प्रदेश से पं. जसराज की एकमात्र शिष्या: डॉ. नीलांजना वशिष्ठ

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प्रदेश से पं. जसराज की एकमात्र शिष्या: डॉ. नीलांजना वशिष्ठ


छाया: डॉ. नीलांजना वशिष्ठ के फेसबुक अकाउंट से 

• सीमा चौबे 

अपनी मंज़िल हासिल करने के लिए बस जज़्बे और ज़िद की ज़रूरत होती है, फिर रास्ते अपने आप बनते जाते हैं। ऐसी ही ज़िद और लगन के साथ   शास्त्रीय गायिका डॉ. नीलांजना वशिष्ठ ने समाज की बंदिशों को तोड़कर अपनी अलग पहचान और अलग मुकाम हासिल किया है। मध्यप्रदेश में पं. जसराज की एकमात्र शिष्या होने का गौरव उनके खाते में है।  

रेलवे में मास्टर श्री रमन लाल वशिष्ठ और श्रीमती कांति वशिष्ठ के घर तीसरी संतान के रूप में विदिशा में जन्मी नीलांजना से पहले घर में दो बेटे थे और तीसरी संतान के रूप में सभी बेटी चाहते थे। यह संयोग ही था कि जिस दिन नीलांजना का जन्म हुआ, उस दिन दीपावली थी और पूजा के दौरान उनकी मां ने लक्ष्मी से उनके स्वरूप में ही संतान की कामना की थी। बेटी का जन्म होते ही घर में दोबारा दिवाली सा उत्सव मनाया गया। ढोल-नगाड़ों और शहनाइयों की गूंज के साथ उनका घर में स्वागत हुआ।

एक मध्यम वर्गीय परिवार में 9 नवम्बर को जन्मी नीलांजना का बचपन बेहद खुशगवार और खुले माहौल में बीता। पारिवारिक वातावरण संगीतमय होने के कारण सुर और ताल की समझ बचपन से ही विकसित होना शुरू हो गई थी। उनकी रुचि देखते हुए कम उम्र में ही माता-पिता ने गायन का प्रशिक्षण देना शुरू कर दिया था। ननिहाल और ददिहाल में सभी को संगीत में रुचि थी। घर में होने वाली बैठकों और आयोजनों में सब एक साथ गाते थे। उनके मामा बहुत अच्छे भजन गाया करते थे तो ताऊ और उनकी बेटी बहुत अच्छा तबला बजाते। हालांकि परिवार में संगीत को लेकर बहुत जागरूकता नहीं थी और नीलांजना के अलावा किसी ने इसे करियर के रूप में नही अपनाया, लेकिन परिवार में एक सांगीतिक माहौल अवश्य था। ग़ज़लें सुनने के शौक़ीन उनके पिता उस समय  एक टेप रिकॉर्डर  खरीद कर लाये। उस समय गिने-चुने लोगों के घर टेप रिकॉर्डर हुआ करता था। घर में सभी गुलाम अली और मेहदी हसन की गजलें खूब सुना करते थे। ग़ज़लें सुनते-सुनते नीलांजना ने भी गुनगुनाना शुरू कर दिया। उस समय उनकी  उम्र महज 11 साल थी।

नीलांजना को रिदम और लय जैसे किसी वरदान के रूप में मिले, हालांकि शुरुआत में उनका रुझान नृत्य की तरफ ज़्यादा था और वे गायन से कहीं बेहतर प्रदर्शन कथक और भरतनाट्यम में किया करती थीं। ख़ास बात यह कि 11 वर्ष की उम्र में आने तक उन्होंने रेडियो और टेप रिकॉर्डर में सुनकर गाना सीखा तो नृत्य करना फिल्मों से। वे नृत्यांगना ही बनना चाहती थीं और शुरुआती शोहरत उन्हें इसी रूप में मिली। अनेक जिला और राज्य स्तरीय पुरस्कार उन्होंने हासिल किए। यह पूछने पर कि फिर गायन के क्षेत्र में कैसे आईं -  वे  बताती हैं  विदिशा छोटी जगह थी, जहाँ नृत्य के लिए उन्हें पर्याप्त अवसर नहीं मिले। दूसरा, रूढ़िवादी समाज में नृत्य को अच्छा नहीं समझा जाता था। कुछ बंदिशें भी थीं, इसलिए धीरे-धीरे गाने की तरफ रुझान बढ़ता चला गया।

इस क्षेत्र में उनके आने की घटना भी कम रोचक नहीं हैं। वे बताती हैं जब उन्हें स्कूल के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में शामिल किया जाता तो गायन में ऊपर के स्केल पर जाने में उन्हें दिक्कत आती थी। इस कारण उन्हें समूह से यह कहकर हटा दिया जाता कि तुम अच्छा गाती हो, लेकिन हमें पतली आवाज वाली लड़कियां चाहिए और अगर गायन में शामिल किया जाता तो उन्हें केवल नीचे के स्वर वाला हिस्सा गाने को दिया जाता था। इस तरह बार-बार गायन से बाहर करने पर उन्होंने तय कर लिया कि अब तो गायिका ही बनना है। हालांकि उस समय तक नीलांजना ने सोचा भी नहीं था कि संगीत उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा बन जाएगा और वे एक दिन शास्त्रीय गायिका के रूप में पहचानी जायेंगी, लेकिन गायन को लेकर उनकी जिद और जुनून ऐसा कि फिर संगीत को ही उन्होंने करियर बना लिया।

नीलांजना पढ़ाई में भी बहुत होशियार थीं और स्कूल में हमेशा अव्वल आती थीं, लेकिन साइंस विषय के साथ पढ़ाई कर रहीं नीलांजना के दिमाग पर अब तक संगीत हावी हो चुका था। जब संगीत के लिए उन्होंने स्कूल में आर्ट्स विषय लेने की बात शिक्षिका को बताई तो उन्होंने साइंस में ही करियर बनाने की सलाह दी। लेकिन नीलांजना अपने निर्णय पर अडिग रहीं, नाराज़ होकर शिक्षिका ने उन्हें प्रिंसिपल के सामने ले जाकर खड़ा कर दिया। प्रिंसिपल ने भी नीलांजना को बहुत समझाया और कहा  ‘संगीत को शौक की तरह रखो, इसमें कोई करियर नहीं बनता, लेकिन नीलांजना ने उनकी भी कोई बात नहीं मानी। आखिर में प्रिंसिपल ने कहा ठीक है तुम अपने माता-पिता को लेकर आओ, उसके बाद बात करेंगे। जब पिताजी प्रिंसिपल से बात करने गए तो उन्होंने कहा आपकी बच्ची पढ़ने में बहुत होशियार है। आर्ट्स तो कमजोर बच्चे लेते हैं। प्रिंसिपल को उम्मीद थी कि वे बेटी को डांट लगाएंगे, लेकिन वशिष्ठ जी ने ऐसा कुछ नहीं किया। उन्होंने बेटी की तरफ देखा और पूछा क्या करना है? नीलांजना का वही रटा-रटाया जवाब - संगीत चाहिए इसलिए आर्ट्स ही लेना है। वे प्रिंसिपल से मुखातिब होते हुए बोले जब बच्ची की इच्छा साइंस पढ़ने की नहीं है, तो उसे आर्ट्स ही लेने दीजिये। इस तरह उन्होंने संगीत विषय के लिए आर्ट्स विषय का चुनाव किया। विद्यालय में संगीत विषय लेने के साथ ही उन्होंने अलग से भी संगीत सीखना शुरू किया।

महारानी लक्ष्मीबाई कॉलेज, विदिशा से बीए करने के दौरान वहां संगीत की अध्यापिका ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और कहा कि तुम शास्त्रीय संगीत में बहुत आगे तक जा सकती हो, लेकिन इसके लिए तुम्हें विदिशा से बाहर ऐसी जगह तलाश करनी होगी, जहाँ संगीत की असीम संभावनाएं हों। तब नीलांजना ने संगीत की आरंभिक शिक्षा भोपाल में पंडित नंदकिशोर शर्मा से लेना शुरू किया। अब पढ़ाई के साथ-साथ उन्हें रोज भोपाल भी आना होता। विदिशा उस समय बहुत छोटी जगह थी। कस्बाई मानसिकता के लोग थे और लड़कियों के लिए नाच-गाना अच्छा नहीं माना जाता था। जहाँ बेटियों को पढ़ाई के अलावा घर से बाहर जाने की इजाज़त नहीं थी, ऐसे में नीलांजना के रोज़-रोज़ भोपाल आने पर सवाल उठाये जाने लगे। कई तरह की चर्चाएं शुरू हो गईं। नौकरी की बात अलग है। भला संगीत सीखने कोई शहर छोड़कर जाता है क्या?  एक सामान्य मध्यमवर्गीय परिवार होने के बावजूद इनके माता-पिता स्वस्थ मानसिकता और खुले विचारधारा के थे, लेकिन उनकी माँ इन सब  बातों  से मायूस हो जातीं। जब लोगों की बातें पिताजी तक पहुँची तो उन्होंने अपनी बेटी की भावनाएं समझते हुए केवल इतना ही कहा- मुझे अपनी बेटी पर पूरा भरोसा है और तुम मेरा भरोसा कभी नहीं तोड़ोगी। तुम लोगों की चिंता किये बगैर संगीत में अपना भविष्य संवारो। उन्होंने अपनी बेटी को कभी किसी काम के लिए रोका-टोका नहीं। नीलांजना ने भी उनका मान और भरोसा -  दोनों बनाये रखा।

इस तरह संगीत की तालीम के साथ-साथ विदिशा से  बी.ए. पूरा किया। हिन्दी साहित्य एवं शास्त्रीय संगीत में स्नातकोत्तर करने के बाद प्रोफेसर किरण देशपांडे के निर्देशन में शास्त्रीय संगीत में (पंडित जसराज और मेवाती घराने की सांगीतिक परम्परा’ विषय) बरकतउल्ला विवि से डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। पं. नंदकिशोर शर्मा और श्री मथुरा मोहन श्रीवास्तव से संगीत की आरंभिक शिक्षा-प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद उन्होंने पद्मभूषण से अलंकृत मेवाती घराने के पं. जसराज के सानिध्य में गुरु-शिष्य परम्परा के अंतर्गत 12 वर्ष तक ख्याल गायकी का गहन प्रशिक्षण  प्राप्त किया। 

आकाशवाणी में बी हाई ग्रेडेड कलाकार नीलांजना ने दूरदर्शन पर वर्ष 91 से 95 तक बतौर उद्घोषिका काम किया। वे अपने समय की श्रेष्ठ उद्घोषिका मानी जाती थीं। व्यस्तता के बावजूद वे यदाकदा आज भी एंकरिंग के लिए दूरदर्शन पर नज़र आ जाती हैं। शिक्षा विभाग के अनेक प्रतिष्ठित समारोहों  (कला उत्सव, बाल रंग मोगली उत्सव, अनुगूंज आदि) में कल्चरल को-ऑर्डिनेटर तथा मेंटर के रूप में कार्य किया। फिर वह वक़्त भी आया जब शहर के छोटे-छोटे कार्यक्रमों के साथ आकाशवाणी से भी वे गायन प्रस्तुतियां देने लगीं।

एम.ए. करने के बाद नीलांजना  ख़याल गायिकी में आगे बढ़ना चाहती थीं, लेकिन उन्हें भोपाल में ऐसा कोई गुरु नहीं मिल रहा था, जिससे वे  ख़याल गायिकी सीख सकें। इसे लेकर वे परेशान भी रहीं क्यूंकि उनके पिता की यह  बात भी बार-बार दिमाग में आती कि अब संगीत को करियर के रूप में अपना लिया है तो पीछे मुड़कर नहीं देखना है। यहां तक पहुंचने के बाद उन्हें यह  बात अच्छी तरह समझ आ गई थी कि गहन प्रशिक्षण और किसी काबिल गुरु के बिना संगीत में दक्षता प्राप्त नहीं हो सकती। एक दिन उनकी मुलाक़ात समाजसेवी राजेंद्र कोठारी और लेखक रामप्रकाश त्रिपाठी से हुई। बातों ही बातों में नीलांजना ने अपनी परेशानी उन्हें बताई। सुनते ही रामप्रकाश जी ने कहा ‘पंडित जसराज जी से सीखोगी ?’ इतना बड़ा नाम सुनकर पहले तो नीलांजना चौंकी, फिर चहकते हुए कहा अवसर मिला तो कौन उनसे नहीं सीखना चाहेगा? संयोग था कि पंडित जी उस समय भोपाल में ही मुकाम कर रहे थे। रामप्रकाश जी से उनके अच्छी मित्रता थी। उन्होंने कहा चलो तुम्हें पंडित जी से मिलवा देते हैं, लेकिन हमारा काम केवल मिलवाने का है। तुम्हारी प्रतिभा से पंडितजी कितना प्रभावित होंगे ये तुम्हारी किस्मत।

पं. जसराज के सामने खड़ा होना ही अपने आप में बड़ी बात थी। ताज्जुब नहीं कि जब वे उनके पास  सामने पहुँची तो मारे डर के बुरी तरह कांप रही थीं। नीलांजना बताती हैं उन्होंने मुझे सुनने के बाद रामप्रकाश जी से कहा बच्ची के पास सुर है, ताल है लेकिन अभी कच्ची है। पर हम इसे ठोक पीट कर ठीक कर लेंगे, हम संगीत सिखायेंगे इसे। गुरु जी का आशीर्वाद मिलते ही लगा जैसे मन की मुराद पूरी हो गई। इस तरह वर्ष 1991 में गुरु पूर्णिमा से पं. जसराज जी के सानिध्य में संगीत की यात्रा शुरू हुई। पंडित जी से मिलना नीलांजना के जीवन का निर्णायक मोड़ साबित हुआ। नीलांजना को उनके साथ बड़े- बड़े शहरों में सांगीतिक यात्राएं और मंच साझा करने का अवसर मिला। हालांकि इस यात्रा में नीलांजना को कई तरह की दिक्कतें भी आई, क्योंकि गुरुजी अपने साथ मंच पर ऐसे ही शिष्यों को रखते थे, जो पहले से ही मंच पर प्रस्तुतियां देते रहे हैं। उनके अन्य शिष्य संगीत में परिपक्व थे, लेकिन नीलांजना के साथ ऐसा नहीं था। गुरुजी से सीखने के पहले उन्हें कोई बड़ा मंच नहीं मिला था। यह उनका बड़प्पन था कि उन्होंने नीलांजना को अपने साथ मंच पर जगह दी।

वर्ष 1997 में फार्मा कंपनी में एमआर मनीष शर्मा के साथ विवाह हो गया। मनीष उनके पिता के समान सरल-सहज व्यक्ति थे। जीवन का नया अध्याय शुरू हुआ और कुछ समय के लिए संगीत यात्रा थम सी गई।  हालांकि गुरुजी से बराबर सम्पर्क बना रहा। इसी बीच दो बेटों का जन्म हुआ और स्कूल शिक्षा विभाग में व्याख्याता के पद पर उनकी नियुक्ति भी हो गई। बच्चों के पालन-पोषण, पारिवारिक जिम्मेदारियां और नौकरी के साथ 10-12 साल बीत गए, इस बीच संगीत से दूरी बनी रही। नीलांजना बताती हैं  ‘हालांकि संगीत छोड़कर पारिवारिक दायित्व सम्भालने का निर्णय उनका अपना ही था, लेकिन सब कुछ होते हुए उन्हें अपने जीवन में कुछ खालीपन सा महसूस होता रहा।‘ एक समय ऐसा आया जब वे कई दिनों तक अलग ही मन:स्थिति से गुजरीं। उन्होंने सांगीतिक कार्यक्रमों में जाना और लोगों से मिलना-जुलना बंद कर दिया। जब लगा कि इस स्थिति से केवल संगीत के सहारे ही बाहर निकला जा सकता है, तो उन्होंने अपने पति से कहा ‘मुझे संगीत फिर से शुरू करना है।‘ मनीष जी ने पहले भी कभी उन्हें मना नहीं किया था। उन्होंने कहा ‘तुम्हें ऐसा लगता है तो तुम फिर से संगीत साधना शुरू कर सकती हो।‘

संगीत यात्रा दोबारा शुरू करने से पहले नीलांजना ने गुरु जी से बात की और उनकी आज्ञा से घर पर ही संगीत की कक्षाएं लेना शुरू किया। साथ ही रियाज़ भी करती रहीं। इस तरह संगीत उनके जीवन में फिर से प्रवेश करने लगा, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। वर्ष 2011 में मनीष जी को कैंसर हो गया। छः साल चले लम्बे इलाज के दौरान मनीष जी तो तकलीफ़ झेल ही रहे थे, नीलांजना भी मानसिक यातना से गुजरीं। अब पति  के अलावा उन्हें दोनों बच्चों और खुद को भी सम्हालना था, लेकिन इस सबके बावजूद उन्होंने संगीत का साथ नहीं छोड़ा। 2016 में मनीष जी ने इस दुनिया से विदा ले ली। जीवनसाथी से इस बिछोह के चलते 2 साल तक नीलांजना अवसाद में रहीं। नौकरी थी तो आर्थिक समस्या नहीं आई, लेकिन अकेले होने की जो सामाजिक-मानसिक समस्याएं, थीं उनसे इन्हें दो-चार होना पड़ा। बच्चों के भविष्य की चिंता अलग ही थी। इन बेहद मुश्किल हालात में अगर किसी ने उन्हें संभाले रखा तो वो संगीत ही था।

मनीष जी के न रहने के बाद नीलांजना  से मिलने आये एक मित्र ने उनसे कहा ‘तुम जब 28 साल पहले भोपाल आई थीं, तब तुम्हारा यहाँ कोई नहीं था। यह शहर तुम्हारे लिए अनजान था, यहाँ के लोग अनजान थे, तुम आत्मनिर्भर भी नहीं थीं। उस स्थिति में तुमने अपने आपको साबित कर यहां स्थापित किया, तो अब क्यों  घबराती हो। अब जबकि तुम्हारे पास अच्छी नौकरी है, बच्चे हैं, आज तुम पहले से ज्यादा सक्षम और मजबूत हो, अकेली कहां हो? उन शब्दों ने नीलांजना को अंधेरे में रोशनी दिखाई और फिर से उठकर खड़े होने का हौंसला दिया। नीलांजना बताती हैं ‘वे अति महत्वकांक्षी कभी नहीं रहीं। मन में हमेशा यह रहा कि केवल संगीत सीखना है। बड़ा कलाकार ही बनना है, ये भाव मुझमें कभी नहीं आया। व्यावसायिक या भौतिक तौर पर सफलता को तरजीह न तब देती थी, जब मुझमें समझ नहीं थी, न आज देती हूँ।‘ ख़याल गायकी से ताल्लुक रखने वाली डॉ. नीलांजना अपने परिवार की पहली शास्त्रीय गायिका हैं। शास्त्रीय एवं उप शास्त्रीय गायन में समान दक्षता रखने वाली नीलांजना जी के  गायन में मेवाती घराने की विशिष्ट झलक दिखाई देती है। वे वर्तमान में नवीन गर्ल्स हायर सेकेंडरी स्कूल नेहरू नगर में प्रिंसिपल के रूप  में कार्य करने के साथ ही गुरु-शिष्य परंपरा से शास्त्रीय संगीत के शिक्षण-प्रशिक्षण कार्य में संलग्न हैं। उनका बड़ा बेटा अबीर लंदन में सेवारत है और छोटा बेटा अनादि भोपाल में रहकर एमबीबीएस की पढ़ाई कर रहा है।

 

उपलब्धियां/सम्मान:

• गुरु शिष्य परम्परा के अंतर्गत पं. जसराज की मध्यप्रदेश से एकमात्र शिष्या

• गुरु पं. जसराज के साथ अनेक प्रतिष्ठित मंचों पर सह-गायन

• दूरदर्शन पर शख्सियत कार्यक्रम में अनेक बार साक्षात्कार प्रसारित

सम्मान:

• राष्ट्रीय साक्षरता मिशन में सांगीतिक सहयोग के लिए भारत ज्ञान विज्ञान समिति द्वारा ‘प्रतिमा सम्मान’

• नेशनल बुक ट्रस्ट इंडिया के राष्ट्रीय पुस्तक समारोह भोपाल में ‘श्रेष्ठ उद्घोषक’ के रूप में सम्मानित

• गायन में विशेष योगदान के लिए दुष्यंत सम्मान

• स्कूल शिक्षा विभाग के प्रतिष्ठित कार्यक्रम अनुगूंज में मेंटर के रूप में मुख्यमंत्री मध्यप्रदेश शासन द्वारा सम्मानित

• राष्ट्रीय बाल श्री पुरस्कार  की नेशनल ज्यूरी में शामिल

• विभिन्न सांस्कृतिक, साहित्यिक, शैक्षणिक संस्थाओं द्वारा विभिन्न सांस्कृतिक भूमिका के लिए अनेक बार सम्मानित

 

मंचीय प्रस्तुतियां- प्रमुख समारोह

• तानसेन संगीत समारोह-ग्वालियर

• संकट मोचन समारोह-वाराणसी

• सप्तक संगीत समारोह-अहमदाबाद

• पं. मोती राम संगीत समारोह-हैदराबाद

• डोवर लेन संगीत समारोह-कोलकाता

 चित्रकूट महोत्सव में रामकथा गायन

 सवाई गंधर्व संगीत समारोह-पुणे

• इसके अलावा भारत भवन, रविंद्र भवन, स्वयंसिद्धा समारोह, अयक्कर कल्चरल फेस्टिवल भिलाई, जन उत्सव भोपाल, राष्ट्रीय खादी एक्सपो सहित देश के प्रख्यात संगीत समारोहों (मुंबई, दिल्ली, भोपाल, भावनगर, जामनगर, बनारस, राजकोट, इंदौर, विदिशा, जबलपुर, आगरा, रतलाम, उज्जैन आदि) में अपने सुरों का जादू बिखेर चुकी हैं।

सन्दर्भ स्रोत : डॉ नीलांजना वशिष्ठ से सीमा चौबे की बातचीत पर आधारित

© मीडियाटिक

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