इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था देते हुए कहा है कि यदि कोई बच्चा अपने पिता से भरण-पोषण मांगता है, तो मां का कामकाजी होना पिता को जिम्मेदारी से मुक्त नहीं करता। भले ही मां आत्मनिर्भर हो, लेकिन बच्चे के दावे में उसे औपचारिक रूप से पक्षकार बनाना अनिवार्य नहीं है। न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह की पीठ ने यह निर्णय आजमगढ़ परिवार न्यायालय के एक आदेश के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। याचिकाकर्ता अरविंद कुमार, जो रेलवे में क्लर्क हैं, ने निचली अदालत के फैसले को चुनौती दी थी।
रेलवे क्लर्क पिता की दलील कोर्ट ने की खारिज
याचिकाकर्ता पिता का तर्क था कि उनकी पत्नी उत्तर प्रदेश पुलिस में कांस्टेबल है और लगभग 55,000 रुपये मासिक वेतन पा रही है। उनका कहना था कि चूंकि मां की आय उनसे अधिक है, इसलिए बेटी के भरण-पोषण की जिम्मेदारी संयुक्त होनी चाहिए। पिता ने मांग की थी कि पत्नी को भी इस कानूनी कार्यवाही में अनिवार्य रूप से पक्षकार बनाया जाना चाहिए। हालांकि, उच्च न्यायालय ने इस दलील को पूरी तरह से सिरे से खारिज कर दिया।
BNSS की धारा 144 और बच्चे का अधिकार
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 144 के तहत कार्यवाही संक्षिप्त प्रकृति की होती है। कानून के अनुसार, आवेदक यानी बच्चा यह चुनने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है कि वह किसके खिलाफ राहत चाहता है। अदालत ने कड़े शब्दों में कहा कि पिता अपनी वैधानिक जिम्मेदारी से केवल इसलिए नहीं बच सकता कि मां भी कमा रही है। पिता की आय और उसकी सामाजिक जिम्मेदारी बच्चे के प्रति सदैव बनी रहती है।
साझा माता-पिता की जिम्मेदारी का सिद्धांत
हालांकि, कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्देश देते हुए कहा कि अंतिम भरण-पोषण राशि तय करते समय निचली अदालत को सावधानी बरतनी चाहिए। ट्रायल कोर्ट को दोनों माता-पिता की कुल संयुक्त आय और उनकी वित्तीय क्षमता का विस्तृत आकलन करना होगा। यह 'साझा माता-पिता की जिम्मेदारी' के सिद्धांत के तहत किया जाना चाहिए ताकि एक तर्कसंगत और न्यायपूर्ण राशि निर्धारित हो सके। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि आर्थिक संतुलन बनाए रखना अदालत का कर्तव्य है।



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