अंजुम रहबर

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अंजुम रहबर

छाया : अंजुम रहबर के फेसबुकअकाउंट से

प्रमुख लेखिका 

उर्दू मुशायरों की जान समझी जाने वाली अंजुम रहबर का जन्म 17 सितम्बर 1961 को ननिहाल मुरैना में हुआ।  इनके पिता श्री मोहम्मद हुसैन रहबर गुना के जाने-माने हकीम होने के साथ-साथ शायर भी थे। अंजुम आठ भाई-बहनों में सबसे बड़ी हैं, लिहाज़ा इनकी जिम्मेदारियां भी बड़ी रहीं। वह 12 वर्ष की उम्र से ही घर के काम-काज अपनी माँ का हाथ बंटाने लगीं थीं। घर की माली हालत बहुत अच्छी नहीं थी, बचपन का दौर संघर्षों में ही बीत गया। बी.ए. तक की शिक्षा गुना में ही हुई। इसके बाद एम.ए. करने की अदम्य इच्छा होने के बावजूद हालात ने साथ नहीं दिए और उनकी यह इच्छा अधूरी ही रह गयी। पहली बार हिंदी साहित्य से एम.ए. प्रीवियस की परीक्षा देने के बाद फाइनल परीक्षा में नहीं बैठ सकीं। दुबारा आई.के. कॉलेज गुना से उर्दू विषय लेकर एम.ए. करना चाहा पर वह भी न हो सका। अंत में इन्होंने अलीगढ़ से अदीब-ए-कालिम का कोर्स किया। अब तक वक्त के थपेड़ो ने हालात का सामना करना इन्हें बखूबी सिखा दिया था।

पिता शायर थे, जिनकी एक साहित्यिक संस्था थी ‘बज़्म-ए-अदब’ जिसमें शिरकत करने के लिए देश के बड़े-बड़े शायर आया करते थे। ये सभी घर में ही रुकते थे जिनकी खातिरदारी में नन्हीं अंजुम को भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेना पड़ता था। ऐसे माहौल में शायरी मानो अपने आप रगों में उतरती चली गयी। बचपन से ही तुकबन्दियाँ करने लगीं, जो आगे चलकर शायरी और ग़ज़लों में तब्दील होती चली गयीं। वह वर्ष 1977 में पहले मुशायरे में शामिल हुईं, जिसमें उन्होंने अपने वालिद साहब की ग़ज़ल पढ़ी थी। इसके बाद शायरी और मुशायरों का ऐसा सिलसिला चल निकला।

अंजुम रहबर मंच और मुशायरों की कवियित्री हैं। इनकी अभी तक महज एक पुस्तक हिंदी और उर्दू में प्रकाशित हुई है, जिसका नाम है –मलमल कच्चे रंगों की। दरअसल वह मंचों की गतिविधियों में इस कदर मसरूफ रहीं कि उन्हें प्रकाशित करवाने के बारे सोचने की फुर्सत ही नहीं मिली। एक वक्त ऐसा भी आया जब देश-विदेशों के मुशायरों में उन्हें आमंत्रित किया जाने लगा। इस सिलसिले में वह अब तक अमरीका, कनाडा, पाकिस्तान, दुबई, कतर, जेद्दाह, शारजाह आदि कई देशों की यात्रा कर चुकीं हैं। इतना ही नहीं, अंजुम जी की लेखन यात्रा भले ही उर्दू से शुरू हुई बाद में हिंदी मंचों ने भी उन्हें सर आखों पर बिठा लिया। इसके पीछे वजह यह है कि उन्होंने अपनी शायरी और ग़ज़लों को ख़ालिस उर्दू की जगह उस बोलचाल की भाषा में पिरोया जिसमें हिंदी और उर्दू दोनों ही समाहित होते हैं।

ऐसे ही एक मुशायरे में अंजुम रहबर की मुलाक़ात मशहूर शायर राहत इन्दौरी साहब से हुई। तीन चार साल तक भेंट मुलाकातों के बाद दोनों ने 1988 में एक होने का फैसला कर लिया। राहत साहब पहले से विवाहित थे और इंदौर में उनका परिवार उनके साथ रहता था। इसलिए इस शादी का अंजुम के परिवार ने पुरजोर विरोध किया। अंजुम जी के पिता ने उनसे तीन चार सालों तक बात नहीं की। राहत साहब ने अंजुम से इंदौर में साथ रहने कहा। पहली पत्नी के साथ रहते वहाँ जाकर रहना अंजुम को गवारा नहीं हुआ और वह नहीं गयीं। इससे दोनों के रिश्तों में ज़्यादा फर्क भी नहीं पड़ा क्योंकि दोनों का ज़्यादातर वक्त एक शहर से दूसरे शहर मुशायरों में आना जाना लगा रहता। कुछ अरसे बाद दोनों के दरमियाँ कुछ ऐसे मसले उठे जिसका जवाब दोनों के ही पास नहीं थे। अंजुम एक ख़ुद्दार महिला की तरह शौहर से वर्ष 1993 में अलग हो गयीं लेकिन इश्क़ क़ायम रहा। आमतौर पर देखा जाता है कि ऐसे रिश्तों में अलगाव के बाद खटास आ जाती है लेकिन राहत साहब और अंजुम रहबर का रिश्ता ऐसा नहीं था। इनके बीच तल्खियां कभी आई ही नहीं। अपने बेटे समीर इन्दौरी को वह आज भी राहत साहब का दिया हुआ अनमोल तोहफा मानती हैं।

 संदर्भ स्रोत – अंजुम जी से बातचीत पर आधारित 

© मीडियाटिक

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