इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि पिता को अपने नाबालिग बच्चों की अभिरक्षा किसी भी व्यक्ति को मनमर्जी से सौंपने का असीमित अधिकार नहीं है। अदालत ने कहा कि ऐसा मानना कानून और नैतिकता दोनों के खिलाफ है।
मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेन्द्र की खंडपीठ ने यह फैसला युवराज, आयुष्मान व अन्य की विशेष अपील स्वीकार करते हुए दिया।
खंडपीठ ने एकलपीठ का फैसला पलटा
मामले में पहले एकलपीठ ने कहा था कि पिता, जो नाबालिग बच्चे का नैसर्गिक संरक्षक होता है, उसे बच्चे की अभिरक्षा किसी भी व्यक्ति को सौंपने का पूरा अधिकार है। इसी आधार पर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका खारिज कर दी गई थी। हालांकि, खंडपीठ ने इस टिप्पणी को पूरी तरह अस्वीकार करते हुए कहा कि किसी भी स्थिति में ऐसा आदेश कायम नहीं रह सकता। अदालत ने कहा कि यह कहना भी गलत है कि माता या अन्य अभिभावक पिता द्वारा अभिरक्षा स्थानांतरित करने के फैसले को चुनौती नहीं दे सकते।
ये भी पढ़िए ...
केरल हाईकोर्ट: कस्टडी के फैसले जेंडर नहीं, बच्चे के सर्वोत्तम हित पर आधारित होंगे
बॉम्बे हाईकोर्ट : बच्चे की कस्टडी तय करने में धर्म निर्णायक नहीं
राजस्थान हाईकोर्ट : वित्तीय हालात बेहतर होना बच्चे की अभिरक्षा का आधार नहीं
मां को अभिरक्षा न देकर दूसरों को सौंपे गए थे बच्चे
याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि उनके पिता ने बच्चों की अभिरक्षा मां को देने के बजाय अन्य लोगों को सौंप दी थी। इसे अवैध निरुद्धि बताते हुए बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल की गई थी। एकलपीठ ने याचिका खारिज कर दी थी, जिसके खिलाफ विशेष अपील दायर की गई। अब खंडपीठ ने 3 अप्रैल 2026 के आदेश को रद्द करते हुए मामले को दोबारा सुनवाई और कानून के अनुसार निर्णय के लिए एकलपीठ को वापस भेज दिया है।
अदालत की अहम टिप्पणी
खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा कि पिता को यह अधिकार नहीं दिया जा सकता कि वह नाबालिग बच्चे की अभिरक्षा किसी भी व्यक्ति को ट्रांसफर कर दे। अदालत के अनुसार यह सिद्धांत कानून और नैतिकता दोनों के विरुद्ध है।



Comments
Leave A reply
Your email address will not be published. Required fields are marked *