हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि अदालत की ओर से विवाहेतर संबंधों (extramarital relationships) को न्यायिक मान्यता नहीं दी जा सकती। प्रार्थी ने लिव इन रिलेशनशिप का हवाला देते हुए शादीशुदा महिला की कस्टडी के लिए अदालत में याचिका दायर की थी। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बीसी नेगी की खंडपीठ ने बिना नोटिस जारी किए ही इस याचिका को अमान्य ठहराते हुए खारिज कर दिया।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि चूंकि यह स्वीकार किया गया है कि महिला अपने पति के साथ रह रही है इसलिए इस न्यायालय के लिए महिला और उसके पति के बीच वैवाहिक मामलों में हस्तक्षेप करना उचित नहीं होगा।
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याचिकाकर्ता का दावा, वह महिला का घनिष्ठ मित्र
यह याचिका भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 (Article 226) के तहत महिला की कस्टडी के लिए दायर की गई थी जो एक अन्य व्यक्ति से विवाहित है। इतना ही नहीं इस विवाह से उनका एक बच्चा भी है। याचिकाकर्ता का दावा था कि वह महिला का घनिष्ठ मित्र है और इसी आधार पर उसने यह याचिका दायर की थी। इसमें प्रार्थना की थी कि महिला को रिहा किया जाए क्योंकि उसे उस महिला से कई संदेश प्राप्त हुए हैं और महिला को पति और सास से खतरा महसूस हो रहा है।
शादीशुदा महिला से लिव इन रिलेशनशिप अनुचित
बहस के दौरान जब याचिकाकर्ता से यह पूछा कि क्या उसका महिला के साथ शारीरिक संबंध है तो यह सामने आया कि वे लिव इन रिलेशनशिप में भी हैं। इस पर हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट (Himachal Pradesh High Court) ने शादीशुदा महिला से लिव इन रिलेशनशिप को अनुचित ठहराते हुए प्रार्थी की याचिका को खारिज कर दिया।



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