दिल्ली हाईकोर्ट ने फैसले में कहा है कि पति की तलाक याचिका दायर करने के बाद पत्नी को मॉलीटेंशन (अस्थायी भरण-पोषण) से वंचित नहीं किया जा सकता। हालांकि इस दौरान आवेदन हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 24 के तहत किया जाना चाहिए। न्यायमूर्ति अनिल क्षेत्रपाल और न्यायमूर्ति हरीश वैद्यनाथन शंकर ने मामले की सुनवाई की।
एक पत्नी ने पारिवारिक अदालत के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसे भरण-पोषण देने से इनकार कर दिया गया था, हालांकि उसके नाबालिग बच्चे के लिए 25,000 रुपये मासिक दिए गए थे। विवाह 2009 में हुआ था और पत्नी ने विवाह से पहले तीन साल तक काम किया था, साथ ही सिंगापुर में कुछ समय तक नौकरी की। हालांकि, बच्चे के जन्म के बाद वह नौकरी छोड़कर भारत लौट आई, जबकि पति सिंगापुर में लगभग 10 लाख रुपये मासिक कमाता था।
पारिवारिक अदालत ने तर्क दिया कि पत्नी ने नौकरी करने से मना कर दिया और वह काम करने में सक्षम होने के बावजूद नौकरी नहीं करना चाहती, इसलिए उसे मॉलीटेंशन का हक नहीं है। लेकिन हाईकोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि नवजात बच्चे की मां की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। पत्नी ने बच्चे की देखभाल अकेले की। अदालत ने कहा कि यह साबित नहीं हुआ कि पत्नी को नौकरी के अवसर मिले लेकिन उसने उन्हें ठुकराया। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पति की तलाक याचिका के बाद मॉलीटेंशन के लिए आवेदन करना कोई वैध आधार नहीं है इसे अस्वीकार करने का।



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