एक गूजर बाला, जो मशहूर हुई मृगनयनी के नाम से

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एक गूजर बाला, जो मशहूर हुई मृगनयनी के नाम से

छाया :  वृन्दावन लाल वर्मा के उपन्यास मृगनयनी का आवरण  पृष्ठ  साभार सहित

• डॉ. शम्भुदयाल गुरु

•  रूप और शौर्य की प्रतिमा थी गूजर बाला मृगनयनी

•  लड़ते हुए दो भैंसों को चुटकियों में कर दिया था अलग

•  उसकी वजह से राजा मानसिंह ने मोड़ दी थी सांक नदी की धारा

•  शादी के बाद नाम पड़ा मृगनयनी, मगर महल प्रसिद्ध हुआ गुजरी नाम से

मृगनयनी और ग्वालियर के सुप्रसिद्ध राजा मानसिंह तोमर की प्रणय गाथा इतिहास का अविस्मरणीय हिस्सा है। इतिहास के साथ ही जनश्रुतियों को मिलाकर ऐतिहासिक उपन्यासों के बेजोड़ रचयिता श्री वृंदावन लाल वर्मा ने मृगनयनी नामक उपन्यास में साहस, रूप तथा कला की त्रिवेणी इस नायिका मृगनयनी में इतने रंग भरे हैं कि पाठक आत्मविभोर हो जाता है।

सन् 1424 से 1518 तक ग्वालियर पर तोमर वंश के राजाओं का शासन था। इस वंश परंपरा में सबसे महान राजा मानसिंह था। वह न केवल वीर और उदार शासक था वरन एक भवन निर्माता, संगीत तथा साहित्य का अनन्य रसिक तथा संगीत ग्रंथों का रचयिता था। सन् 1486 से 1516 तक का उसका शासन काल सांस्कृतिक वैभव, उन्नति तथा राजनीतिक ख्याति का काल था। वह संगीत का महान पारखी था और संगीत में इसी विशिष्ट लगन के कारण ही संगीत की ग्वालियर शैली, ध्रुपद का प्रणेता मानसिंह ही था। संगीतकारों को उसका उदार आश्रय प्राप्त था। ग्वालियर की इसी संगीत शैली ने अकबर के ‘आइन-ए-अकबरी’ में उल्लिखित 36 में से 16 संगीतकार दिए। इनमें तानसेन सबसे अधिक विख्यात था। बैजू बावरा तथा संगीतज्ञ बक्शू भी मानसिंह के दरबार की शोभा बढ़ा रहे थे।

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इतिहास की अज्ञात तथा अल्पज्ञात पहेलियों को कभी-कभी जनश्रुतियां परम्पराएं तथा लोक कथाएं आलोकित करती हैं। जनश्रुतियां भी किसी सत्य की कोख में पलकर निकलती हैं। वर्मा जी उपन्यास लिखने के पहले – जैसा कि उनका अभ्यास था, विषय का इतिहास पढ़ने के साथ ही उन स्थानों को देखने जाते तथा उनके निवासियों से चर्चा करते थे, ताकि जनश्रुतियों और परंपराओं से अवगत हो सकें। तथापि उपन्यास और इतिहास में एक स्पष्ट सा फर्क देखा जाता है। उपन्यास में कल्पना की अपार संभावना होती है जबकि इतिहास में प्रमाणित सत्य ही मान्य होते हैं। वर्मा जी के उपन्यास में यथार्थ, कल्पना और जनश्रुति तीनों को संतुलित मिकदार समावेशित किया गया है। मृगनयनी के जीवन वृत्त का पुष्ट प्रमाणयुक्त दस्तावेज कहीं उपलब्ध नहीं है, तथापि 1907 में प्रकाशित ग्वालियर स्टेट गजेटियर का उल्लेख किया जा सकता है, जिसके अनुसार मृगनयनी गूजर जाति की राई गांव के गरीब किसान की पुत्री थी। राई गांव ग्वालियर के दक्षिण पश्चिम में कोई छ: कोस दूरी पर सांक नदी के किनारे है। मृगनयनी गांव में निन्नी नाम से जानी जाती थी। वह गाने-नाचने में भी प्रवीण थी। उसका निशाना अचूक था। कहते हैं वह जमीन से ही शेर, जंगली सुअर, जंगली भैंसे आदि का शिकार कर लेती थी। अपनी कमान से ऐसे तीर छोड़ती कि जंगली जानवर ढेर हो जाते। आगे की कथा के लिए पुरातात्विक और ऐतिहासिक प्रमाण के साथ वर्मा जी के उपन्यास से कल्पनात्मक अंश को छानकर जो गाथा निर्मित होती है वह इस प्रकार है –  

राई गाँव में निन्नी अपने भाई अटल के साथ रहती थी। दोनों भाई बहन कुशल शिकारी थे। निन्नी तो आवाज़ सुनकर निशाने लगा सकती थी। उसकी एक सहेली थी लाखी। उसकी माँ मर गई थी इसलिए वह निन्नी और अटल के साथ ही रहने लगी। निन्नी और लाखी की ख़ूबसूरती और बहादुरी के चर्चे दूर-दूर तक फैलने लगे। इसके साथ ही उनके अनुपम सौन्दर्य की कीर्ति भी हवा में तैरती रही। लोक कहते कि उनकी सुंदरता के विषय में या तो कवि कुछ कह सकता है या कुशल चित्रकार। दिल्ली के तख़्त पर बैठे गयासुद्दीन खिलजी और मांडू के बादशाह बर्घरा निन्नी और लाखी को हासिल करने की योजनाएं बनाने लगे। उन्होंने एक नट-नटी को इस कार्य के लिए नियुक्त किया, वे दोनों निन्नी और लाखी के सामने गयासुद्दीन का यशोगान करने लगे लेकिन दोनों ने इस पर ध्यान नहीं दिया। अंत में खीजकर उसने दोनों का अपहरण करने के लिए दो सैनिकों को भेजा जिसे निन्नी और लाखी ने पल भर में ही धूल चटा दी। इस घटना की जानकारी ग्रामीणों को लगी और फिर जंगल में आग की तरह फ़ैल गई।

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उसी समय राई गाँव के पुजारी ने राजा मानसिंह के सामने निन्नी के रूप और शौर्य का वर्णन कर दिया। प्रकृति के इस अनुपम कृति को देखने और उससे मिलने के लिए राजा मानसिंह व्याकुल हो गये। शिकार करने के बहाने वे राई गांव पहुंच गये। उन्होंने जो सुन रखा था उससे भी अधिक प्रत्यक्ष देखा। मृगनयनी के एक-एक तीर से जंगली जानवर धराशायी हो रहे थे। इतना ही नहीं उसने एक घायल भैंसे को जो उसकी और दौड़ रहा था सींग पकडक़र पछाड़ दिया। राजा यह देखकर चकित थे। दूसरी कथा भी प्रचलित है। यह कि दो भैंसे लड़ रहे थे। भीड़ जमा थी पर उन भैंसों को कोई अलग नहीं कर पा रहा था। मार्ग रुका हुआ था। यह देखकर एक अत्यंत सुंदरी और बलिष्ठ गूजरी लडक़ी ने आगे बढ़कर अपने हाथों से भैसों के सींग पकड़े और उन्हें अलग कर दिया।  भैंसे भाग खड़े हुए। राजा एक ओर खड़े यह सब देख रहे थे। गूजरी की असीम शक्ति, साहस और उसके सौन्दर्य ने राजा को मुग्ध कर दिया।

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राजा ने तत्काल प्रणय निवेदन किया और जीवन संगिनी बनने का प्रस्ताव किया। लेकिन उस गूजरी कन्या ने विवाह के लिए तीन शर्ते रख दीं। उसे गांव बहुत प्यारा था और सांक नदी की जलधारा उसके लिए अमृत थी। पहली शर्त यह थी कि सांक का पानी नहर के जरिये ग्वालियर के किले तक पहुंचाया जाए। राजा मानसिंह सहर्ष तैयार हो गये। आज भी उस पाइप लाइन को देखा जा सकता है। दूसरी शर्त थी –राजा उसके लिए अलग से महल बनवाएँ। ग्वालियर का गूजरी महल आज भी वास्तु-शिल्प का बेजोड़ नमूना माना जाता है। यह दो मंजिला है, 332 फीट लम्बा और 196 फीट चौड़ा। भव्यता की दृष्टि से मान मंदिर के बाद इसका दूसरा स्थान है। कुछ जानकारों का यह भी मानना है कि चूंकि निन्नी नीची जाति की कन्या थी, इसलिए राजा मानसिंह ने उसके लिए नगर से बाहर महल का निर्माण करवाया था। तीसरी शर्त थी कि युद्ध में वह हमेशा राजा के साथ रहेगी। राजा मानसिंह ने निन्नी से विवाह कर लिया और उसके मृग समान नेत्रों के कारण उसे नाम दिया ‘मृगनयनी’। इतिहास और साहित्य में निन्नी को इसी नाम से स्थान दिया गया। यद्यपि तीसरे शर्त को भी राजा मानसिंह तोमर स्वीकार कर चुके थे लेकिन इतिहास के पन्नों पर कहीं भी युद्ध भूमि में उनके साथ मृगनयनी के होने के दृष्टांत नहीं मिलते।

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यह भी सत्य है कि विवाह के बाद राजा-रानी हंसी ख़ुशी रहने लगे जैसा इस कथा का अंत नहीं हुआ। ग्वालियर रियासत का रनिवास मृगनयनी के विरुद्ध षडयंत्रों का केंद्र बन गया जिसकी सूत्रधार थी बड़ी महारानी सुमन मोहिनी। विचारणीय बिंदु यह है कि बड़ी महारानी के पश्चात सात और रानियाँ ब्याह कर अन्तःपुर लाई गईं परन्तु उनके साथ सौतिया डाह जैसी समस्या नहीं आई। कयास लगाया जा सकता है कि नीची जाति की कन्या का पटरानी बनने और उसके प्रति राजा की आसक्ति देखते हुए उसकी संतान को गद्दी मिल जाने की आशंका ने अन्तःपुर को भयभीत कर दिया होगा। इन सबके बीच भी मृगनयनी राजा मानसिंह को कर्तव्य पथ की ओर बढ़ने की उत्प्रेरणा देती रही। वर्मा जी के उपन्यास में वर्णन है कि मृगनयनी कभी भी अन्य रानियों की तरह घूँघट में नहीं रही और उनके कहीं आने जाने में कभी कोई प्रतिबंध रहा। यह गल्प से कहीं अधिक सत्य के निकट प्रतीत होता है। कहते हैं उसी दौरान कला और संगीत के प्रति उनका रूझान बढ़ा और उन्होंने कई कई कलात्मक निर्माण कार्य करवाए। नरवर के किले पर उसी समय सिकंदर लोधी का आक्रमण हुआ था। अंचल में प्रचलित लोकगीतों के अनुसार मृगनयनी ने उन्हें अपना कर्तव्य बोध करते हुए रणभूमि भेजा था। वे स्वयं भी उनके साथ गईं थीं अथवा नहीं, इसके उल्लेख नहीं मिलते।

इधर मृगनयनी का भाई अटल और उसकी सहेली लाखी एक दूसरे से प्रेम करते थे परन्तु उनके विवाह में कई अड़चनें थीं। अटल गूजर था जबकि लाखी अहीर थी। मांडू का बादशाह बर्बरा पहले से ही लाखी को हासिल करने के लिए घात लगाए बैठा था। उसने उसे फुसलाने की जिम्मेदारी नट-नटनी को पहले ही दे रखी थी। विवाह न होने कारण अटल और लाखी नट-नटनी के कहने पर नरवर के किले की तरफ आ गए। लाखी को इस षड़यंत्र के बारे में पता चला गया, उसने दोनों षड़यंत्रकारियों का सफाया कर दिया और राजा मानसिंह तोमर ने उन्हें ग्वालियर बुलवा लिया, जहाँ दोनों का विवाह हुआ।

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राजा मानसिंह तोमर और मृगनयनी के बच्चों के बारे में दो जनश्रुतियां प्रचलित हैं। पहली जनश्रुति के अनुसार उनके दो पुत्र हुए जिन्होंने मृत्यु के भय से आत्महत्या कर ली। यह दुर्भावना से प्रेरित कथा लगती हैं क्योंकि जिसकी माँ इतनी निर्भीक और बहादुर हो, उसकी संतानों से कम से कम इस किस्म की कायरता की उम्मीद नहीं की जा सकती। दूसरी कथा के अनुसार मृगनयनी ने अपने पुत्रों को राज्य का उत्तराधिकारी बनाने पर जोर न देकर सुमन मोहिनी के पुत्र विक्रमादित्य को राज्य दिलवाया और राजा मान सिंह के जीवन काल में ही अपने पुत्रों को लेकर तिघरा के जंगलों में चली गईं। यद्यपि मृगनयनी का मूल गाँव अब वहां बने बांध के डूब क्षेत्र में आ चुका है तथापि अंचल में प्रचलित एक अन्य लोक गाथा के अनुसार मृगनयनी अपने पुत्रों के साथ पैतृक गाँव लौट आईं थीं। उनके दोनों बेटों – राजे और बाले को तोमर वंश का नाम नहीं मिला क्योंकि उनकी माता क्षत्राणी नहीं थीं। उनके माध्यम से एक नए तोंगर वंश की शुरुआत हुई। तोंगर वंशियों ने हमेशा तोमरों की मदद की। आज भी उस क्षेत्र में कुछ तोंगर वंशी मिल जाते हैं। मृगनयनी के अंतिम क्षणों से सम्बंधित कोई भी जानकारी उपलब्ध नहीं है जबकि इतिहास में राजा मानसिंह तोमर के निधन का दिनांक 1516 दर्ज है।

सन्दर्भ स्रोत: श्री वृन्दावल लाल वर्मा द्वारा रचित मृगनयनी, ई-पत्रिका हिमांतर पर मंजू काला का प्रकाशित लेख – मृगया की शौक़ीन गुजरी रानी ‘मृगनयनी’, डॉ. शिवदत्त शर्मा (पूर्व अध्यक्ष, हिंदी विभाग, राजकीय महाविद्यालय, ढलियारा, कांगड़ा, हि.प्र.) द्वारा ऑल रिसर्च डॉट कॉम पर प्रकाशित शोधपत्र – ‘मृगनयनी उपन्यास में इतिहास और कल्पना’

लेखक जाने माने इतिहासकार हैं।

© मीडियाटिक

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