एक जोड़ा कई सालों तक साथ रह सकता है, किराया, खर्चे, प्यार और यहां तक कि बच्चों की जिम्मेदारी भी साझा कर सकता है, लेकिन जब रिश्ता टूटता है, तो भारतीय कानून एक साधारण सवाल का जवाब देने में संघर्ष करता है: कानून की नज़र में यह रिश्ता आखिर था क्या? बिना रस्मों वाली शादी, दो बालिग लोगों के बीच निजी समझौता, या सिर्फ एक भावनात्मक रिश्ता, जिसका कोई कानूनी असर नहीं है?
यह अनिश्चितता अब सिर्फ एक सैद्धांतिक बात नहीं रह गई है। अब ऐसे मामले अदालतों तक पहुंच रहे हैं, जिनमें गुजारा भत्ता (मेंटेनेंस), घरेलू हिंसा, दुष्कर्म के आरोप, विरासत के विवाद और संपत्ति व अलगाव को लेकर कड़वी लड़ाइयां शामिल हैं।
फैमिली कोर्ट और मजिस्ट्रेट अब ऐसे रिश्तों से जुड़े विवादों की सुनवाई कर रहे हैं, जो औपचारिक शादी के बाहर हैं, लेकिन व्यवहार में कई मायनों में शादी जैसे ही दिखते हैं।
भारतीय समाज में बदलाव उतनी तेजी से आया है, जितनी तेज़ी की कानूनी व्यवस्था ने कल्पना नहीं की थी।
पहले सोच सीधी थी: अंतरंग संबंध सिर्फ शादी के भीतर होने चाहिए, लेकिन खासकर शहरी भारत में यह सोच तेज़ी से बदल रही है। आज रिश्ते लोगों की आवाजाही, आर्थिक स्वतंत्रता, भावनात्मक असंतोष, देर से होने वाली शादियों और साथ निभाने को लेकर बदलती उम्मीदों से तय हो रहे हैं। वहीं, कानून अभी भी इन बदलावों के साथ कदम मिलाने की कोशिश कर रहा है।
कानूनी रूप से देखें तो एक बात अब काफी हद तक तय हो चुकी है। बालिग लोगों को शादी के बिना साथ रहने का संवैधानिक अधिकार है। इसे लता सिंह बनाम स्टेट ऑफ उत्तर प्रदेश (2006) मामले में मान्यता दी गई थी, जहां सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि एक बालिग महिला अपनी पसंद के किसी भी व्यक्ति के साथ रहने के लिए स्वतंत्र है।
कुछ साल बाद, एस. खुशबू बनाम कन्नियाम्मल (2010) मामले में भी अदालत ने यह मानने से इनकार कर दिया कि केवल सामाजिक नैतिकता को ठेस पहुंचने की वजह से सहमति से बने लिव-इन रिश्तों को अपराध माना जाए।
इससे एक संवैधानिक सवाल तो सुलझ गया, लेकिन कई नए सवाल खड़े हो गए।
शादी जैसे रिश्ते की प्रकृति
• अगर दो बालिग लोग कानूनी रूप से शादी के बिना साथ रह सकते हैं, तो जब उनका रिश्ता टूट जाता है तब क्या होता है? क्या एक साथी गुजारा भत्ता मांग सकता है? क्या लंबे समय तक साथ रहने से विरासत में हिस्सा मिलने का अधिकार बन सकता है? क्या असफल रिश्ता बाद में शादी के झूठे वादे के आधार पर दुष्कर्म के मामले में बदल सकता है?
• इन सवालों का कोई एक कानूनी जवाब नहीं है, क्योंकि भारत में अभी भी लिव-इन रिश्तों को लेकर कोई अलग कानून नहीं है। इसलिए अदालतें हर मामले के आधार पर नियम तय कर रही हैं।
• जहां दोनों साथी अविवाहित होते हैं, वहां अदालतें कानूनी सुरक्षा देने के लिए सबसे ज्यादा तैयार दिखाई देती हैं।
• डी. वेलुसामी बनाम डी. पचैअम्मल (2010) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह तय करने की कोशिश की कि कब किसी लिव-इन रिश्ते को 'शादी जैसी प्रकृति वाला रिश्ता' माना जा सकता है। साथ रहना, लंबे समय तक एक साथ जीवन बिताना, कानूनी उम्र पूरी होना और समाज में पति-पत्नी की तरह पेश आना, इन्हें महत्वपूर्ण संकेत माना गया।
• इसके कुछ समय बाद, चनमुनिया बनाम वीरेंद्र कुमार सिंह कुशवाहा (2011) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सिर्फ शादी का सख्त कानूनी सबूत न होना, उन महिलाओं को गुज़ारा भत्ता देने से इनकार करने का आधार नहीं बनना चाहिए, जिन्होंने कई साल शादी जैसे रिश्ते में बिताए हैं।
• असल ज़िंदगी में यह अंतर बहुत मायने रखता है। कोई महिला नौकरी छोड़ दे, आर्थिक रूप से अपने साथी पर निर्भर हो जाए और कई साल किसी रिश्ते में बिताए, तो उसे अचानक पता चल सकता है कि कानून उसके साथ अलग व्यवहार करेगा। यह इस बात पर निर्भर करेगा कि उस रिश्ते को शादी जैसा माना जाता है या सिर्फ एक अनौपचारिक साथ।
• इसी वजह से, कुछ लिव-इन रिश्तों में रहने वाली महिलाएं घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 के तहत राहत मांग सकती हैं और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) के तहत गुजारा भत्ता भी मांग सकती हैं।
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भावनात्मक धोखे से जुड़े मामलों को समझना
• जब दोनों में से कोई एक पहले से शादीशुदा होता है, तो कानूनी स्थिति काफी बदल जाती है।
• अगर कोई शादीशुदा महिला किसी अविवाहित पुरुष के साथ लिव-इन रिश्ते में रहती है, तो अदालतें आमतौर पर उसे शादी जैसे रिश्ते वाली कानूनी सुरक्षा देने से इनकार करती हैं।
• अक्सर गुज़ारा भत्ते की मांग खारिज हो जाती है। यहां तक कि शादी के झूठे वादे के आधार पर लगाए गए रेप के आरोप भी कानूनी रूप से मुश्किल हो जाते हैं।
• इसके उलट, शादीशुदा पुरुष और अविवाहित महिला के रिश्तों से सबसे ज्यादा विवाद पैदा हुए हैं।
• इंद्र सरमा बनाम वी.के.वी. सरमा (2013) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने उस अविवाहित महिला को सुरक्षा देने से इनकार कर दिया था, जिसने यह जानते हुए भी एक शादीशुदा पुरुष के साथ रिश्ता बनाया था।
• कई महिलाएं कहती हैं कि उन्होंने यह सोचकर रिश्ता बनाया कि पुरुष बाद में तलाक लेकर उनसे शादी करेगा। वहीं पुरुष अक्सर कहते हैं कि सहमति से बने रिश्तों को रिश्ता टूटने के बाद आपराधिक मामलों में बदल दिया जाता है।
• अब अदालतों को बार-बार यह तय करना पड़ रहा है कि मामला वास्तव में धोखे का था या सिर्फ भावनात्मक उम्मीदें पूरी नहीं हुईं।
• पिछले कुछ वर्षों में अदालतें असफल रिश्तों को अपने आप रेप के मामलों में बदलने से बचती दिखाई दी हैं। न्यायिक सोच धीरे-धीरे तथ्यों पर आधारित हो गई है।
व्यभिचार और बदलती न्यायिक सोच
• एक और बड़ा बदलाव जोसेफ शाइन बनाम भारत संघ (2018) मामले में आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने व्यभिचार (Adultery) को अपराध की श्रेणी से हटा दिया।
• अब राज्य केवल इसलिए सहमति से बने विवाहेतर रिश्तों पर आपराधिक कार्रवाई नहीं कर सकता क्योंकि वे शादी के बाहर हैं।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि इसके परिणाम खत्म हो गए।
• व्यभिचार अब जेल का कारण नहीं बन सकता, लेकिन यह आज भी तलाक, गुज़ारा भत्ता, बच्चों की कस्टडी और मानसिक क्रूरता के आरोपों का कारण बनता है।
विरासत और गुज़ारा भत्ता
इन सभी कानूनी मामलों के पीछे एक बड़ा सामाजिक बदलाव छिपा है, जिसे भारतीय अदालतें नज़रअंदाज़ नहीं कर सकतीं।
अब साथ निभाने को एक स्थायी सामाजिक जिम्मेदारी के बजाय, लगातार बनी रहने वाली भावनात्मक सहमति के रूप में देखा जाने लगा है।
जब लिव-इन रिश्ते अलग-अलग धर्मों के लोगों के बीच होते हैं, तो स्थिति और भी जटिल हो जाती है।
संवैधानिक रूप से अदालतें कई बार यह कह चुकी हैं कि अंतरधार्मिक बालिग लोगों को साथ रहने का अधिकार है। लेकिन ऐसे रिश्तों को अक्सर परिवारों के विरोध, पुलिस शिकायतों और कई राज्यों में धर्म परिवर्तन कानूनों से जुड़े आरोपों का सामना करना पड़ता है।
अब विवाद सिर्फ रिश्तों का नहीं रह गया है। यह अक्सर व्यक्तिगत स्वतंत्रता, धर्म और सामाजिक नियंत्रण का सवाल बन जाता है।
जब बच्चों की बात आती है, तो मामला और भी संवेदनशील हो जाता है।
एस.पी.एस. बालासुब्रमण्यम बनाम सुरुत्तयन (1992) और धन्नूलाल बनाम गणेशराम (2015) मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने लंबे समय तक चले लिव-इन रिश्तों से जन्मे बच्चों की वैधता और विरासत के अधिकारों को मान्यता दी थी।
अदालतों ने लगातार यह माना है कि बच्चों को उनके माता-पिता द्वारा चुने गए रिश्तों की वजह से सजा नहीं दी जा सकती।
एक और अनसुलझा मुद्दा भी धीरे-धीरे सामने आ रहा है - पैसा।
भारत में गुज़ारा भत्ते का कानून इस सोच के साथ विकसित हुआ था कि महिलाएं आर्थिक रूप से कमजोर होती हैं। लेकिन शहरों में रिश्ते तेजी से बदल रहे हैं। आज कई आधुनिक लिव-इन रिश्तों में महिलाएं अपने पुरुष साथियों से ज्यादा आर्थिक रूप से मजबूत हो सकती हैं।
भविष्य में अदालतों को एक ऐसे सवाल का सामना करना पड़ सकता है: क्या लंबे समय तक चले किसी लिव-इन रिश्ते में आर्थिक रूप से निर्भर पुरुष साथी भी कानूनी सुरक्षा मांग सकता है?
आज रिश्तों से जुड़े कानूनी मामले तेजी से डिजिटल होते जा रहे हैं।
चैट, तस्वीरें, होटल रिकॉर्ड, स्क्रीनशॉट, पैसों के लेन-देन का रिकॉर्ड और सोशल मीडिया पर हुई बातचीत अब नियमित रूप से अदालतों के रिकॉर्ड का हिस्सा बनते हैं। लेकिन हर कानूनी सिद्धांत के पीछे कुछ बेहद मानवीय चीजें छिपी होती हैं, भावनात्मक निर्भरता, विश्वासघात, अपमान, अकेलापन और आर्थिक असुरक्षा
और शायद अदालतों के लिए यही सबसे बड़ी मुश्किल है।
कानून शादी को तो आसानी से नियंत्रित कर सकता है, लेकिन भावनात्मक सच्चाइयों को नियंत्रित करना कहीं ज्यादा कठिन है।
लिव-इन रिश्तों को अब कानूनी मान्यता मिल चुकी है। अब असली सवाल यह है कि क्या भारतीय कानून शादी के बाहर मौजूद रिश्तों के लिए अधिकारों और जिम्मेदारियों का संतुलित ढांचा बना सकता है, बिना हर भावनात्मक टूटन को आपराधिक मुकदमे या अंतहीन आर्थिक लड़ाई में बदले।
सन्दर्भ स्रोत/छाया : द प्रिंट डॉट इन



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