अनुप्रिया देवताले

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अनुप्रिया देवताले

छाया : अनुप्रिया देवताले के फेसबुक अकाउंट से

  कलाकार - संगीत एवं नृत्य 

• राकेश दीक्षित

अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त वायलिन वादक अनुप्रिया देवताले ने संगीत की दुनिया में पहला कदम शास्त्रीय गायकी में अभ्यास के साथ रखा था। तब वे बहुत छोटी थीं। वायलिन में उनकी दिलचस्पी तब पैदा हुई जब पिता चंद्रकांत देवताले एक दिन घर में यह पश्चिमी वाद्य यंत्र लेकर आये। उज्जैन के विक्रम विश्वविद्यालय में हिन्दी के प्राध्यापक और जाने- माने कवि देवताले बेटी की संगीत में रुचि से बहुत खुश थे। घर के तरक्कीपसंद और आज़ाद ख्याल माहौल में प्रतिरोध  की कविता गूंजती थी। पिता की कविता के साथ घर बेटी के संगीत से भरने लगा। अनुप्रिया मानती हैं कि कवि पिता की काव्यमय प्रेरणा ने उन्हें संगीत में अपने भावों और विचारों को व्यापक कैनवास पर अभिव्यक्त करने में सक्षम बनाया। देवताले जी की अनेक कविताओं को बेटी ने वायलिन पर संगीतबद्ध कर कविता और संगीत के मिलन को एक विशिष्ठ आयाम दिया है।

अनुप्रिया की वायलिन साधना और परवान चढ़ी जब उन्हें सरोद वादक अमज़द अली और सारंगी वादक पंडित रामनारायण जैसे विश्वविख्यात उस्तादों से सीखने का मौका मिला। अथक साधना, महान उस्तादों की शागिर्दी और सह्रदय पिता का उत्साहवर्धन – इन सब के मणिकांचन योग से अनुप्रिया धीरे -धीरे भारत की शीर्षतम महिला वायलिन वादक बन गईं। आज पूरी दुनिया में उनका नाम है। करीब 40  देशों में उन्होंने अपने फन की जादूगरी से सुनने वालों का दिल जीता है।

अनुप्रिया ने विक्रम विश्वविद्यालय से कला संकाय में  एमए करने  के साथ खैरागढ़ संगीत विद्यालय से संगीत में स्नातकोत्तर उपाधि ली। लेकिन संगीत साधना के लिए सही गुरु के मार्गदर्शन की जरूरत होती है, इसलिए अनुप्रिया अपनी माँ के साथ दिल्ली आ गईं और उस्ताद अमज़द अली खान से सरोद सीखना शुरू किया।.यहीं उनकी मुलाक़ात मशहूर सारंगी वादक पंडित रामनारायण से हुई, जिन्होंने उनका गुरु बनना स्वीकार किया।

वायलिन वादन में आत्मविश्वास पाने के बाद अनुप्रिया ने अपनी शैली में प्रयोग करना शुरू किया। उन्हें सूफी संगीत बहुत पसंद है। वो रॉक, हैवी मेटल, फ्लेमिंगो और सूफ़ी संगीत को भारतीय शास्त्रीय संगीत के साथ मिलाकर नए प्रयोग करती है। अनुप्रिया को संगीत साधना के अलावा बागवानी का भी खूब शौक है।

अनुप्रिया ने पाकिस्तान के मशहूर गायक उस्ताद शफ़क़त अली ख़ान के साथ भी संगत की है।  वो हिंदुस्तान की पहली कलाकार हैं जिन्हें लाहौर में 2004 में उस्ताद सलामत अली ख़ान और उस्ताद नज़ाकत अली ख़ान सम्मान से नवाज़ा गया है। उन्होंने जर्मनी ,फ्रांस ,स्पेन ,ऑस्ट्रेलिया और दूसरे देशों के संगीतकारों के साथ मिलकर भी भारतीय और पाश्चात्य संगीत में फ्यूज़न के ऐसे प्रयोग किये हैं जो सितारवादक रविशंकर की वैश्विक संगीत में प्रयोगधर्मिता की  याद दिलाते हैं। गायकी के तत्वों को वाद्य संगीत में मुखरित करने की अनुप्रिया की अनूठी शैली है। इसमें सांगीतिक मिठास, भावाभिव्यक्ति और आध्यात्मिक अनुभूति का विलक्षण मिश्रण है जो सुनने वाले को मंत्रमुग्ध कर देता है।

अनुप्रिया ने एक फ्यूज़न बैंड भी बनाया है, जिसका नाम ‘परिंदे’ है। यह बैंड विभिन्न रागों पर आधारित कम्पोजिशन पर काम करता है। लगभग 40 देशों में अपना हुनर दिखा चुकी अनुप्रिया का ‘अमीर खुसरो सेंटर फॉर म्यूजिक’ नाम से संगीत विद्यालय भी है। वे आकाशवाणी की ‘ए” ग्रेड कलाकार होने के साथ ही भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद् के कार्यक्रमों की नियमित वायलिन वादक हैं। स्पिक मैके की संगीत सभाओं में भी उन्होंने व्यापक शिरकत की है।

 

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं ।

© मीडियाटिक

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