसे उल्लेखनीय कृतियों में से एक है वह चादर, जिसने उन्हें 2018 में राष्ट्रीय मेरिट पुरस्कार दिलाया। इस चादर की कीमत लगभग डेढ़ लाख रुपये थी और इसे बनाने में तीन माह से अधिक का समय लगा था। इस चादर पर मांडू का किला, बाग गुफाएं और अन्य परंपरागत डिजाइन को सूक्ष्म खानों में उकेरा गया है। उस चादर पर की गई कलाकारी में परंपरा और नवाचार का अद्भुत समन्वय था। रशीदा बी ने न केवल भारत भर में, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी अपनी कला का प्रदर्शन किया। 

अंत में...

भविष्य की योजनाओं को लेकर रशीदा बी चाहती हैं कि बाग में एक प्रशिक्षण केंद्र बने, जहाँ महिलाएं इस कला को सीखकर आत्मनिर्भर बनें। वे चाहती हैं कि अपनी मौलिकता को सहेजते हुए बाग प्रिंट को वैश्विक मंच पर और अधिक पहचान मिले, एक ऐसी पहचान जो भारतीय संस्कृति की आत्मा को दर्शाए। उनकी अपील है कि सरकार को प्रशिक्षण केंद्र, महिलाओं के लिए विशेष योजनाएं और स्थायी रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने चाहिए। उन्होंने आदिवासी महिला-पुरुषों को प्रशिक्षण देकर अपने पैरों पर खड़ा होने में सहयोग दिया है। आज भी वे अनेक बेरोजगार युवक-युवतियों को प्रशिक्षण देने का कार्य निरंतर कर रही हैं। 

उनकी सात संतानें हैं - तीन बेटियां और चार बेटे। बेटियाँ विवाह के बाद अपने जीवन में रमी हैं, वहीं बेटे मो. आरिफ खत्री, मोहम्मद खत्री, मो.हामिद जिलानी खत्री और मो. अली खत्री बाग प्रिंट की विरासत को आधुनिक सोच और तकनीकी नवाचारों के साथ आगे बढ़ा रहे हैं। 

रशीदा जी का मानना है, “शिक्षा केवल किताबों से नहीं, जीवन से भी मिलती है। अगर मन में लगन हो, तो कोई भी ऊँचाई पाई जा सकती है। हर महिला अपने भीतर एक 'स्वयंसिद्धा' है, बस उसे खुद पर भरोसा करना होगा।” 

सन्दर्भ स्रोत :  रशीदा बी से सीमा चौबे की बातचीत और उनके बेटे मो.हामिद  द्वारा प्रेषित सामग्री पर आधारित 

छाया : मो.हामिद  खत्री

© मीडियाटिक

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