“इसे ज़हर दे दो…” से 'देश की 100

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“इसे ज़हर दे दो…” से 'देश की 100
प्रभावशाली महिलाओं' तक बबली गंभीर 

छाया : बबली गंभीर के फेसबुक अकाउंट से 

• सीमा चौबे

10 अक्टूबर 1965 को रतलाम जिले के जावरा में एक सम्मानित परिवार में जन्मी बबली गंभीर (Bably Gambhir), जिनके पिता श्री इकबाल सिंह गंभीर 10 गांवों के सरपंच थे, घर में सबसे छोटी थीं, लेकिन सबसे ज्यादा सवालों के साथ आई थीं। तीन भाई और पांच बहनों में अंतिम संतान के रूप में जन्मी इस बच्ची का स्वागत खुशियों से ज्यादा चिंता और झिझक के साथ हुआ। लंबे अंतराल के बाद गर्भवती हुईं मां श्रीमती लीलावंती कौर ने समाज के डर से दवाइयां खा लीं यह सोचकर कि “इस उम्र में बच्चा होगा तो लोग क्या कहेंगे?” नतीजा यह कि बच्ची शारीरिक विकृतियों के साथ पैदा हुई। जन्म के समय उसके दोनों हाथ छोटे और टेढ़े-मेढ़े थे और उंगलियाँ भी 5 की जगह 3-3 ही थीं।

यह देख इकबाल सिंह जी के एक दोस्त ने तो यहां तक कह दिया कि यह बच्ची बोझ है, इसे ज़हर दे दो, यह तुम्हारे परिवार पर संकट बन जाएगी। लेकिन पिता समाज और नवजात बच्ची के बीच ढाल बनकर खड़े हो गए। उसे बोझ मानने के बजाय उन्होंने उसे 'योद्धा' बनाना शुरू कर दिया। बड़े होने पर बबली भले ही बाहरी दुनिया से कटी हुई थी, लेकिन पिता के लिये तो वह एक राजकुमारी थी। वे उसे ढोलक बजवाते, उसके हाथों को चलाना सिखाते, पेंटिंग करवाते ताकि उसकी उँगलियों में हरकत होती रहे। उन्होंने उस छोटी बच्ची को यह सिखाया कि कमी शरीर में हो सकती है, हुनर में नहीं।

•  शारीरिक स्थिति और संघर्ष

बबली की बचपन की शुरुआती पढ़ाई जावरा में हुई। उनका दाखिला सेंट मेरी इंग्लिश मीडियम स्कूल (St. Mary English Medium School) में कराया गया, जहाँ उन्होंने तालीम की पहली सीढ़ी चढ़ी। इसके बाद उन्होंने कमला नेहरू कन्या माध्यमिक विद्यालय में प्रवेश लिया और पाँचवीं कक्षा तक की पढ़ाई वहीं पूरी की।

सिर्फ 6-7 साल की उम्र में बबली ने अपने पिता को खो दिया। जिस बच्ची की पूरी दुनिया एक इंसान के इर्द-गिर्द घूमती थी, वह अचानक अकेली हो गई। डर, असुरक्षा और हीन भावना ने उसे घेर लिया। पिता की मौत के बाद उनके जीवन ने एक नया मोड़ लिया। उनके बड़े भाई, जो बालको (BALCO- भारत एल्यूमिनियम कंपनी) में जूनियर इंजीनियर थे, उन्हें अपने साथ बिलासपुर ले गए। वहाँ उनका दाखिला केंद्रीय विद्यालय में कराया गया।

बिलासपुर (bilaspur) का नया परिवेश उनके लिए बिल्कुल अलग था। वहां का रहन-सहन, भाषा और बच्चों का व्यवहार सब कुछ बदल चुका था। स्कूल और क्लब के कार्यक्रमों में जब वह साधारण कपड़ों और अपने असामान्य हाथों के साथ पहुँचतीं, तो बच्चे उनसे दूरी बनाते, उनका मजाक उड़ाते और साथ बैठने से भी कतराते। यह दौर उनके जीवन का सबसे कठिन सामाजिक संघर्ष था, जहाँ हर दिन उन्हें खुद को साबित करने की चुनौती मिलती थी। लेकिन इस संघर्ष के बीच उनकी जिंदगी में रोशनी बनीं उनकी शिक्षक सुष्मिता, जिन्होंने सिर्फ पढ़ाया नहीं, बल्कि जीना भी सिखाया।

•  आत्मविश्वास का जन्म

दसवीं तक की पढ़ाई के बाद जीवन ने फिर करवट ली। भाई के घर में रहते हुए उसे अपनापन कम और उपेक्षा ज्यादा मिली। भाभी के व्यवहार ने उसे यह एहसास दिला दिया कि वह उन पर बोझ है और जब भाई के यहाँ बेटी का जन्म हुआ, तो बबली के लिए उस घर के दरवाज़े बंद हो गए। उसे वापस जावरा भेज दिया गया। लेकिन इस बार वे पहले की तरह डरी-सहमी बच्ची नहीं थीं। उनके भीतर आत्मविश्वास का बीज अंकुरित हो चुका था।

उन्होंने पढ़ाई जारी रखी, हायर सेकेंडरी में सर्वोच्च अंक हासिल किए, बीए किया, फिर इंग्लिश लिटरेचर में एमए भी पूरा किया।

•  नया रास्ता, नया सपना

बबली को हमेशा से यह महसूस हुआ कि उनमें एक अलग तरह की प्रतिभा छिपी हुई है। उन्हें यकीन था कि वह कुछ ख़ास कर सकती हैं, जो शायद बाकी लोग नहीं कर पाते। एक दिन जब वह इंदौर के ब्यूटी पार्लर (beauty Parlour) गईं, तो वहां से उन्हें अपनी राह का आभास हुआ। उन्हें लगा, यही वह रास्ता है, जहां वह अपनी पहचान बना सकती हैं। हालांकि इससे पहले उन्हें रिंगनोद के सरकारी स्कूल में इंग्लिश टीचर की नौकरी मिल चुकी थी। यह एक सुरक्षित और प्रतिष्ठित नौकरी थी, जिससे उनका भविष्य संवर सकता था। लेकिन बबली को लगता था कि यह रास्ता बहुत आसान है और वह किसी और तरह से खुद को साबित करना चाहती थीं।

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•  साहसिक कदम: पार्लर खोलने का निर्णय

बबली ने घरवालों के सामने अपनी इच्छा जताई कि वह यह नौकरी नहीं करना चाहतीं, बल्कि ब्यूटीशियन (beautician) बनना चाहती हैं। घरवालों के लिए यह एक बड़ा झटका था। बबली का यह कदम उनके परिवार के विरोध का कारण बना। घर और समाज दोनों उसके खिलाफ खड़े हो गए। सबसे बड़ा विरोध था “सिख की बेटी होकर बाल काटेगी?” यह सवाल उनके लिए एक चुनौती बन गया। घरवालों की इस आलोचना के बीच बबली ने एक दिन अपने लंबे बालों पर कैंची चला दी। इस घटना से घर में हंगामा मच गया। समाज से भी उन्हें धमकियाँ मिलीं, लेकिन बबली एक बित्ता भी अपने फैसले से पीछे नहीं हटीं।

•  मेहनत और संघर्ष

बबली जानती थीं कि उनका सपना बड़ा है और इसे पूरा करने के लिए उन्हें कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा। हालांकि ब्यूटीशियन कोर्स करने के लिए पैसों की कमी थी। इस चुनौती का सामना करने के लिए बालको (BALCO) में सीखा हुनर काम आया। उन्होंने पेंटिंग, ड्राइंग और इंटीरियर डेकोरेशन की क्लासेस शुरू कीं। धीरे-धीरे पैसे जुटाने में सफलता मिलने लगी। इंदौर जाकर बबली ने ब्यूटीशियन प्रशिक्षण लिया, लेकिन यह रास्ता भी आसान नहीं था। तीन उंगलियों से कैंची पकड़ना, धागा चलाना हर दिन एक नई चुनौती थी। लेकिन बबली ने कभी हार नहीं मानी। उन्होंने अपने हाथों को साधा और पैरों पर धागा चलाकर घंटों अभ्यास किया। धीरे-धीरे उनकी मेहनत रंग लाई और एक दिन वही हाथ बिजली की तरह तेज़ चलने लगे।

•  सफलता की ऊँचाई

बबली ने भारत के बड़े-बड़े आर्टिस्ट से अपनी कला में निपुणता हासिल की। पंढरी दादा Pandhari Dada, जावेद हबीब Jawed Habib, पैरी पटेल Perry Patel और ऑस्कर बारेरा Oscar Barrera जैसे कलाकारों से उन्होंने हेयर और स्किन की बारीकियाँ सीखीं। अपनी पूरी यात्रा और मेहनत के बाद उन्होंने अपना पार्लर ‘स्टूडियो शीन’ Studio Sheen शुरू किया। शुरुआत में लोगों को उन पर भरोसा नहीं था। पहले ही दिन एक ग्राहक ने उसके हाथ देखकर मना कर दिया। हालांकि, वह अब टूटने वालों में से नहीं थी। उसने लोगों का विश्वास जीतने के लिए डांस क्लास शुरू की। धीरे-धीरे लोगों का नज़रिया बदला.... और फिर वही लोग उसके काम के मुरीद हो गए। आज हालत यह है कि लोग उनसे काम करवाने के लिए घंटों इंतज़ार करते हैं। अब लोग उन्हें ‘क्वीन ऑफ शीन’ (Queen of Sheen) के नाम से जानते हैं।

•  सम्मान और प्रेरणा

बबली को पहला अवार्ड वर्ष 2011 में दिव्यांगों की संस्था एविनिटी फाउंडेशन (Avinity Foundation) से मिला। यह सम्मान उनके सपनों को पंख देने वाला साबित हुआ। 2013 में, बबली गंभीर को तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी (Pranab Kumar Mukherjee) से सृजनशील व्यक्तित्व के लिए सम्मानित किया गया। इसके साथ ही, देश की 100 प्रभावशाली महिलाओं में उनका नाम भी शामिल हुआ।

• शादी पर बबली का दृष्टिकोण

शादी के विषय पर बबली कहती हैं, "अपनी शारीरिक स्थिति को देखते हुए, मैं शादी के लिए तैयार नहीं थी, हालांकि पहले कई प्रपोजल आए थे।" लेकिन एक रिश्ते के टूटने के बाद उन्होंने हर प्रपोजल को ठोकर मार दी और अपने रास्ते पर अकेले चलने का फैसला किया।

•  आत्मनिर्भरता की पाठशाला

आज बबली का 'स्टूडियो शीन' सिर्फ एक पार्लर नहीं है, बल्कि यह आत्मनिर्भरता की पाठशाला बन चुका है। यहाँ वे न केवल महिलाओं को सुंदरता का अहसास कराती हैं, बल्कि सैकड़ों युवतियों और महिलाओं को प्रशिक्षित कर उन्हें आत्मनिर्भर बना चुकी हैं।

• बबली का उद्देश्य और भविष्य

बबली कहती हैं, "मैं अपने काम को बहुत बड़े स्तर पर ले जाना चाहती हूँ। 2027 मेरा साल होगा। मैं कुछ ऐसा करना चाहती हूँ जिस पर हर महिला गर्व कर सके। मैं अपने पिता के नाम पर कुछ बड़ा करना चाहती हूँ।" 

सन्दर्भ स्रोत : बबली गंभीर से सीमा चौबे की बातचीत पर आधारित 

© मीडियाटिक

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