स्त्री अस्मिता की यात्रा

blog-img

स्त्री अस्मिता की यात्रा

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के सुअवसर पर सभी को बधाई! आज की बातचीत केवल महिलाओं की। उनकी अस्मिता, उनके संघर्ष और उनकी संभावनाओं की।  उन महिलाओं की, जो सदियों से समाज की संरचनाओं के भीतर कहीं न कहीं वंचना, उपेक्षा और पीड़ा का अनुभव करती रही हैं। इतिहास के अनेक पन्ने ऐसे हैं, जहाँ स्त्रियों की उपस्थिति तो मिलती है, परंतु उनकी आवाज़ अक्सर दबा दी गई। कभी शिक्षा के अधिकार से वंचित रखी गईं, कभी निर्णय लेने की प्रक्रिया से दूर कर दी गईं, तो कभी सामाजिक मान्यताओं और परंपराओं के कठोर दायरों में बाँध दी गईं। स्त्रियों का यह सफर आसान नहीं रहा। उनके हिस्से में हमेशा से ही जिम्मेदारियाँ अधिक आईं, पर अधिकार सीमित रहे। फिर भी विडंबना यह है कि उसी स्त्री ने परिवार, समाज और सभ्यता की निरंतरता को अपने धैर्य, श्रम और संवेदना से सँजोए रखा।

मैं स्वयं को कभी भी कट्टर अर्थों में नारीवादी नहीं मानती। स्त्री हो या पुरुष, मेरी दृष्टि सदैव समभाव की रही है। मेरा बचपन भी बिना किसी अनावश्यक हस्तक्षेप या भेदभाव के, स्वच्छंद किंतु मर्यादित वातावरण में बीता। ईश्वर की कृपा और माता-पिता के स्नेहिल आशीर्वाद ने मुझे ऐसा आत्मविश्वास दिया कि लड़की होने की पीड़ा या किसी प्रकार की हीनता का अनुभव मुझे कभी नहीं हुआ परंतु गुजरते   वक्त के साथ होने वाले अनुभवों की परतें जब धीरे-धीरे खुलने लगती हैं, तब जीवन कुछ नए प्रश्न भी सामने रख देता है। जैसे-जैसे उम्र के विभिन्न पड़ावों से गुजर रही हूँ, भीतर कहीं यह एहसास उभरने लगा है कि एक स्त्री होने के अपने अलग अर्थ भी हैं; कुछ ऐसे अर्थ, जो बचपन की सहजता में दिखाई नहीं देते या कहें समझ नहीं आते।

अब कभी-कभी लगता है कि केवल शारीरिक बनावट या कथित दुर्बलता ही स्त्री के मार्ग की बाधा नहीं है। इसके परे भी कुछ सूक्ष्म, अदृश्य और गहरे सामाजिक-मानसिक ढाँचे हैं, जो अनजाने में स्त्रियों की राह को थोड़ा अधिक जटिल बना देते हैं। शायद यही वह बिंदु है जहाँ से स्त्री-अस्तित्व को, उसकी अस्मिता को समझने की एक नई यात्रा आरंभ होती है। एक ऐसी यात्रा, जो प्रश्नों से भी भरी है और आत्मबोध से भी।

हमारे आस-पास, चाहे वे कार्यस्थल हों या अन्य कोई सार्वजनिक स्थल, ऐसे अनेक प्रसंग गाहे-बेगाहे सामने आ ही जाते हैं, जो अनायास सोचने पर विवश कर देते हैं कि क्या सचमुच महिलाओं को अब भी दोयम दर्जे का प्राणी माना जाता है? मानो उनकी स्थिति यह हो कि या तो उन्हें पुरुषों से नीचे समझा जाए, या बहुत हुआ तो बराबरी तक आने की अनुमति दे दी जाए। उनसे आगे निकलने की संभावना तो जैसे कल्पना के दायरे से भी बाहर रखी गई हो। क्या वास्तव में ऐसा ही है?

इन प्रश्नों के उत्तर शायद इतने सरल नहीं हैं। समाज की संरचना सदियों से अनेक परतों में बनी है, जहाँ परंपराएँ, मान्यताएँ और भूमिकाएँ धीरे-धीरे आकार लेती रही हैं। कई बार यह भेदभाव किसी कठोर नियम की तरह नहीं, बल्कि व्यवहार की सूक्ष्म आदतों में दिखाई देता है यथा निर्णय लेने के अधिकार में, अवसरों तक पहुँच में, या फिर अपेक्षाओं के उस अदृश्य पैमाने में, जिससे स्त्रियों को परखा जाता है। फिर भी यह कहना भी पूरी तरह सही नहीं होगा कि स्थिति बिल्कुल स्थिर है। समय के साथ परिस्थितियाँ बदलीं, संघर्ष हुए और धीरे-धीरे स्त्रियों ने अपने लिए शिक्षा, सम्मान और समान अवसरों का रास्ता तैयार किया। आज वे जीवन के लगभग हर क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही हैं- ज्ञान, विज्ञान, कला, राजनीति, प्रशासन और फैशन जगत तक। वे केवल भागीदारी ही नहीं कर रहीं, बल्कि अनेक बार नेतृत्व भी कर रही हैं। इस परिवर्तन के पीछे केवल अधिकारों की लड़ाई ही नहीं, बल्कि आत्मविश्वास, शिक्षा और संवेदनशील सामाजिक सोच का भी बड़ा योगदान है। इस उपलब्धि को हासिल करने में अनगिनत स्त्रियों का मौन संघर्ष, त्याग, साहस और बलिदान शामिल है इसलिए अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस केवल उत्सव का दिन नहीं है, बल्कि स्मरण का भी दिन है, उन यात्राओं का, जो कठिन थीं; उन सपनों का, जिन्हें देखने का साहस कभी आसान नहीं था और उन संघर्षों का, जिन्होंने आज की स्त्री को अधिक आत्मविश्वासी, अधिक सजग और अधिक समर्थ बनाया है।

शायद असली आवश्यकता इस बात की है कि स्त्री और पुरुष के बीच प्रतिस्पर्धा की भावना के बजाय सह-अस्तित्व और साझेदारी का भाव विकसित हो। जब समाज यह समझ लेगा कि प्रगति किसी एक जेंडर की नहीं, बल्कि पूरे मानव समुदाय की होती है, तब यह प्रश्न अपने आप अप्रासंगिक हो जाएगा कि कौन आगे है और कौन पीछे।

अंततः स्त्री होने का अर्थ किसी सीमा या बंधन में बँधना नहीं, बल्कि अपने भीतर निहित संभावनाओं को पहचानना एवं उन्हें साकार करना है और जब यह पहचान समाज की सामूहिक चेतना का हिस्सा बन जाएगी, तब शायद हमें यह प्रश्न पूछने की आवश्यकता ही नहीं रहेगी कि महिलाएँ बराबरी पर हैं या नहीं क्योंकि तब बराबरी एक विचार नहीं, बल्कि एक स्वाभाविक सत्य बन चुकी होगी। जिस दिन समाज स्त्री को अवसर देने को उपकार नहीं, बल्कि उसका अधिकार मान लेगा उसी दिन वास्तविक समानता का सूर्योदय होगा और ऐसे सभ्य समाज में ही स्त्री सुरक्षित, सम्मानित और स्वतंत्र होगी। पुनश्च: अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर सभी को हार्दिक शुभकामनाएं एवं बधाइयाँ।

लेखिका : प्राची तिवारी ‘छबि’     

Comments

Leave A reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *



नीला ड्रम, स्टोव बनाम स्त्री विमर्श
विमर्श वीथी

नीला ड्रम, स्टोव बनाम स्त्री विमर्श

इन सारी घटनाओं में पीड़ित कौन है, इसका पता कितना सत्य है और असल में तो जांच के बाद ही चलेगा। लेकिन इतना तय है कि विवाह स...

महिला ही क्यों हो रसोई की रानी, 'पुरुष महाराज' क्यों नहीं?
विमर्श वीथी

महिला ही क्यों हो रसोई की रानी, 'पुरुष महाराज' क्यों नहीं?

इस दौर में भी आखिर क्यों मछली जल की रानी है की तर्ज पर एक महिला को किचन की रानी बना दिया गया है, पुरुष क्यों नहीं 'रसोई...

मप्र में बाल विवाह की स्थिति और लाडो अभियान
विमर्श वीथी

मप्र में बाल विवाह की स्थिति और लाडो अभियान

मुख्य उद्देश्य -जनसमुदाय की मानसिकता में सकारात्मक बदलाव के साथ बाल विवाह जैसी कुरीति को सामुदायिक सहभागिता से समाप्त कर...

अनोखी है उदिता योजना
विमर्श वीथी

अनोखी है उदिता योजना

उदिता योजना अंतर्गत किशोरी के मासिक धर्म संबंधी स्वास्थ्य को बढ़ावा दिया जााता हैं।

मप्र की महिलाओं में एनीमिया की स्थिति
विमर्श वीथी

मप्र की महिलाओं में एनीमिया की स्थिति

क्या आपको मालूम है कि देश की आधी आबादी भीतर से कमज़ोर है। उनके साथ आपके घर की सुबह होती है। वे आपके लिए चाय बनाती हैं, न...