मप्र की महिलाओं में एनीमिया की स्थिति

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मप्र की महिलाओं में एनीमिया की स्थिति

• विभा सिंह 

क्या आपको मालूम है कि देश की आधी आबादी भीतर से कमज़ोर है। उनके साथ आपके घर की सुबह होती है। वे आपके लिए चाय बनाती हैं, नाश्ता बनाती हैं, आपके लंच का खयाल रखती हैं, घर की साफ-सफाई, साज-सज्जा, कपड़ों की धुलाई सब कुछ देखती हैं। वे आपके पेड़-पौधे और पालतू जानवर भी संभालती हैं।लेकिन क्या आपको पता है कि इतना कुछ करते हुए वे क्या कुछ गंवाती हैं? अपना ख़ून। जी हां, इस देश की अधिकतर महिलाएं एनीमिया- यानी रक्ताल्पता- की शिकार हैं। और यह उनके लिए शारीरिक नहीं, सामाजिक बीमारी है। सबसे आख़िर में खाने, बचा-खुचा खाने, संकट के समय कम खाने और न खाने तक- वे खुद को तिल-तिल गलाती हुई परिवार को सुखी रखने में लगी रहती हैं। इसका महिला-पुरुष में गैर-बराबरी, गरीबी और अशिक्षा से सीधा वास्ता है। खुद ही सोचिए, खाते-पीते घर की महिलाएं भी खून की कमी से क्यों जूझ रही हैं? खऱाब आहार और इसके परिणामस्वरूप कुपोषण वर्तमान में देश के लिए सामाजिक चुनौतियों में से एक है।

एनीमिया  की स्थिति में एक व्यक्ति के खून में सामान्य से कम लाल रक्त कणिकाओं (हीमोग्लोबिन) की कमी हो जाती है। इससे खून से शरीर के विभिन्न अंगों तक ऑक्सीजन ले जाने की क्षमता कम हो जाती है, जिससे कई स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं पैदा होती हैं। कई मामलों में तो ये जानलेवा भी हो जाती हैं।आधी आबादी के लिए आधी सदी से ज़्यादा वक़्त से एनिमिया नियंत्रण कार्यक्रम चलाया जा रहा है लेकिन बीमारी का सबसे ज्यादा बोझ महिलाएँ ही ढो रही हैं।
 
एनीमिया की देश में स्थिति
अगर हम आंकड़ों की बात करें तो पांचवें नेशनल हेल्थ सर्वे-2019-21(NFHS-5) में देश में 15 से 49 साल की 57 फीसदी महिलाएं एनीमिया की शिकार हैं। इससे पहले 2015-16 में हुए चौथे सर्वे में औरतों की स्थिति इससे बेहतर थी। ये गंभीर वास्तविकता है कि सभी वर्गों में एनीमिया कम होने के बजाय बढ़ा ही है - चाहे वे शिशु, बच्चे, महिलाएं या फिर गर्भवती ही क्यों ना हों।

भारत में एनीमिया पर 2021 में जारी विश्व स्वास्थ्य संगठन की ग्लोबल न्यूट्रिशन रिपोर्ट के मुताबिक 15-49 आयु वर्ग की आधी से ज्यादा महिलाएं एनीमिया ग्रस्त हैं। साल 2016 से एनीमिया के मामलों में इजाफा ही हुआ है। साल 2016 में 52.6 प्रतिशत महिलाएं एनीमिया की शिकार थीं। लेकिन साल 2020 में एनीमिया पीड़ित महिलाओं की संख्या 53 फीसदी हो गई है। भारत समेत 161 देशों में हुए ये सर्वे बताते हैं कि भारत में महिलाओं की सेहत ज्यादा खराब है। एनीमिया को कम करने में भारत ने कोई प्रगति नहीं की है। इससे बेहतर तो सबसे ज्यादा आबादी वाला देश चीन, हमसे गरीब और हमारा पड़ोसी पाकिस्तान, हमसे कम विकसित नाइजीरिया और इंडोनेशिया हैं।

एनीमिया की मप्र में स्थिति
उत्तर भारत के राज्यों की स्थिति ज्यादा खऱाब है। यहां की 50 फीसदी से ज्यादा महिलाएं एनीमिया से पीड़ित हैं। उनमें से एक मध्यप्रदेश भी है, जहाँ हर सरकारी आयोजन कार्यक्रम कन्या पूजन से शुरू होता है लेकिन पांचवां राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफ़एचएस 5) राज्य में बच्चों और महिलाओं के स्वास्थ्य की निराशाजनक तस्वीर पेश करता है।

प्रदेश में 6-59 माह उम्र के बच्चों में एनीमिया की समस्या बढ़ी है। वर्ष 2015-16 के सर्वे में 68.9 % बच्चे एनीमिया से पीड़ित थे, जो 2020-21 में बढ़कर 72.7% हो गए है. वहीं पूरे देश में ये आंकड़ा 67.1 फीसदी है। 15-49 वर्ष की उम्र की महिलाओं की बात करें तो इस समूह में भी सुधार के बजाय समस्या बढ़ी ही है। पिछले सर्वेक्षण में रक्ताल्पता का आंकड़ा 52.5% था, जो अब बढ़कर 54.7% हो गया है। हालांकि राहत की बात है कि गर्भवती महिलाओं में एनीमिया का स्तर सुधरा है। पहले यह 54.6 था जो अब गिरकर 52.9 हो गया है। बड़ी बात ये है कि इस समस्या से शहरी और ग्रामीण क्षेत्र के लोग करीब-करीब बराबर पीड़ित हैं। जबकि लक्षद्वीप, केरल, मेघालय, मणिपुर, मिज़ोरम और नागालैंड जैसे छोटे राज्यों में महिलाओं और बच्चों की सेहत हमारे मुकाबले काफी बेहतर है।

एनीमिया के बढ़ने का मुख्य कारण स्त्री रोग विशेषज्ञ ज्योति सिमलोट के मुताबिक पौष्टिक और संतुलित खुराक ना मिल पाना है। नतीजतन शरीर में पोषक तत्वों की कमी हो जाती है और लाल रक्त कोशिकाओं का निर्माण भी कम होता है। इसके अलावा उनका कहना है कि प्रेगनेंसी और अनियोजित अबॉर्शन भी महिलाओं में एनीमिया के बढ़ने की वजह होती है क्योंकि दोनों ही अवस्थाओं में शरीर से काफी रक्तस्राव होता है। वहीं शहरी क्षेत्रों और सक्षम महिलाओं में रक्ताल्पता की वजह लापरवाही और खानपान में आए बदलाव को बताती हैं।

वहीं रसाहार विशेषज्ञ पूर्णिमा दाते महिलाओं में एनीमिया के मामले ज्यादा होने के दो-तीन कारण बताती हैं। एक, खान-पान में उन प्राकृतिक चीज़ों का इस्तेमाल ना करना जिससे हिमोग्लोबिन बनता है। दूसरा, ऋतु अनुसार हमारी जीवन शक्ति कम-ज्यादा होती रहती है। ऐसे में पथ्य और अपथ्य भोज्य पदार्थों के सेवन का ध्यान न रखना। तीसरा और आखिरी कारण वो बताती हैं अगर बीमारी हो जाती है तो रासायनिक पदार्थों पर निर्भरता और उसको मैनेज करने वाली दवाइयों का सेवन है।

एनीमिया से निपटने के प्रयास
देश में महिलाओं और बच्चों में खतरनाक हद तक बढ़ चुकी एनीमिया यानी रक्ताल्पता की स्थिति को सुधारने के लिए भारत सरकार ने ‘एनीमिया मुक्त भारत’ रणनीति की 2018 में शुरुआत की। ये कार्यक्रम महिला एवं बाल विकास मंत्रालय और यूनिसेफ की पहल है। इसके तहत गांव-गांव जाकर पांच वर्ष तक के बच्चों और 15 से 49 आयु वर्ग की महिलाओं की रक्त की जांच और उपचार किया जाना शामिल है। इसका लक्ष्य साल 2018 से 2022 तक 15-49 वर्ष के बच्चों, किशोरियों और महिलाओं में प्रति वर्ष 3% एनीमिया को कम करना है।

मध्यप्रदेश में पोषण अभियान के तहत गर्भवती औरतों से लेकर बच्चों तक आयरन और फोलिक एसिड की खुराक पहुंचे, इसके लिए कई स्तर पर स्कूल से लेकर गांव तक कई स्तर पर अभियान चलाए जा रहे हैं। लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग की तरफ से 18 जुलाई से 31 अगस्त तक दस्तक अभियान की शुरूआत की गई है, जिसमें प्रशिक्षित एएनएम और आशा कार्यकर्ताओं द्वारा घर-घर जाकर बच्चों में डायरिया, एनीमिया और कुपोषण का पता लगाया जाता है। इसके साथ ही ओआरएस घोल, फोलिक एसिड की खुराक, विटामिन-ए की दवाई देने और खून की जांच करना शामिल है। इस तरह के अभियानों की बीच-बीच में राज्य सेवाओं की कवरेज और गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए समीक्षा भी की जाती है।

ये कहा जा सकता है कि जमीनी स्तर पर काम करने की बदौलत ही गर्भवती महिलाओं में एनीमिया के स्तर में 2 फीसदी की कमी आई है। यही वजह है कि एनीमिया मुक्त भारत अभियान में उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हुए मध्यप्रदेश पिछले दो साल से अव्वल रहा है। 2020-21 के एनीमिया मुक्त भारत स्कोर कार्ड में मध्यप्रदेश को मिली प्रथम रैंक में 64.1 प्रतिशत वैल्यू आंकी गई, जो पूरे देश में सर्वाधिक है। 6 से 59 माह के बच्चों में आयरन और फोलिक एसिड कवरेज 36.3 प्रतिशत, 5 से 9 वर्ष के बच्चों का कवरेज 71.6 प्रतिशत, 10 से 19 वर्ष के बच्चों का कवरेज 66.3 प्रतिशत, गर्भवती महिलाओं का कवरेज 95 प्रतिशत रहा है, जो कि बाकी राज्यों से काफ़ी बेहतर रहा है।

कहां हो रही है चूक?
इन आंकड़ों और मध्यप्रदेश में हो रहे उत्कृष्ट कार्यों को देखकर लगता है कि सरकार अपने लक्ष्यों को कुछ ही सालों में हासिल कर लेगी। लेकिन क्या वाकई ऐसा हो पाएगा, जबकि अब भी राज्य की हर दूसरी महिला एनिमिक है। हैरानी की बात ये है कि पिछले तीन वित्तीय सालों में मध्यप्रदेश ने एनीमिया मुक्त भारत स्कीम के तहत प्राप्त फंड में से 40 फीसदी का उपयोग तक नहीं कर पा रही है। ये आंकड़े इस साल बजट सत्र के दौरान राज्यसभा में केंद्रीय महिला और बाल विकास राज्यमंत्री भारती पवार ने बताए थे।

सरकारी आंकड़ों की ही बात करें तो NFHS-4 और NFHS-5 के बीच किशोरियों में 5 फीसदी एनीमिया का इजाफा हुआ है। वहीं गर्भवती महिलाओं के आयरन और फोलिक एसिड की खुराक लेने का अनुपात है तो महज 31 फीसदी गर्भवती महिलाएं ही पूरा कोर्स करती हैं। वहीं 12 जिलों में किए गए न्यूट्रिशन इंटरनेशनल के टेलीमार्केटिंग सर्वे में पता चला है कि केवल 78 फीसदी किशोरियां ही आईएफए का नियमित इस्तेमाल करती हैं। इस टैबलेट की खऱाब खपत के लिए बताए गए प्रमुख कारणों में सबसे ज़्यादा भूलना, उसके बाद उसकी अनुपलब्धता और फिर कितनी गोलियां खानी हैं - इसकी जानकारी का अभाव रहा है।

इसके अलावा हाल ही में शुरू हुए दस्तक अभियान की बात करें तो बिना उपकरण ही आशा कार्यकर्ता घर-घर जाकर दस्तक दे रही हैं। अख़बारों में छपी खबरों के मुताबिक बच्चों और महिलाओं की खून की जांच के लिए कई जगहों पर कार्यकर्ताओं को जरूरी डिजिटल हीमोग्लोबिन मीटर और वजन-बीपी मापने की मशीनें तक नहीं दी गई हैं। सरकारी प्रयासों में ये चूक बताती है कि जवाबदेही, उपकरणों के मामले में बेहतर ढंग से सुसज्जित ना होना और लगातार मॉनिटरिंग की कमी है।

एनीमिया के बढ़ने का सामाजिक कारण
एनीमिया या रक्ताल्पता भारतीय स्त्रियों के लिए शरीर की नहीं बल्कि समाज की बीमारी है. भारतीय परिवारों में जो आम दिनचर्या देखने को मिलती है उसमें महिलाएं अपने शरीर की सबसे ज्यादा उपेक्षा करती हैं। पूरे परिवार के भोजन ग्रहण करने के बाद आखिर में घर की महिलाओं की बारी आती है और फिर बचे-खुचे खाने से ही काम चला लेती हैं। भारत में लड़कियों को अच्छा बनाने के संस्कार दरअसल उसको बीमार बनाने के संस्कार लिए होते हैं।अगर व्यक्ति अधिकतम श्रम करे और उसे खाने की किल्लत हो तो एनीमिया का शिकार होना तय है। इसका इलाज सिर्फ और सिर्फ स्वस्थ और पौष्टिक भोजन में है। लेकिन यहां गरीबी आड़े आ जाती है, जिसकी दोहरी मार महिलाओं को झेलनी पड़ती है। अगर घर गरीब है तो स्वाभाविक है कि रोटियां पूरी नहीं पड़ेंगी। ऐसे में जो बचता है वह घर की महिला के हिस्से आता है। गरीबी अपने आप में एक बीमारी है लेकिन ये गरीबी परिवार के सारे सदस्यों पर बराबर प्रभाव नहीं डालती है। इस गरीबी का बड़ा हिस्सा परिवार के मुखिया, उसके बाद बच्चे और आखिर में महिला के हिस्से आता है।

खासतौर पर जो महिलाएं गर्भवती होती हैं, उनकी स्थिति ज्यादा खऱाब होती है। ऐसे ही जब औरतें बीमार होती हैं तो उनकी दवा भी आखिर में होती है। ऐसे में कोरोना काल में आई गरीबी ने और ब्रेक लगा दिया है। कोविड के दौरान अप्रैल 2020 से अप्रैल 2021 के बीच 23 करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे चले गए हैं। यानी कोरोना के एक साल ने गरीबी के मामले में देश को करीब 8 से 9 साल पीछे धकेल दिया है। ये रिपोर्ट अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर सस्टेनेबल एम्प्लॉयमेंट की है। किसी की नौकरी चली गई तो किसी का धंधा-पानी चौपट हो गया, किसी को मजबूरन कम पैसे में नौकरी करनी पड़ रही है। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की ग्लोबल सोशल मोबिलिटी रिपोर्ट 2020 के मुताबिक भारत के किसी गरीब परिवार को मिडिल क्लास में आने में सात पीढ़ियों का समय लग जाता है। ऐसे में घर की महिला पति और बच्चे की सेहत के साथ न्याय करते हुए अपने शरीर से अन्याय करती रहती है।

यहां फणीश्वरनाथ रेणु के कालजयी उपन्यास ‘मैला आंचल’ की याद आती है, जिसमें डॉ. प्रशांत बिहार के गांवों में मलेरिया से निपटने और लोगों को इसका इलाज मिल सके, उसका रास्ता खोजने की कोशिश करते हैं लेकिन आखिर में वो पाते हैं कि यहां के लोगों की बीमारी मलेरिया नहीं बल्कि गरीबी है।
उन्हें जितना कैल्शियम विटामिन चाहिए, उतना ही अपने घर के पुरुषों का सहयोग चाहिए। उन्हें बेहतर पोषण मिले- यह ज़रूरी है। वे स्वस्थ रहेंगी तो आप स्वस्थ रहेंगे, परिवार स्वस्थ रहेगा, समाज स्वस्थ रहेगा, देश स्वस्थ रहेगा। स्त्रियां हमारे राष्ट्रीय स्वास्थ्य की गारंटी हैं। उन्हें रक्ताल्पता का शिकार मत होने दीजिए।

एनीमिया के लक्षण
• शरीर में थकान और कमजोरी
• चक्कर आना
• -ध्यान केंद्रित नहीं होना
• सांस फूलना
• आंखों एवं त्वचा पर सफेदपन आना
• अनियमित धड़कन
• चेहरे और पैरों में सूजन

एनीमिया से कैसे बचें
• एनीमिया की जांच एवं उपचार
• आयरन सिरप/ आयरन की गुलाबी, नीली,लाल गोली
• कृमिनाशक गोली
• आयरन, फोलिक एसिड, विटामिन बी-12 से युक्त फोर्टीफाइड आहार का सेवन
• आयरन युक्त खाद्य पदार्थों का सेवन एवं खट्टे फलों का सेवन
• व्यक्तिगत स्वच्छता एवं संतुलित खानपान
एनीमिया के कारण
• आयरन युक्त भोजन ना करना
• पेट में कीड़े होना
• आयु के अनुसार शरीर की आवश्यकता बढ़ना
• गर्भावस्था में पोषक तत्वों से भरपूर डाइट ना मिलना
• मासिक रक्तस्राव अधिक होना
• इंफेक्शन
• अनुवांशिक कारण

लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं।

कॉपीराइट : मीडियाटिक  

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