गुजरात हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि किसी कामकाजी मां द्वारा अपनी नाबालिग बेटी को देखभाल के लिए अपने माता-पिता के पास छोड़ना अवैध कस्टडी या गैरकानूनी हिरासत नहीं माना जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक बच्चे की कस्टडी को लेकर कोई न्यायिक आदेश या मामला लंबित नहीं है, तब तक हैबियस कॉर्पस याचिका के माध्यम से ऐसे पारिवारिक प्रबंध को चुनौती नहीं दी जा सकती।
खंडपीठ पिता द्वारा दायर हैबियस कॉर्पस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि चार साल की बच्ची को मां और ननिहाल पक्ष ने अवैध रूप से अपने पास रखा है। कोर्ट ने यह दलील खारिज करते हुए कहा कि इतनी कम उम्र की बच्ची का अपनी मां के साथ रहना किसी भी स्थिति में अवैध नहीं कहा जा सकता।
अदालत ने यह भी कहा कि चार साल की बच्ची की भावनात्मक और दैनिक जरूरतों को देखते हुए उसकी प्राथमिक देखभाल की जिम्मेदारी स्वाभाविक रूप से मां पर होती है। आज के समय में जब दोनों माता-पिता कामकाजी हों, तो पारिवारिक सहयोग लेना व्यावहारिक आवश्यकता है। यदि मां अपने माता-पिता की मदद से बच्चे की बेहतर परवरिश सुनिश्चित करती है, तो केवल पिता की असहमति के आधार पर इसे अवैध हिरासत नहीं ठहराया जा सकता।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि वैवाहिक विवादों या बच्चे के कल्याण से जुड़े प्रश्नों का निपटारा हैबियस कॉर्पस याचिका के जरिए नहीं किया जा सकता। यदि किसी पक्ष को अंतरिम या स्थायी कस्टडी चाहिए, तो उसे फैमिली कोर्ट में उचित कानूनी प्रक्रिया अपनानी होगी। इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने पिता की याचिका खारिज कर दी।



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