झारखंड हाईकोर्ट ने पारिवारिक विवाद से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में पत्नी की अपील स्वीकार करते हुए फैमिली कोर्ट द्वारा दिए गए तलाक के आदेश को रद्द कर दिया है। हाईकोर्ट ने सरायकेला-खरसावां फैमिली कोर्ट के फैसले को गलत ठहराते हुए कहा कि छोटे-मोटे मतभेद तलाक का आधार नहीं हो सकते। जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस एके राय की खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा कि विवाह स्वीकार्यता, समायोजन और सहनशीलता पर आधारित संस्था है। फैमिली कोर्ट ने पत्नी के बयानों और सुलह की इच्छा को नजरअंदाज कर गंभीर त्रुटि की थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि मानसिक क्रूरता साबित करने के लिए लगातार और गंभीर प्रकृति के व्यवहार का ठोस प्रमाण होना आवश्यक है।
सामान्य वैवाहिक झगड़े, मामूली मतभेद या पारिवारिक खटपट को क्रूरता नहीं माना जा सकता। ऐसे कारणों के आधार पर तलाक देना कानून की भावना के विपरीत है। हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि पत्नी द्वारा पति पर लगाए गए उत्पीड़न और क्रूरता के आरोप क्रॉस-एग्जामिनेशन के दौरान भी कायम रहे। इसके बावजूद फैमिली कोर्ट ने इन तथ्यों को नजरअंदाज कर दिया था, जो न्यायिक दृष्टि से उचित नहीं था। फैमिली कोर्ट के आदेश को बताया 'विकृत' खंडपीठ ने फैमिली कोर्ट के फैसले को 'पर्वर्टेड' यानी विकृत करार देते हुए कहा कि आदेश तथ्यों और साक्ष्यों के सही मूल्यांकन के बिना पारित किया गया था। इसी आधार पर तलाक के आदेश को निरस्त कर विवाह को बहाल माना गया है। क्या था पूरा मामला मामला सरायकेला-खरसावां जिले का है। दोनों का विवाह 28 अप्रैल 2019 को हिंदू रीति-रिवाज के अनुसार हुआ था। विवाह के कुछ समय बाद पति ने पत्नी पर मानसिक क्रूरता का आरोप लगाते हुए तलाक की याचिका दायर की थी। फैमिली कोर्ट ने 30 मार्च 2024 को पति के पक्ष में फैसला सुनाते हुए तलाक मंजूर कर लिया था।



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