बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि पत्नी का घर का काम करने से मना करना मानसिक क्रूरता नहीं माना जा सकता और यह तलाक का आधार नहीं बन सकता। अदालत ने स्पष्ट कहा कि शादी दो बराबर लोगों की साझेदारी है न कि कोई सेवा अनुबंध।
पत्नी को नौकरानी नहीं समझा जा सकता
हाईकोर्ट ने कहा कि पत्नियों के साथ नौकरों जैसा व्यवहार नहीं किया जा सकता जिनसे हर समय खाना बनाने और साफ सफाई की उम्मीद की जाए। अदालत ने माना कि घरेलू काम करने से इनकार करना अपने आप में क्रूरता नहीं है।
फैमिली कोर्ट का फैसला रद्द
बॉम्बे हाईकोर्ट ने 16 साल पुराने फैमिली कोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया जिसमें पति को क्रूरता के आधार पर तलाक दिया गया था। अदालत ने पति को निर्देश दिया कि वह पत्नी को हर महीने 10 हजार रुपये गुजारा भत्ता और 10 हजार रुपये घर किराए के लिए दे।
ये भी पढ़िए ....
सुप्रीम कोर्ट : गृहिणी का काम कमाने वाले जीवनसाथी से कम नहीं
दिल्ली हाईकोर्ट : घर संभालना भी है ‘काम', गृहणी के योगदान की अनदेखी अन्यायपूर्ण
केरल हाईकोर्ट: गृहिणी भी राष्ट्र निर्माता..कामकाजी महिला के समान मुआवजा की हकदार
2002 में हुई थी शादी
दोनों की शादी 28 फरवरी 2002 को हुई थी लेकिन शादी के तीन महीने के भीतर ही विवाद शुरू हो गए। मतभेद बढ़ने के बाद पत्नी अपने मायके लौट गई थी। इसके बाद पति ने फैमिली कोर्ट में तलाक की अर्जी दाखिल की थी।
पति ने लगाए थे कई आरोप
पति का आरोप था कि पत्नी उसके माता पिता की बात नहीं मानती थी उसके साथ बदतमीजी करती थी और उसे खाना बनाना नहीं आता था। पति ने इन्हीं बातों को मानसिक क्रूरता बताते हुए तलाक की मांग की थी।
कोर्ट ने कहा सामान्य वैवाहिक विवाद
जस्टिस Bharati Dangre और जस्टिस Manjusha Deshpande की बेंच ने कहा कि पति द्वारा लगाए गए आरोप सामान्य वैवाहिक विवादों की श्रेणी में आते हैं। अदालत ने कहा कि तलाक के लिए क्रूरता तभी मानी जाएगी जब व्यवहार लगातार गंभीर हो और साथ रहना असंभव बना दे।
महिलाओं के अधिकारों पर अहम टिप्पणी
अदालत की इस टिप्पणी को महिलाओं के अधिकार और वैवाहिक सम्मान से जोड़कर देखा जा रहा है। फैसले ने साफ कर दिया कि पत्नी घरेलू काम करने के लिए बाध्य नहीं है और उसे केवल सेवा देने वाली की तरह नहीं देखा जा सकता।



Comments
Leave A reply
Your email address will not be published. Required fields are marked *