इलाहाबाद हाईकोर्ट : 5 साल तक के बच्चे की प्राकृतिक संरक्षक मां

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इलाहाबाद हाईकोर्ट : 5 साल तक के बच्चे की प्राकृतिक संरक्षक मां

प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि पेट दर्द के इलाज से जुड़ी मेडिकल पर्चियों के आधार पर किसी महिला को शराब की आदी या मानसिक रूप से अस्वस्थ नहीं माना जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे आधार पर किसी मां को उसके बच्चे की अभिरक्षा (कस्टडी) से वंचित नहीं किया जा सकता। 

न्यायमूर्ति संदीप जैन ने यह टिप्पणी करते हुए एक नाबालिग बच्चे की अभिरक्षा उसकी मां को सौंपने का आदेश दिया। अदालत ने कानूनी प्रावधानों का हवाला देते हुए कहा कि पांच वर्ष तक की आयु के बच्चे की प्राकृतिक संरक्षक मां होती है।

पिता के आरोपों को कोर्ट ने किया खारिज

यह मामला मां द्वारा दाखिल एक याचिका से जुड़ा था, जिसमें आरोप लगाया गया था कि बच्चे के पिता ने उसे जबरन मां से अलग कर लिया। सुनवाई के दौरान पिता की ओर से दावा किया गया कि मां शराब की आदी है और उसकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं है। अपने दावों के समर्थन में पिता ने अदालत में कुछ मेडिकल पर्चियां पेश कीं।

हालांकि, हाईकोर्ट ने पाया कि उन पर्चियों में केवल पेट दर्द का जिक्र था और डॉक्टर ने मसालेदार भोजन से बचने की सलाह दी थी। अदालत ने कहा कि किसी भी मेडिकल दस्तावेज में यह नहीं लिखा गया कि महिला मानसिक रूप से अस्वस्थ है या शराब की लत से पीड़ित है।

कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा, “इन मेडिकल पर्चियों के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि याचिकाकर्ता बच्चे की देखभाल करने के लिए शारीरिक या मानसिक रूप से अयोग्य है।”

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कस्टडी मां को देना सामान्य नियम

अदालत ने दोहराया कि कानून के अनुसार सामान्य परिस्थितियों में पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चे की अभिरक्षा मां को ही दी जानी चाहिए। कोर्ट ने माना कि शुरुआती वर्षों में बच्चे की भावनात्मक और पोषण संबंधी जरूरतों को मां बेहतर तरीके से पूरा कर सकती है।

पिता के आचरण पर हाईकोर्ट की नाराजगी

सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि मां वर्तमान में अपने माता-पिता के साथ रह रही है और पति की ओर से उसे कोई भरण-पोषण नहीं दिया जा रहा। यह भी सामने आया कि पिता ने दूसरी शादी कर ली है और दूसरी महिला के साथ रह रहा है।

हाईकोर्ट ने पाया कि पिता ने बाल कल्याण समिति के आदेश के बावजूद जबरन बच्चे को मां से अलग किया था। अदालत ने इस बात पर भी नाराजगी जताई कि पिता, जो एक पुलिस कांस्टेबल है, को जौनपुर वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक कार्यालय द्वारा पहले ही निलंबित किया जा चुका है।

कोर्ट ने कहा कि पिता का व्यवहार दर्शाता है कि उसे अदालत के आदेशों की परवाह नहीं है, जबकि वह एक अनुशासित बल का सदस्य है।

मां को मिली बच्चे की कस्टडी

इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने मां की याचिका स्वीकार कर बच्चे की अभिरक्षा उसे सौंप दी। हालांकि, अदालत ने मानवीय आधार पर पिता को समय-समय पर बच्चे से मिलने का अधिकार भी दिया है।

 

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