Rajasthan High Court ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए एक बुजुर्ग दंपति और उनके बेटे के खिलाफ चल रहे आपराधिक मुकदमे को पूरी तरह से खारिज कर दिया। इसके साथ ही कोर्ट ने कड़े शब्दों में कहा कि तलाक लेने और पूरे 20 लाख रुपये का हर्जाना (एल्युमनी) स्वीकार करने के बाद भी पूर्व पति के परिवार पर आपराधिक केस चलाते रहना कानून का दुरुपयोग और केवल प्रताड़ना का माध्यम है।
हाईकोर्ट के जस्टिस अनूप कुमार ढंड ने Anoop Kumar Dhand 65 वर्षीय सत्यपाल शर्मा और उनकी 62 वर्षीय पत्नी सीता देवी द्वारा दायर याचिका को स्वीकार करते हुए यह आदेश दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब शादी कानूनी रूप से समाप्त हो चुकी है और महिला समझौते की पूरी राशि लेकर अलग हो चुकी है, तब ससुराल पक्ष के खिलाफ मुकदमा जारी रखने का उद्देश्य केवल उन्हें परेशान करना माना जाएगा।
क्या है पूरा मामला?
शिकायतकर्ता महिला की शादी वर्ष 2009 में याचिकाकर्ताओं के बेटे से हुई थी। विवाह के कुछ समय बाद ही दोनों के बीच विवाद शुरू हो गया। वर्ष 2013 में महिला ने अपने पति और सास-ससुर के खिलाफ दहेज उत्पीड़न (धारा 498A), अमानत में खयानत (धारा 406) और अन्य गंभीर धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज कराई।
तलाक और एल्युमनी की कहानी
वर्ष 2018 में मामले में चार्जशीट दाखिल की गई। इसी दौरान पति ने तलाक की याचिका दायर की। वर्ष 2019 में Family Court Jaipur ने दोनों का तलाक मंजूर कर लिया।
बाद में मामला हाई कोर्ट पहुंचा, जहां दोनों पक्षों के बीच समझौता हुआ। समझौते के तहत पति ने अपनी पूर्व पत्नी को 20 लाख रुपये एल्युमनी देने पर सहमति जताई। दिसंबर 2024 में हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने इस समझौते को मंजूरी दी और फरवरी 2025 में आधिकारिक रूप से तलाक की डिक्री जारी कर दी गई।
समझौते के बाद पत्नी का बदला रुख
पूरी राशि बैंक खाते में प्राप्त होने और तलाक की प्रक्रिया पूरी हो जाने के बावजूद महिला ने अदालत में लंबित आपराधिक मुकदमा वापस नहीं लिया।
कोर्ट के रिकॉर्ड के अनुसार, 2018 से अब तक कई बार समन जारी होने के बावजूद न तो महिला स्वयं गवाही देने के लिए अदालत में उपस्थित हुई और न ही उसके किसी गवाह ने अदालत में पेश होकर बयान दर्ज कराए।
हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि कोई भी महिला समझौते के आधार पर तलाक की डिक्री प्राप्त करने के बाद अपनी प्रतिबद्धता से पीछे नहीं हट सकती। अदालत ने माना कि दोनों पक्षों के बीच हुआ समझौता न केवल विवाह समाप्त करने, बल्कि आपराधिक मामलों को भी समाप्त करने के उद्देश्य से किया गया था।
कोर्ट ने कहा कि हाल के वर्षों में एक चिंताजनक प्रवृत्ति देखने को मिल रही है, जहां कुछ मामलों में पत्नियां आपसी सहमति से समझौता कर अलग हो जाती हैं, लेकिन इसके बावजूद पति और उसके परिवार के खिलाफ मुकदमे जारी रखती हैं, जिससे उन्हें अदालतों के चक्कर लगाने पड़ते हैं और मानसिक परेशानी का सामना करना पड़ता है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला
हाईकोर्ट ने Preeti Gupta vs State of Jharkhand मामले में दिए गए Supreme Court of India के वर्ष 2010 के फैसले का भी उल्लेख किया।
सर्वोच्च अदालत ने उस फैसले में कहा था कि कई बार गुस्से, भावनात्मक प्रतिक्रिया या पारिवारिक विवादों के कारण धारा 498A के तहत ऐसे मामले भी दर्ज हो जाते हैं, जिनमें आरोपों की गंभीरता सीमित होती है। इसलिए अदालतों को ऐसे मामलों की सुनवाई में विशेष सतर्कता बरतनी चाहिए, ताकि न्यायिक प्रक्रिया किसी को प्रताड़ित करने का साधन न बन जाए।
इन्हीं आधारों पर राजस्थान हाई कोर्ट ने बुजुर्ग सास-ससुर के खिलाफ चल रहे मुकदमे को कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग मानते हुए उसे तत्काल समाप्त करने का आदेश दिया।



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