छाया : स्व संप्रेषित
• सीमा चौबे
डॉ. नीलिमा शर्मा भारतीय कला-जगत की उन विरल विभूतियों में शामिल हैं, जिनका जीवन स्वयं एक राग की तरह (आलाप, विस्तार और ऊँचाई) धीरे-धीरे आगे की ओर बढ़ता है। संगीत, नृत्य, शिक्षा, अभिनय और संघर्ष से बुनी उनकी जीवन यात्रा यह बताती है कि साधना यदि सच्ची हो, तो विराम भी एक नए आरंभ का कारण बन जाता है।
जन्म, परिवार और संस्कार
22 अप्रैल 1954 को मध्यप्रदेश की ऐतिहासिक नगरी ग्वालियर में जन्मी नीलिमा के पिता श्री रामस्वरूप शर्मा मप्र आबकारी विभाग में उप निरीक्षक और मां श्रीमती शांति शर्मा माध्यमिक पाठशाला में शिक्षिका थीं। पिता स्वयं हारमोनियम बजाकर गाते थे, जबकि माता लोकगीतों व ढोलक से गहराई से जुड़ी थीं। 17–18 सदस्यों वाले संयुक्त परिवार की उस दुनिया में पूजा-पाठ, आरतियाँ और पारिवारिक महफ़िलें संगीत की सहज पाठशाला थीं। कहना न होगा कि यही संस्कार आगे चलकर नीलिमा के जीवन की दिशा बन गये।
परिवार में तीन भाइयों में दूसरे नंबर की नीलिमा की प्रतिभा को सबसे पहले पहचाना उनके चाचा मेजर जनरल सत्यस्वरूप शर्मा (कीर्ति चक्र, वीएसएम) ने, जो स्वयं रंगमंच से जुड़े कलाकार भी थे। अभिनय के बीज वहीं से नीलिमा के व्यक्तित्व में पड़े। उनसे छोटे भाई की आवाज़ भी बचपन में उनकी तरह ही मीठी थी वे दोनों एक साथ बहुत सारे गाने गाते थे, लेकिन गंभीरता से तालीम सिर्फ नीलिमा ने ही ली।
प्रारंभिक शिक्षा और कला की नींव
चौथी कक्षा में उनका प्रवेश ग्वालियर के प्रतिष्ठित पद्मा कन्या विद्यालय में हुआ। वहीं से औपचारिक शिक्षा के साथ-साथ उनकी कला की विधिवत यात्रा भी आरंभ हुई। स्कूल के पास स्थित ललित कला विद्यालय में स्व. श्री बापूराव शिंदे से कथक नृत्य प्रशिक्षण आरंभ किया। अब पढ़ाई के अलावा नृत्य अभ्यास और रियाज़ उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन गया। पांचवी कक्षा में आते ही खो-खो टीम में उनका चयन हुआ। आठवीं कक्षा तक वे कथक में ‘विद’ स्तर की डिप्लोमा परीक्षा उत्तीर्ण कर चुकी थीं। इसके बाद कुछ समय स्व. श्री विजय अकोलकर से सितार सीखा, किंतु उनके असामयिक निधन के पश्चात उनका रुझान पूरी तरह गायन की ओर हो गया। नया बाज़ार स्थित भारतीय संगीत विद्यालय से गायन का विधिवत आरंभ हुआ। स्थानीय आर्केस्ट्रा, मंचीय कार्यक्रम और नाट्य प्रस्तुतियाँ उनकी पहचान बनने लगीं।
बहुआयामी प्रतिभा : अभिनय, खेल और नेतृत्व
अभिनय और खेल में भी उनकी गहरी रुचि और पकड़ थी। विद्यालय जीवन में वे खो-खो और एथलेटिक्स में राज्य स्तर तक सक्रिय रहीं। एक हास्य-स्किट के कारण वे ‘नेताजी’ के नाम से प्रसिद्ध हो गईं। नकल, कॉमेडी और अभिनय में उनकी विशेष दक्षता थी, जिसके चलते उन्हें विद्यालय के नाटकों में केंद्रीय भूमिकाएं मिलीं।
ग्वालियर से उज्जैन : गुरु, संघर्ष और पहचान
हायर सेकेंडरी (ग्यारहवीं) की परीक्षा के साथ ही उन्होंने इंदिरा कला विश्वविद्यालय, खैरागढ़ से गायन विधा में मध्यमा परीक्षा उत्तीर्ण की। इसी अवधि में भारतीय संगीत विद्यालय के वायलिन आचार्य सुरंगे जी ने उनकी स्वर-प्रतिभा को पहचानते हुए उनके पिता से आग्रह किया कि नीलिमा को विधिवत और गहरी तालीम दिलाई जाये। लेकिन ऐसा हो न सका, क्योंकि हायर सेकेंडरी की पढ़ाई पूरी होते ही उनके पिता का स्थानांतरण उज्जैन हो गया। ग्वालियर छोड़ने से पहले उन्हें श्री प्रभात गांगुली के निर्देशन में, डॉ. वृंदावन लाल वर्मा द्वारा लिखित नाटक ‘रास्ते, मोड़ और पगडंडी’ में अभिनय का अवसर मिला। यह अनुभव उनके लिए अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ, क्योंकि इससे अभिनय, भावाभिव्यक्ति और संगीत के आपसी समन्वय की गहरी समझ विकसित हुई, जो आगे चलकर उनकी मंचीय प्रस्तुतियों की विशिष्ट पहचान बनी।
उज्जैन में पिता की इच्छा से उन्होंने बी.एससी. में प्रवेश लिया, किंतु विज्ञान विषयों में रुचि न होने के कारण असफल होने पर उन्होंने बी.ए. (हिंदी, अंग्रेज़ी साहित्य एवं गायन) का चयन किया। इस परिवर्तनशील दौर में संगीत कुछ समय के लिए ठहराव में चला गया, पर शीघ्र ही शासकीय संगीत विद्यालय में पं. आर.एस.वाघ जैसे श्रेष्ठ गुरु का सान्निध्य उन्हें प्राप्त हुआ। उनके मार्गदर्शन में नीलिमा जी ने संगीत विद की अधूरी शिक्षा को पूर्ण किया और प्रावीण्य परीक्षा में द्वितीय स्थान प्राप्त किया। साथ ही विक्रम विश्वविद्यालय से बी.ए. की उपाधि भी अर्जित की। धीरे-धीरे उज्जैन के संगीत–प्रेमियों के बीच उनके गायन की चर्चा फैलने लगी। यहाँ तक कि उनकी तुलना परवीन सुल्ताना से की जाने लगी, जिसे वे स्वयं स्नेहपूर्ण अतिशयोक्ति मानती हैं।
इसी अवधि में अंतर-विश्वविद्यालयीन युवा उत्सव में लगातार दो वर्षों तक सुगम संगीत, शास्त्रीय संगीत और अभिनय में प्रथम पुरस्कार प्राप्त किए। महाविद्यालय में छात्रसंघ अध्यक्ष चुने जाने पर छात्राओं के हित में अनेक कार्य किए। इस दौरान उन्हें प्राचार्य श्रीमती ममता दत्ता का विशेष स्नेह और प्रोत्साहन मिला। महाविद्यालय के वार्षिक समारोह एवं पत्रिका विमोचन अवसर पर तत्कालीन शिक्षा मंत्री श्री अर्जुन सिंह द्वारा मंच से की गई उनकी सराहना, उनके आत्मविश्वास और कला–यात्रा के लिए एक महत्वपूर्ण प्रेरणा बनी।
वैवाहिक जीवन और संगीत से विराम
फरवरी 1976 में बैंक में कार्यरत कोटा (राजस्थान) निवासी श्री गोपाल शर्मा से नीलिमा जी का विवाह हुआ। संगीत से पति का जुड़ाव सीमित था। ससुराल में सामाजिक परिवेश के कारण नीलिमा जी को प्रोत्साहन नहीं मिलता था, फिर भी उन्होंने विक्रम विश्वविद्यालय से 1979 में स्वाध्यायी रूप से एम.ए. (संगीत) पूर्ण किया। एक स्कूल में व्याख्याता पद पर चयन हुआ, पर एक वर्ष से कम आयु के बेटे और घर से दूर नियुक्ति के कारण यह अवसर उन्हें छोड़ना पड़ा। परिणामस्वरूप जीवन से संगीत भी धीरे-धीरे पीछे छूटने लगा। इस बीच वे दो बच्चों की माँ के रूप में अपनी नई भूमिका में रम गई। फिर भी संगीत पूरी तरह विलुप्त नहीं हुआ। ऑल इंडिया रेडियो और विविध भारती सुनते हुए उनमें उर्दू तलफ़्फ़ुज़ और ग़ज़ल की समझ गहरी होती गई। पति के सहयोग से कभी-कभार शास्त्रीय और सुगम संगीत कार्यक्रम सुनने का अवसर भी मिलता। उन्होंने बच्चों को भी बचपन से ही सुरों से परिचित कराया, दोनों बच्चों को आज भी माँ की रची धुनें न सिर्फ याद है, बल्कि दोनों सुरीला गाते भी हैं।
रिकॉर्डिंग की शुरुआत और एल्बमों की यात्रा
1986 में दिल्ली में पारिवारिक विवाह के अवसर पर हुए गायन के बाद टी-सीरीज़ से उनका जुड़ाव बना। गुलशन कुमार के ‘न्यू टैलेंट्स’ प्रोजेक्ट के अंतर्गत फ़िल्म महबूबा का गीत ‘मेरे नैना सावन भादों’ नीलिमा की आवाज में रिकॉर्ड हुआ, जो संगीत जगत में उनकी पहली औपचारिक उपलब्धि थी। 1988 में दिल्ली की ‘यूकी कंपनी’ के लिए दो राजस्थानी मांड गीत रिकॉर्ड किए गए। इसके पश्चात टी-सीरीज़ और अन्य संगीत कंपनियों से उनके अनेक एलबम - ख़याल-ए-ग़ालिब, जय जय जगदम्बे, कुछ पल आनंद के, तेरा मेरा मनवा आदि रिलीज़ हुए, जिनसे उनकी पहचान और कला को नई दिशा मिली।
ग्वालियर वापसी : संघर्ष, संबल और आत्मनिर्भरता की नई शुरुआत
जून 1988 में पति के आकस्मिक निधन ने नीलिमा के जीवन को पुनः शून्य में ला खड़ा किया। आठ वर्ष के पुत्र और चार वर्ष की पुत्री के साथ भविष्य एक अनुत्तरित प्रश्न बन गया। ऐसे समय में मायके ग्वालियर वापसी ही एकमात्र सहारा बनी। माता-पिता का संबल और शहर की परिचित मिट्टी ने धीरे-धीरे भीतर की टूटी हुई स्त्री को संभालना सिखाया। इसी वर्ष उन्हें शासकीय माधव संगीत महाविद्यालय, ग्वालियर में सहायक व्याख्याता के रूप में नियुक्ति मिली। यहाँ कथक नृत्य की विधा का प्रारंभ केवल चार छात्राओं से हुआ, जो उनकी सेवानिवृत्ति तक सैकड़ों छात्राओं तक पहुँचा। इस नियुक्ति के साथ ही न केवल आर्थिक आत्मनिर्भरता का मार्ग प्रशस्त हुआ, बल्कि खोया हुआ आत्मविश्वास भी धीरे-धीरे लौटने लगा।
साधना और मंचीय वापसी
इसी अवधि में वर्षों से थमा हुआ उनका गायन पुनः जागृत हुआ। आकाशवाणी के वरिष्ठ संगीतज्ञ डॉ. हरिचरण वर्मा जी के गायन से प्रेरित होकर उनसे प्रशिक्षण प्राप्त करने का सौभाग्य मिला। हालांकि तेरह वर्षों के लंबे विराम के बाद पुनः रियाज़ आरंभ करना सहज नहीं था, किंतु कठोर साधना, आत्मसंघर्ष और दृढ़ संकल्प के साथ उन्होंने उपशास्त्रीय संगीत और ग़ज़ल गायन को अपनी पहचान बनाने का निश्चय किया।
मंच पर वापसी का पहला अवसर उन्हें वर्ष 1990 में ग्वालियर व्यापार मेला में मिला, जहाँ से फिर उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। धीरे-धीरे ग्वालियर के साथ-साथ अन्य शहरों में भी कार्यक्रम मिलने लगे और पहचान बनती गई। पुणे सहित विभिन्न मंचों पर ग़ज़ल, ठुमरी, दादरा और मांड की प्रस्तुतियों से उनकी कला यात्रा में और अधिक निखार आया
वर्ष 1991 में गुरुजी के स्थानांतरण के बाद आगे चलकर उन्हें पं. बालासाहेब पूछवाले जी से उपशास्त्रीय बंदिशों का प्रशिक्षण प्राप्त हुआ। पारिवारिक दायित्वों, बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों के बावजूद उनकी साधना और मंचीय सक्रियता निरंतर बनी रही।
आकाशवाणी, दूरदर्शन और राष्ट्रीय मंच
वर्ष 1991 में आकाशवाणी ग्वालियर में गीत, भजन और ग़ज़ल, तीनों विधाओं में ऑडिशन दिया और बी-ग्रेड में चयनित हुई। एक वर्ष बाद उन्होंने बी-हाई ग्रेड के लिए पुनः ऑडिशन दिया और भजन, गीत और ग़ज़ल - सबमें सफलता प्राप्त की। इससे उनका आत्मविश्वास दृढ़ हुआ और उन्होंने स्वयं धुनें बनानी शुरू कीं। उनकी बनाई कुछ धुनें आगे चलकर टी-सीरीज़ द्वारा जारी ऑडियो-वीडियो एलबम ख़याल-ए-ग़ालिब और जय जय जगदम्बे में शामिल हुईं। 1994 में बांग्ला संगीतकार अमित दासगुप्ता के निर्देशन में पुराने फिल्मी गीतों पर आधारित बंगला रचनाओं की कैसेट बॉलीवुड हिट्स (इंडिया टुडे) उनकी आवाज़ में रिलीज़ हुई, जो बंगाल में अत्यंत लोकप्रिय रही। इसके अतिरिक्त डॉ. आनंद प्रकाश माहेश्वरी के काव्य-संग्रह की रचनाओं को संगीतबद्ध कर टी-सीरीज़ से छह गीतों की एल्बम ‘कुछ पल आनंद के, कुछ पल विषाद’ के और यूट्यूब चैनल पर कबीर के छह पदों को स्वर व संगीत देकर ‘तेरा मेरा मनवा ‘ एलबम भी जारी किया गया।
1995 में उन्हें आकाशवाणी से ग़ज़ल, गीत और भजन - तीनों विधाओं में ‘ए’ ग्रेड प्राप्त हुआ। इसके पश्चात दूरदर्शन के दिल्ली, लखनऊ, इलाहाबाद, गोरखपुर, भोपाल, मुंबई, रायपुर, जयपुर, ग्वालियर, पोर्ट ब्लेयर सहित अनेक केंद्रों के विशिष्ट कार्यक्रमों और कंसर्ट्स में सहभागिता का अवसर मिला।
शोध, शिक्षण और विरासत
44 वर्ष की आयु में उन्होंने इंदिरा कला विश्वविद्यालय से कथक नृत्य में एम.ए. की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। इसके पश्चात उन्होंने शोध के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय उपलब्धि अर्जित की। वर्ष 2010 में जीवाजी विश्वविद्यालय से “पदमाल काव्य में संगीतात्मक तत्वों का विश्लेषणात्मक अध्ययन” विषय पर डॉक्टरेट (पीएच.डी.) की उपाधि प्राप्त की।
शोध, शिक्षण और रचनात्मक सक्रियता को समान रूप से साधते हुए उन्होंने राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनेक सेमिनारों में सहभागिता, शोध-पत्रों का प्रस्तुतीकरण और शिक्षण कार्य किया। उनके मार्गदर्शन में तैयार हुए शिष्य आज फ़िल्म, मंच, यूट्यूब और शिक्षण जैसे विविध क्षेत्रों में सक्रिय हैं और स्तरीय कार्य कर रहे हैं। अनेक शिष्यों ने उल्लेखनीय उपलब्धियाँ प्राप्त कर गुरु-परंपरा को आगे बढ़ाया है। उनकी दिवंगत शिष्या दीप्ति गेडाम, जो असाधारण प्रतिभा की धनी थीं, ने डॉ. नीलिमा की संगीतबद्ध रचनाएँ गाकर लता मंगेशकर अवार्ड (जूनियर एवं सीनियर वर्ग) दो बार प्राप्त किया। इसी प्रकार उनकी शिष्या डॉ. तरुणा सिंह, नीलिमा जी की सेवानिवृत्ति के पश्चात उसी पद पर कार्यरत हैं। इसे वे अपने जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि मानती हैं।
अभिनय की शुरुआत
पीएच.डी. के लिए प्राप्त दो वर्ष के अध्ययन अवकाश के दौरान वे अपनी पुत्री के साथ मुंबई में रहीं। यह समय जहाँ एक ओर गहन शोध लेखन का था, वहीं दूसरी इसी समय उन्हें अभिनय के क्षेत्र में विविध कार्य करने के अवसर प्राप्त हुए। उन्होंने फ़िल्म ‘बाबर’ में ओम पुरी की पत्नी की भूमिका निभाई। इसके अतिरिक्त लोकप्रिय धारावाहिक ‘मेरे डैड की दुल्हन’ में संक्षिप्त किंतु प्रभावशाली भूमिका तथा ‘सिपला’ और ‘रसोई मैजिक मसाला’ जैसे विज्ञापनों में अपने अभिनय की सशक्त छाप छोड़ी। मंच से उनका जुड़ाव भी निरंतर बना रहा और उन्होंने लायंस क्लब के अनेक मंचीय कार्यक्रमों में सहभागिता की।
मुंबई प्रवास के दौरान पृथ्वी थिएटर में यात्री ग्रुप द्वारा प्रस्तुत सांगीतिक नाटक ‘एक था गधा’ उनके अभिनय जीवन का विशेष स्मरणीय अनुभव रहा। इस नाटक में उनकी पुत्री शाश्विता ने भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। नाटक के छह गीतों को नीलिमा ने स्वयं संगीतबद्ध किया, जिससे उनके संगीत और अभिनय के समन्वय का अनूठा रूप सामने आया। मुंबई में बिताया यह समय उनके जीवन में अत्यंत रचनात्मक, प्रेरक और अविस्मरणीय अनुभवों से परिपूर्ण रहा।
स्मरणीय मुलाक़ातें : महान विभूतियों से मिले जीवन–पाठ
पं. भीमसेन जोशी, जगजीत सिंह, डॉ. गोपालदास ‘नीरज’ जैसी महान हस्तियों से मिले अनुभव उनके जीवन की अमूल्य निधि हैं। अपने जीवन के यादगार पलों को स्मरण करते हुए वे बताती हैं कि अगस्त 1992 में पुणे के केसरीवाड़ा में पं. भीमसेन जोशी जी के कार्यक्रम के पश्चात उनसे भेंट हुई। बातचीत का आरंभ ग्वालियर से हुआ और फिर बचपन, संगीत, घराने और पुराने किस्सों की ओर बढ़ता चला गया। सहज आत्मीयता के साथ उन्होंने कहा “घर आना, वहाँ और आराम से बात करेंगे।”
अगले दिन जब मैं उनके घर पहुंचीं, तो उन्होंने अत्यंत सरलता और आत्मीयता से स्वागत किया। विदा लेते समय उन्होंने मुस्कराकर कहा - “आज मेरी पत्नी घर पर नहीं हैं, इसलिए मेरे हाथ की चाय पियो।” मेरे आग्रह पर भी उन्होंने स्वयं चाय बनाई और कहा - “अरे, मैं भी बहुत अच्छी चाय बनाता हूँ।” उस महान कलाकार के हाथ की चाय पीना मेरे लिए किसी आशीर्वाद से कम नहीं था। उस क्षण मैंने अनुभव किया कि ऊँचाइयों तक पहुँचने के बाद भी सहज और विनम्र बने रहना ही सच्ची महानता है।
इसी प्रकार जगजीत सिंह से हुई मुलाक़ात को याद करते हुए वे आज भी उल्लास से भर उठती हैं। मुंबई में अपने चाचा के मित्र के यहाँ प्रवास के दौरान, उनकी पत्नी ने सहज भाव से पूछा “तुम्हारा पसंदीदा कलाकार कौन है?” बिना सोचे उन्होंने उत्तर दिया “जगजीत सिंह।” उसी क्षण उन्होंने फोन उठाकर जगजीत जी से बात की और मिलने का समय तय कर दिया। अगले दिन जब नीलिमा जी उनसे मिलीं, तो जगजीत सिंह ने अत्यंत आत्मीयता से स्वागत किया। उस समय वहाँ जलाल आगा के धारावाहिक ‘कहकशां’ का बैकग्राउंड म्यूज़िक रिकॉर्ड हो रहा था। नीलिमा का गायन सुनने के बाद उन्होंने उनकी आवाज़, उर्दू तलफ़्फ़ुज़ और भावाभिव्यक्ति की सराहना की और कहा “गाना कभी मत छोड़ना, रियाज़ तुम्हारा सबसे बड़ा सहारा है। यह मुलाक़ात नीलम के जीवन की एक अमूल्य स्मृति बन गई।
इसी क्रम में डॉ. गोपालदास ‘नीरज’ जी के सम्मान में आयोजित एक कार्यक्रम भी उनके जीवन का अत्यंत भावुक क्षण रहा। इस अवसर पर उन्होंने नीरज जी की लिखी तीन रचनाओं को स्वयं संगीतबद्ध कर प्रस्तुत किया। एक रचना की प्रस्तुति के बाद नीरज जी ने मंच से कहा “मुझे नहीं पता था कि मेरी यह रचना इतनी मार्मिक हो सकती है। तुमने मुझे रुला दिया।” किसी रचनाकार के लिए, विशेषकर उसी रचनाकार के सामने जिसने शब्द रचे हों, यह सुनना किसी राष्ट्रीय सम्मान से कम नहीं होता।
नीलिमा जी आज भी बच्चों को संगीत सिखा रही हैं, नई रचनाएँ कर रही हैं और भारत-अमेरिका दोनों जगह मंचीय गतिविधियों में सक्रिय हैं। उनकी पुत्री शाश्विता अभिनय और नृत्य के क्षेत्र में सक्रिय है। वह एक कुशल कथक नृत्यांगना भी हैं और अनेक धारावाहिकों में कार्य कर चुकी हैं। वे क्राइम पेट्रोल शृंखला में इंस्पेक्टर की भूमिका से विशेष पहचान रखती है। 'जश्न-ए-कलम' उनका स्वयं का थिएटर समूह है, जिसके माध्यम से हिन्दी साहित्य की प्रसिद्ध कहानियों को सोलो अभिनय के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। बेटा शुभम ‘एना-प्लान’ कंपनी अमेरिका में कार्यरत हैं।
उपलब्धियां
• 16 मार्च 1992 को दूरदर्शन दिल्ली से राष्ट्रीय चैनल पर पहली टेलीकास्ट प्रस्तुति
• आकाशवाणी ग्वालियर द्वारा आयोजित कंसर्ट में सुप्रसिद्ध ग़ज़ल गायक चंदन दास के साथ मंच साझा
• फ़िल्म ‘चराग’ के लिए राजेश रोशन के संगीत निर्देशन में गीत रिकॉर्ड
प्रस्तुतियां
पुणे, लखनऊ, भोपाल, रायपुर, दिल्ली तथा देश के अनेक सांस्कृतिक मंचों पर ग़ज़ल, गीत और भजन की प्रस्तुतियाँ दे चुकी हैं जिनमें प्रमुख हैं -
• इंडिया हैबिटेट सेंटर-नई दिल्ली (2000, 2002)
• याद-ए-बेगम अख्तर-गुरुग्राम (2002)
• अल्लामा इक़बाल स्मारक संध्या-भोपाल (2009)
• आकाशवाणी संगीत सम्मेलन-देहरादून (2015)
• सिंहस्थ महोत्सव-उज्जैन (2016)
• राष्ट्रीय ग़ज़ल महोत्सव-दिल्ली
• लता मंगेशकर अलंकरण समारोह -इंदौर
• महाकाल संगीत समारोह-उज्जैन
• बरखा महोत्सव-भोपाल
• अखिल भारतीय सुगम संगीत आकाशवाणी सम्मेलन-देहरादून आदि।
• विदेश में : 2020 में अमेरिका (मैडिसन, विस्कॉन्सिन) में कोरोना काल के दौरान चेलो वादक मैक्स डायर एवं हार्प वादिका मैरी एन के साथ विशेष कंसर्ट तथा 2023 में अमेरिका में भारतीय स्वतंत्रता दिवस पर देशभक्ति व फ़िल्मी गीतों की प्रस्तुतियाँ।
प्रमुख सम्मान
• मधुबन संस्था- उज्जैन द्वारा महाकाल संगीत रत्न सम्मान (1999)
• अभिनव कला परिषद द्वारा अभिनव कला सम्मान (2000)
• ग्वालियर विकास समिति द्वारा ग्वालियर गौरव सम्मान (2010)
• नई दुनिया, भोपाल द्वारा नायिका पुरस्कार (2010) अभिनेता आशुतोष राणा के हाथों
• संस्कार भारती, ग्वालियर द्वारा नृत्य गुरु सम्मान (2015)
प्रमुख एल्बम
• ख़याल-ए-ग़ालिब - टी-सीरीज़
• जय जय जगदम्बे - टी-सीरीज़
• भोला भंडारी - म्यूजिक (आगरा)
• बॉलीवुड हिट्स (बंगाली) - म्यूज़िक इंडिया
• कुछ पल आनंद के, कुछ पल विषाद के टी सीरीज़
सन्दर्भ स्रोत : डॉ. नीलम शर्मा द्वारा प्रेषित सामग्री और सीमा चौबे की बातचीत पर आधारित
© मीडियाटिक



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