प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में एक अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि वैवाहिक संबंधों के दौरान जन्मे बच्चे को कानूनी रूप से पति की वैध संतान माना जाएगा। अदालत ने कहा कि डीएनए टेस्ट केवल तभी आदेशित किया जा सकता है जब यह साबित हो कि गर्भधारण की अवधि के दौरान पति-पत्नी का कोई संपर्क नहीं हुआ था।
हाईकोर्ट की पीठ, न्यायमूर्ति नंद प्रभा शुक्ला की अध्यक्षता में, ने आगरा फैमिली कोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें डीएनए टेस्ट कराने की मांग को खारिज किया गया था। कोर्ट ने अपने निर्णय में जोर दिया कि विवाह के दौरान जन्मे बच्चे की वैधता को केवल अत्यंत ठोस साक्ष्यों से ही चुनौती दी जा सकती है।
डीएनए टेस्ट सामान्य प्रक्रिया नहीं
मामले के विश्लेषण में सामने आया कि बच्चा वैध विवाह के दौरान जन्मा। भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 112 के अनुसार, ऐसे बच्चे को पति की वैध संतान माना जाएगा। इसे चुनौती देने के लिए यह साबित करना जरूरी है कि पति-पत्नी के बीच गर्भधारण के समय कोई संपर्क नहीं था।
हाईकोर्ट ने कहा कि विवाहेतर संबंधों के आरोप या निजी डीएनए रिपोर्ट पर आधारित संकेतों के आधार पर बच्चे की वैधता को खारिज नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि डीएनए टेस्ट केवल अत्यावश्यक परिस्थितियों में ही कराया जाना चाहिए, सामान्य प्रक्रिया नहीं हो सकता।
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बच्चों के अधिकार और निजता की सुरक्षा
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि जबरन डीएनए टेस्ट कराने से व्यक्ति की निजता का उल्लंघन हो सकता है और महिला व बच्चे की सामाजिक प्रतिष्ठा पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। कानून का मुख्य उद्देश्य बच्चों को "अवैध" घोषित करने की बजाय उनकी वैधता और सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
फैमिली कोर्ट ने भी अपने आदेश में कहा था कि याची और प्रतिवादी के बीच लिव-इन रिलेशनशिप या ऐसे ठोस संबंधों का पर्याप्त साक्ष्य नहीं है, जिसके आधार पर डीएनए जांच का आदेश दिया जा सके। हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि इस मामले में डीएनए टेस्ट की कोई अत्यावश्यक जरूरत नहीं है, इसलिए निचली अदालत का आदेश पूरी तरह सही है।



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