मध्यप्रदेश के इंदौर जिले के धुलेट गांव की महिला किसान पपीता रावत ने पराली जलाने जैसी गंभीर समस्या के समाधान की दिशा में प्रेरणादायक पहल की है। जहां उत्तर भारत में फसल कटाई के बाद पराली जलाना आम बात है, वहीं पपीता रावत ने किसानों को इसके नुकसान समझाकर एक सकारात्मक बदलाव लाने का काम किया है।
सहायता समूह से आत्मनिर्भरता तक
पपीता रावत ने अपनी यात्रा आजीविका मिशन से जुड़कर शुरू की। आर्थिक तंगी के दौर में उन्होंने सिलाई कार्य से शुरुआत की। बाद में स्वयं सहायता समूह और बैंक से ऋण लेकर स्ट्रा रीपर मशीन खरीदी। इसके बाद उन्होंने गांव और आसपास के किसानों को पराली जलाने के नुकसान और उसके विकल्पों के बारे में जागरूक किया।
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600 बीघा खेतों में रोकी पराली जलाने की प्रथा
पपीता रावत के प्रयासों का असर यह हुआ कि धुलेट गांव और आसपास के क्षेत्रों में लगभग 600 बीघा खेतों में पराली जलाने से बचाया गया। किसानों को पराली से भूसा बनाने के लिए प्रेरित किया गया, जिससे उन्हें आर्थिक लाभ भी मिला। यह भूसा अब पशुओं के चारे के रूप में उपयोग किया जा रहा है।
कृषि के साथ पशुपालन का भी विस्तार
पपीता रावत ने सिर्फ खेती ही नहीं, बल्कि पशुपालन को भी अपनाया। चार मवेशियों के माध्यम से दूध उत्पादन कर वे अतिरिक्त आय अर्जित कर रही हैं। इससे ग्रामीण महिलाओं के लिए आत्मनिर्भरता का एक नया मॉडल सामने आया है।
पराली जलाने के नुकसान
• कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार पराली जलाने से कई गंभीर नुकसान होते हैं:
• मिट्टी की उर्वरता कम हो जाती है
• लाभकारी सूक्ष्मजीव नष्ट हो जाते हैं
• कार्बन डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड जैसी हानिकारक गैसें निकलती हैं
• ग्लोबल वॉर्मिंग पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है
प्रशासन का समर्थन और प्रोत्साहन
जिला प्रशासन और कृषि विभाग लगातार किसानों को पराली न जलाने के लिए जागरूक कर रहे हैं। नियमों के तहत जुर्माने का भी प्रावधान है। पपीता रावत जैसी किसान महिलाओं को ‘किसान दीदी’ के रूप में प्रोत्साहित किया जा रहा है।
सन्दर्भ स्रोत/छाया : कृषक जगत



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