Allahabad High Court ने एक अहम फैसले में कहा है कि पत्नी को मिलने वाले गुजारा भत्ता (Maintenance) का निर्धारण उसकी शैक्षणिक योग्यता या पुरानी नौकरी से नहीं, बल्कि पति की सामाजिक और आर्थिक स्थिति के आधार पर किया जाना चाहिए। अदालत ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें महिला को केवल 15 हजार रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण देने की बात कही गई थी।
क्या है पूरा मामला?
याचिका दायर करने वाली महिला की शादी अगस्त 2024 में अहमदाबाद में हुई थी। महिला का आरोप है कि शादी के करीब एक महीने बाद ही दहेज की मांग और प्रताड़ना के चलते उसे ससुराल छोड़कर मायके लौटना पड़ा। तब से वह बिना किसी आर्थिक सहायता के अपने पिता पर निर्भर होकर रह रही है।
महिला के पास MBA डिग्री है और शादी से पहले वह नौकरी भी कर चुकी थी। हालांकि, उसका कहना है कि शादी के बाद से वह बेरोजगार है और खुद का खर्च उठाने में सक्षम नहीं है। इसी आधार पर उसने फैमिली कोर्ट में मेंटेनेंस की मांग की थी, जहां उसे 15 हजार रुपये प्रतिमाह देने का आदेश दिया गया।
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हाईकोर्ट में महिला ने क्या दलील दी?
महिला ने फैमिली कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में पुनर्विचार याचिका दाखिल की। उसने दावा किया कि उसका पति विदेश में एजुकेशन कंसल्टेंसी का कारोबार करता है और उसकी सालाना आय करीब 5 करोड़ रुपये है। महिला ने अदालत से गुजारा भत्ता बढ़ाकर 25 हजार रुपये प्रतिमाह करने की मांग की।
अदालत ने क्या कहा?
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस Garima Prasad ने कहा
• “पत्नी के भरण-पोषण का आकलन पति की सामाजिक और आर्थिक स्थिति के आधार पर किया जाना चाहिए, न कि पत्नी की पूर्व आय या शैक्षणिक योग्यता के आधार पर।”
• अदालत ने यह भी कहा कि केवल इस आधार पर कि पत्नी पढ़ी-लिखी है या पहले नौकरी कर चुकी है, उसे गुजारा भत्ता देने से इंकार नहीं किया जा सकता।
फैमिली कोर्ट को फिर से सुनवाई का निर्देश
हाईकोर्ट ने मामले को दोबारा विचार के लिए फैमिली कोर्ट भेज दिया है और निर्देश दिया है कि छह महीने के भीतर मेंटेनेंस की राशि नए सिरे से तय की जाए।
पति ने क्या कहा?
पति पक्ष की ओर से दावा किया गया कि महिला का व्यवहार ठीक नहीं था और वह शादी के करीब 20 दिन बाद ही मायके चली गई थी। पति ने कहा कि उसकी पत्नी MBA डिग्रीधारी है और पहले तीन अलग-अलग कंपनियों में काम कर चुकी है, जहां वह करीब 37 हजार रुपये प्रतिमाह कमाती थी। पति ने यह भी कहा कि महिला आसानी से 50 हजार रुपये महीना कमा सकती है। वहीं पति ने अपनी आय सिर्फ 15 से 20 हजार रुपये प्रतिमाह बताई और कहा कि उस पर परिवार की अन्य जिम्मेदारियां भी हैं।
कोर्ट ने अलग रहने को माना उचित
अदालत ने सुनवाई के दौरान यह भी नोट किया कि पति ने अपनी पत्नी को वापस साथ रखने की कोई गंभीर कोशिश नहीं की। क्रॉस-एग्जामिनेशन में भी पति की ओर से ऐसा कोई प्रस्ताव सामने नहीं आया। कोर्ट ने माना कि ऐसे हालात में पत्नी का अलग रहना उचित प्रतीत होता है।



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