छाया : पूजा मिश्रा के लिंक्डइन अकाउंट से
भोपाल। किसी बच्चे का भविष्य उसकी परिस्थितियां क्यों तय करें—इसी सवाल ने भोपाल की दो बहनों को सामाजिक बदलाव की दिशा में काम करने के लिए प्रेरित किया। अपर आयकर आयुक्त (आईआरएस) डॉ. मेघा भार्गव और जिनेवा स्थित वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की सदस्य डॉ. रूमा भार्गव ने इसी सोच के साथ ‘समर्पण’ संस्था की स्थापना की। आज यह संस्था मध्यप्रदेश के ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में 10 हजार से अधिक लड़कियों के जीवन में सकारात्मक बदलाव ला चुकी है।
डॉ. मेघा और डॉ. रूमा का मानना है कि यदि शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यावरण जैसे मूलभूत क्षेत्रों में समय पर सहयोग मिल जाए, तो किसी भी बच्चे की जीवन दिशा बदली जा सकती है। इसी कारण ‘समर्पण’ का कार्य किसी एक विषय तक सीमित न होकर, उन सभी कमियों को दूर करने पर केंद्रित है जो बालिकाओं की प्रगति में बाधा बनती हैं।
मासिक धर्म बना शिक्षा में सबसे बड़ी बाधा
ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी मासिक धर्म को लेकर सामाजिक चुप्पी और भ्रांतियां बड़ी संख्या में लड़कियों को स्कूल छोड़ने पर मजबूर कर देती हैं। इस समस्या को गंभीरता से लेते हुए ‘समर्पण’ ने स्कूलों में कपड़े से बने सेनेटरी नैपकिन और पुनः उपयोग किए जाने वाले पीरियड अंडरवियर वितरित करना शुरू किया।
संस्था द्वारा आयोजित संवाद सत्रों में बालिकाओं को मासिक धर्म से जुड़े मिथकों को तोड़ने, स्वच्छता के महत्व को समझने और अपने स्वास्थ्य पर खुलकर बात करने के लिए प्रोत्साहित किया गया। इसके परिणामस्वरूप कई इलाकों में स्कूल ड्रॉपआउट दर में कमी दर्ज की गई है और अधिक लड़कियां उच्च शिक्षा की ओर अग्रसर हो रही हैं।
टिकाऊ समाधान पर जोर
डॉ. रूमा भार्गव के अनुसार, री-यूजेबल सेनेटरी पैड्स दो से तीन वर्षों तक उपयोग किए जा सकते हैं। ये न केवल किफायती हैं, बल्कि संक्रमण के जोखिम को भी कम करते हैं। संस्था का उद्देश्य केवल सहायता प्रदान करना नहीं, बल्कि बालिकाओं को जागरूक, स्वस्थ और आत्मनिर्भर बनाना है।
पुलिस के साथ मिलकर भी काम
डॉ. रूमा भार्गव ने बताया कि वर्तमान में ‘समर्पण’ होशंगाबाद जिले में पुलिस के मुस्कान ऑपरेशन के साथ मिलकर कार्य कर रही है। इस पहल का उद्देश्य बालिकाओं की सुरक्षा, शिक्षा और पुनर्वास को मजबूत करना है।
बदलाव की मिसाल बनी ‘समर्पण’
‘समर्पण’ संस्था ने यह साबित किया है कि जब संवेदनशीलता, समझ और निरंतर प्रयास एक साथ आते हैं, तो सामाजिक बदलाव संभव है। शोर से दूर रहकर किए गए ये प्रयास आज हजारों लड़कियों के भविष्य को नई दिशा दे रहे हैं।
सन्दर्भ स्रोत : दैनिक भास्कर
सम्पादन : मीडियाटिक डेस्क



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