झारखंड हाईकोर्ट ने पति-पत्नी के तलाक से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि किसी धार्मिक संस्था, गुरु या सत्संग का अनुयायी होना अपने आप में तलाक का आधार नहीं हो सकता। अदालत ने कहा कि जब तक यह साबित न हो कि इससे वैवाहिक जीवन पर गंभीर और प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है, तब तक इसे मानसिक क्रूरता का आधार नहीं माना जा सकता। यह मामला एक पति-पत्नी से संबंधित था।
पति ने फैमिली कोर्ट द्वारा तलाक याचिका खारिज किए जाने के आदेश को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट में अपील दायर की थी। पति ने अदालत में आरोप लगाया था कि शादी के बाद पत्नी केवल दो दिन ससुराल में रही, वैवाहिक संबंध स्थापित नहीं किए और अपने धार्मिक गुरु व सत्संग में अधिक रुचि दिखाती रही, जिससे उसे मानसिक प्रताड़ना हुई। उसने इसे मानसिक क्रूरता बताते हुए तलाक की मांग की थी। वहीं, पत्नी ने सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया। उसने अदालत को बताया कि विवाह के शुरुआती दिनों में वैवाहिक संबंध स्थापित हुए थे और वह किसी सत्संग की अनुयायी नहीं है।
पत्नी ने यह भी कहा कि वह हमेशा पति के साथ रहने को तैयार थी, लेकिन पति और उसके परिवार ने ही उसे साथ रखने से इनकार किया। मामले की सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने पाया कि पति द्वारा लगाए गए आरोप किसी ठोस साक्ष्य से प्रमाणित नहीं हो सके। अदालत ने कहा कि पत्नी ने वैवाहिक जीवन को बचाने का प्रयास किया, जबकि पति पक्ष ने ही संबंध तोड़ने की पहल की। अदालत ने स्पष्ट टिप्पणी करते हुए कहा कि केवल धार्मिक आस्था या सत्संग से जुड़ाव तलाक का आधार नहीं हो सकता।



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