छाया : स्व संप्रेषित
• सीमा चौबे
सर पर माँ-बाप का साया नहीं था और सपने पूरे करने के लिये माया नहीं थी, बावजूद इसके उन्होंने हार नहीं मानी और आज वे एक सफल अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी हैं, जो लाखों लोगों के लिए प्रकाश स्तंभ का काम कर रही हैं। सचमुच, बॉडी बिल्डर वंदना ठाकुर की कहानी साहस,संकल्प और संघर्ष की एक प्रेरणादायक मिसाल है।
बचपन का संघर्ष
वर्ष 1990 में बनारस में एक साधारण परिवार में जन्मीं वंदना के पिता सेना में सूबेदार थे। बाद में उनका परिवार इंदौर आ गया। जब वंदना केवल 12 वर्ष की थीं, तब उनके पिता का निधन हो गया और चार साल बाद जब वे महज 16 वर्ष की थीं, माँ भी चल बसी। कच्ची उम्र में ही वे अनाथ हो गईं।
इसके बाद जीवन बेहद कठिन हो गया। दो वक़्त की रोटी जुटाना तो मुश्किल हो ही गया, उनके अपनों ने भी उनसे दूरियां बना ली। जीवन यापन के लिए उन्होंने गोली बिस्किट की छोटी दुकान लगाई, अगरबत्तियां बनाईं और घर-घर जाकर काम भी किया। इन हालात का असर उनकी पढ़ाई पर भी पड़ा। सरकारी स्कूल फ़ीस तो नहीं थी, लेकिन उनके पास कॉपी-किताब खरीदने तक के पैसे नहीं थे। लिहाजा उन्होंने कबाड़ की दुकान पर बिकने के लिए आने वाली पुरानी कॉपी की लिखावट को मिटाकर उसी से काम चलाया। ऐसी मशक्कत के बावजूद केवल दसवीं कक्षा तक ही पढ़ सकीं।
सपनों से नई दिशा
वंदना का सपना सेना में जाकर देश सेवा करने का था, लेकिन परिस्थितियों ने उनका रास्ता बदल दिया। जब उन्होंने खेलों में अपना भविष्य तलाशा तो किस्मत ने यहाँ भी उनका साथ नहीं दिया। वे बताती हैं शुरुआत क्रिकेट से की, लेकिन संसाधनों की कमी के कारण आगे नहीं बढ़ सकीं। इसके बाद कराटे में जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचीं और स्वर्ण पदक भी जीता। अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता के लिए उनका चयन भी हो गया, लेकिन विदेश जाने के लिए भारी भरकम फीस न जुटा पाने के कारण यह मौका भी छूट गया।
ज़िंदगी की जिम्मेदारियों के बीच उन्होंने बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया और इसी दौरान जिम जॉइन किया। यहीं से उनके जीवन ने नया मोड़ लिया और उन्होंने पावरलिफ्टिंग और बॉडी बिल्डिंग में कदम रखा। इस खेल में जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर उत्कृष्ट प्रदर्शन किया।
सफलता की उड़ान
कड़ी मेहनत और अनुशासन के दम पर वंदना ने 2017 में दिल्ली में आयोजित वर्ल्ड पावर लिफ्टिंग चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतकर अंतरराष्ट्रीय पहचान बनाई। वे कहती हैं -"यह अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता मैं केवल इसलिए खेल पाई क्योंकि यह भारत में ही खेली गई थी।" उनकी कोच गीतांजली विश्वकर्मा ने इस सफ़र में अहम भूमिका निभाई। उन्होंने न केवल वंदना की प्रतिभा को पहचाना, बल्कि हर कठिन समय में उनका मार्गदर्शन किया और आत्मविश्वास बढ़ाया। उनके सहयोग से वंदना ने वर्ष 2018 में अपनी पहली नेशनल बॉडी बिल्डिंग चैंपियनशिप खेली और स्वर्ण पदक जीता।
इसी बीच उनके जीवन में एक और बड़ी चुनौती आई, जब उनके पैर में गंभीर चोट लग गई और डॉक्टर ने उन्हें खेल छोड़ने की सलाह दी। इसके बाद कोरोना काल के कारण उनका खेल लगभग रुक गया। लेकिन वंदना ने हौसला नहीं छोड़ा।
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वर्ष 2023 में उन्होंने एक बार फिर से वापसी की और नेशनल स्तर पर स्वर्ण पदक जीतकर यह साबित कर दिया कि उनका जुनून अभी भी ज़िंदा है। उसके बाद दोबारा उनका चयन नेशनल चैम्पियनशिप के लिए हो गया लेकिन अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भाग लेने के लिए आर्थिक संसाधन जुटाना आज भी एक बड़ी चुनौती थी। वे बताती है बॉडी बिल्डिंग एक महंगा खेल है, जिसमें कम से कम 5 से 6 लाख का खर्च आता है लेकिन इस बार कोच और कुछ सहयोगियों की मदद से उन्होंने किसी तरह फंड जुटाया। इस तरह वर्ष 2024 में उन्होंने इंडोनेशिया में अपनी पहली अंतरराष्ट्रीय बॉडी बिल्डिंग प्रतियोगिता में भाग लिया और रजत पदक जीतकर देश का नाम रोशन किया। इसी वर्ष उन्होंने मालदीव में आयोजित वर्ल्ड चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीतकर देश का नाम रोशन किया।
लेकिन वंदना का लक्ष्य स्पष्ट था उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वर्ण पदक ही जीतना था। इसके लिए उन्होंने बिना रुके, बिना थके लगातार मेहनत जारी रखी।
स्वर्णिम उपलब्धि
वर्ष 2025 उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण साल रहा। उन्होंने ‘मिस इंडिया बॉडी बिल्डिंग’ का खिताब जीता और वर्ल्ड चैंपियनशिप में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाली वे एकमात्र महिला खिलाड़ी बनीं। अपनी मेहनत और समर्पण से उन्होंने वर्ल्ड बॉडी बिल्डिंग चैंपियनशिप 2025 में स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रच दिया। वे यह उपलब्धि हासिल करने वाली भारत की पहली महिला बॉडीबिल्डर बनीं।
चुनौतियां और संघर्ष
वे बताती हैं शुरुआत आसान नहीं थी। समाज की नकारात्मक सोच और संसाधनों की कमी जैसी तमाम चुनौतियां उनके सामने थीं। लोग कहते कि यह खेल औरतों के लिए नहीं है, लेकिन वंदना ने इन बातों को नजरअंदाज़ कर अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित रखा। आज उनकी फिटनेस देखकर वही लोग उनकी तारीफ करते हैं और उनसे सलाह लेने आते हैं।
वंदना का मानना है कि अगर कोई महिला मजबूत इरादों के साथ कुछ पाने की ठान ले, तो कोई भी बाधा उसे रोक नहीं सकती। वह असंभव को भी संभव बना सकती है। वे मुस्कुराते हुए कहती हैं, “भारत की नारी सब पर भारी है।” उनके जीवन में रोज चुनौतियां आती हैं, लेकिन उनके दृढ़ संकल्प के आगे हर चुनौती छोटी पड़ जाती है।चोट, आर्थिक तंगी और सामाजिक आलोचनाएं बावजूद इसके उन्होंने अपना लक्ष्य नहीं छोड़ा।
सोच और प्रेरणा
‘बिलीविंग इज़ अचीविंग’ को अपने जीवन का मूल मंत्र मानने वाली वंदना का मानना है कि खिलाड़ी जब अंतरराष्ट्रीय मंच पर उतरता है, तो वह अकेला नहीं होता, बल्कि पूरे देश की उम्मीदों का प्रतिनिधित्व करता है। वे कहती हैं, “मैं कभी भी सिर्फ वंदना बनकर विदेश नहीं गई, बल्कि भारत की जिम्मेदारी लेकर गई हूं। वहां लोग मुझे नहीं, मेरे देश को देखते हैं।” वे यह भी मानती हैं कि खेल के लिबास या मंच से डरना नहीं चाहिए, क्योंकि खिलाड़ी अपने देश का प्रतिनिधित्व करता है, और लिबास से व्यक्तित्व तय नहीं होता।
वर्तमान जीवन और लक्ष्य
आज वंदना बच्चों को कोचिंग देती हैं, जिम में ट्रेनिंग कराती हैं और खुद भी कड़ी मेहनत करती हैं। उनकी दिनचर्या बेहद अनुशासित है सुबह जल्दी उठकर अभ्यास, दिनभर ट्रेनिंग और शाम को अपनी प्रैक्टिस। वे इस साल के अंत में होने वाली वर्ल्ड चैंपियनशिप की तैयारी में जुटी हैं और देश के लिए फिर से स्वर्ण पदक जीतना चाहती हैं।
समाज के लिए उनका सपना
वंदना चाहती हैं कि वे आर्थिक रूप से कमज़ोर लड़कियों की मदद करें, जो इस क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहती हैं लेकिन सही मार्गदर्शन और संसाधनों की कमी के कारण पीछे रह जाती हैं। वे उन्हें ट्रेनिंग, सही दिशा और जरूरत पड़ने पर आर्थिक सहयोग भी देना चाहती हैं, ताकि वे भी देश का प्रतिनिधित्व कर सकें।
रोज़गार और सहयोग की आवश्यकता
इतनी बड़ी अंतर्राष्ट्रीय उपलब्धियां हासिल करने के बावजूद वंदना ठाकुर को अब तक कोई स्थायी सरकारी नौकरी या पर्याप्त आर्थिक सहयोग नहीं मिल पाया है। वर्तमान में वे बच्चों को कोचिंग देकर और जिम में ट्रेनिंग देकर अपनी आजीविका चला रही हैं, साथ ही अपनी खेल तैयारी का खर्च भी खुद उठाती हैं। यदि उन्हें सरकारी स्तर पर उचित रोज़गार और सहयोग मिले, तो वे पूरी तरह निश्चिंत होकर अपने खेल पर ध्यान केंद्रित कर सकेंगी। साथ ही, उनका अनुभव देश की नई प्रतिभाओं को तैयार करने में बेहद उपयोगी साबित होगा।
सम्मान और उपलब्धियां
• इंदौर स्वच्छता अभियान की ब्रांड एंबेसडर
• मध्यप्रदेश की पहली महिला बॉडी बिल्डर
प्रमुख उपलब्धियां
• नेशनल कराटे चैंपियनशिप (2015) - स्वर्ण
• वर्ल्ड पावर लिफ्टिंग चैंपियनशिप (2017-दिल्ली) - स्वर्ण
• नेशनल फिटनेस मॉडलिंग (2018-गोवा) - स्वर्ण
• सीनियर नेशनल बॉडीबिल्डिंग (2024-पंजाब) - रजत
• वर्ल्ड बॉडीबिल्डिंग (2024- बाताम- इंडोनेशिया) - कांस्य
• एशियन बॉडी बिल्डिंग (2024-मालदीव्स) – रजत
• सीनियर नेशनल एंड ‘मिस इंडिया बॉडीबिल्डर’ (2025-कर्नाटक) - स्वर्ण
• वर्ल्ड बॉडीबिल्डिंग चैंपियनशिप ( इंडोनेशिया-2025) - स्वर्ण
सन्दर्भ स्रोत : वंदना ठाकुर से सीमा चौबे की बातचीत पर आधारित
© मीडियाटिक



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