ग्वालियर के थाटीपुर क्षेत्र की नेहा सिंह ने यह साबित कर दिया है कि अगर मन में लगन और जज्बा हो, तो किसी साधारण परिवार से निकलकर भी राष्ट्रीय स्तर तक पहचान बनाई जा सकती है। हॉकी खिलाड़ी के तौर पर राष्ट्रीय स्तर तक अपनी पहचान बनाने के बाद, अब वह उड़ीसा स्थित नवल टाटा हॉकी अकादमी में असिस्टेंट कोच के रूप में काम कर रही हैं। उनकी कहानी उन हजारों बेटियों के लिए प्रेरणा है, जो सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े सपने देखती हैं और उन्हें पूरा करने की राह में कड़ी मेहनत करती हैं।
राज्य से राष्ट्रीय स्तर तक का सफर
नेहा सिंह ने ग्वालियर की राज्य महिला हॉकी अकादमी में ट्रेनिंग शुरू की और वहां मुख्य कोच परमजीत सिंह से उच्च स्तर का प्रशिक्षण प्राप्त किया। उन्होंने विभिन्न प्रतियोगिताओं जैसे नेहरू कप, सब जूनियर नेशनल, जूनियर नेशनल, ऑल इंडिया यूनिवर्सिटी और सीनियर नेशनल में भाग लिया। लगातार मेहनत और उत्कृष्ट प्रदर्शन के बाद उन्हें राष्ट्रीय पहचान मिली। 2015 में मध्यप्रदेश सरकार द्वारा एकलव्य पुरस्कार से सम्मानित होना उनके करियर का अहम मोड़ साबित हुआ।
खेल से मिला जीवन का लक्ष्य
नेहा के पिता पहले दुकान चलाते थे, लेकिन अब वे नौकरी कर रहे हैं। नेहा ने खेलों की दुनिया में कदम 2010-11 में रखा। स्कूल में पुरस्कार प्राप्त करने वाले खिलाड़ियों को देखकर उन्हें खेल में रुचि जागी और उन्होंने दर्पण खेल मैदान पर हॉकी का बुनियादी प्रशिक्षण लिया। कोच अविनाश भटनागर से प्रशिक्षण लेकर उन्होंने मिडफील्डर के तौर पर अपनी भूमिका तय की और इस खेल में आगे बढ़ने का संकल्प लिया।
खिलाड़ी से कोच बनने की ओर
खेल से दूर रहते हुए नेहा ने स्पोर्ट्स कोचिंग में डिप्लोमा किया और 2023 में उड़ीसा की नवल टाटा हॉकी अकादमी में असिस्टेंट कोच के तौर पर अपना योगदान शुरू किया। यहां वे अंडर-21 आयु वर्ग के 40 प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को प्रशिक्षण देती हैं। उनका अगला लक्ष्य भारतीय राष्ट्रीय महिला हॉकी टीम की कोच बनना है। इसके लिए वे कोचिंग के विभिन्न कोर्स कर रही हैं और लेवल-1 कोर्स पूरा कर चुकी हैं। अब वे फेडरेशन की आवश्यक परीक्षाओं की तैयारी में जुटी हैं।
बेटियों के लिए एक प्रेरणा
नेहा को वर्ष 2018 में मध्यप्रदेश सरकार द्वारा 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' अभियान की ब्रांड एंबेसडर नियुक्त किया गया था। तब से लेकर आज तक, वह खेल और शिक्षा के माध्यम से बेटियों को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित कर रही हैं।
सन्दर्भ स्रोत एवं छाया : अविनाश भटनागर



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