दीपाली दरोज़

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दीपाली दरोज़

छाया : दीपाली दरोज़ के फेसबुकअकाउंट से

• सारिका ठाकुर 

कलाकार-सिरेमिक एवं मूर्तिकला

मिट्टी की उर्वरता खेतों में ही नहीं बल्कि उस चाक पर भी देखी जा सकती है जहाँ से धान और गेहूं की बालियों की तरह विभिन्न कलाकृतियां आकार लेती हैं। यह मिट्टी का ही आकर्षण है कि मध्यप्रदेश में भारत भवन की स्थापना के बाद जब वहाँ सिरेमिक आर्ट के लिए अलग विभाग की शुरुआत हुई तो कई प्रतिभाएं मानो जादू के ज़ोर से खिंची चली आईं। दिलचस्प बात यह है कि इनमें से कई इस कला के बारे में कुछ नहीं जानते थे। सिरेमिक आर्ट की ऐसी ही प्रतिभाशाली कलाकार हैं दीपाली दरोज़।

दीपाली जी का जन्म मध्यप्रदेश के बालाघाट शहर में 14 फरवरी सन 1967 को हुआ। उनके पिता सत्यानन्द बनर्जी सरकारी अधिकारी थे एवं माता  गीता बनर्जी गृहिणी थीं। पिता सरकारी अधिकारी थे, तो उनका तबादला अलग-अलग शहरों में होता रहता था। परम्परानुसार अन्य बंगाली परिवारों की तरह दीपाली जी के परिवार में भी सांस्कृतिक गतिविधियों को खूब प्रोत्साहित किया जाता था। बचपन में ही नृत्य, संगीत और साहित्य से उनका स्वाभाविक सा परिचय हुआ। परवरिश के क्रम में दो भाइयों और दो बहनों के बीच कभी बेटे-बेटी में माता-पिता ने फ़र्क नहीं किया। परिवार की प्रगतिशील विचारधारा ने सभी बच्चों को भविष्य के लिए समान अवसर उपलब्ध करवाए।।

दीपाली जी की हायर सेकेण्डरी तक की शिक्षा सेंट जोसेफ कॉन्वेन्ट, भोपाल से हुई। वर्ष 1983 में होम साइंस, मनोविज्ञान एवं अंग्रेजी विषय लेकर नूतन कॉलेज, भोपाल से स्नातक करने के बाद उन्होंने स्नातकोत्तर के लिए विषय के रूप में फ़ाइन आर्ट्स को चुना। अंतिम वर्ष की परीक्षा को छह महीने रह गए थे,उसी दौरान भारत भवन में पी. आर. दरोज़ की सिरेमिक कला का जीवंत प्रदर्शन आयोजित किया गया था। कॉलेज की विभाग प्रमुख ने सभी छात्राओं का वहाँ जाना अनिवार्य कर दिया। वह पहला दिन था जब दीपाली जी का परिचय मिट्टी, चाक और रंग संयोजन से हुआ। सबसे ज़्यादा चमत्कृत करने वाला था सफ़ेद मिट्टी का चाक पर घूमना।

दीपाली के दिलो-दिमाग पर यह कई दिनों तक छाया रहा। उसी दिन भारत भवन आकर सीखने का मन उन्होंने बना लिया था और परीक्षा समाप्त होने के बाद वे नियमित रूप से वहाँ जाने लगीं। वर्ष 1992 तक यह सिलसिला जारी रहा, इस बीच कई समूह प्रदर्शनियों में शिरकत करने का अवसर भी मिला साथ ही काम में भी निखार आता गया। लेकिन जीवन में एकरसता सी आ गयी थी। उन्हें अब एक बड़ा आकाश चाहिए था परवाज़ के लिए। 1992 में ही दीपाली जी की माता जी का देहांत हो गया जो उनके लिए बहुत बड़ा मानसिक आघात था। भोपाल से उनका मन उचटने लगा था। तब तक श्री दरोज़ भारत भवन से दिल्ली चले गए थे। एक दिन उनका फ़ोन आया। वे दिल्ली ब्लू पॉटरीज़ से जुड़े थे और उन्हें वहां प्रशिक्षक की जरुरत थी, क्योंकि तत्कालीन प्रशिक्षक स्कॉलरशिप लेकर जापान जा रहे थे। उनके लौटकर आने तक किसी की ज़रूरत थी। दीपाली जी ने फ़ौरन हाँ कर दी और दिल्ली पहुँच गयीं। वहाँ उन्होंने लगभग साढ़े तीन वर्ष काम किया।

पी. आर. दरोज़ स्टूडियो के काम की निगरानी करते थे। उसी दौरान दोनों का परिचय प्रगाढ़ होता चला गया। उनकी चर्चा अक्सर मिट्टी और उसे दिए जाने वाले आकार पर ही होती, लेकिन धीरे-धीरे भावना ने भी आकार ले लिया और 1997 में दोनों एक दूसरे के हो गए। शादी से पहले 2006 में दीपाली नौकरी छोड़ चुकीं थीं क्योंकि उन्हें ऐसा महसूस हो रहा था कि सिखाने के चक्कर में खुद का सीखना या खुद नया करना पीछे छूट रहा है। अपने नए घर में उन्हें अच्छा खासा स्टूडियो मिल गया था, इसलिए कहीं और कहीं जाने की अब ज़रुरत नहीं थी। नौकरी छोड़ देने के बाद एक अलग किस्म की आज़ादी का अहसास हुआ। उसी वर्ष के अंत में वे अपनी पहली संतान को जन्म देने भोपाल लौट आईं, दरोज़ जी भी उनके साथ थे।

पिता के घर पर काम जारी रखने के लिए ज़रुरी उपकरण लगा दिए गए। अब जीवन की प्राथमिकता बदल गई। जब बच्चा सोता तभी दीपाली सिरेमिक का काम करतीं। यह सिलसिला लगभग दो ढाई साल चला। अंततः यह सोचकर कि करियर को ऊंचाई महानगर में ही मिल सकती है, दोनों वापस दिल्ली आ गए। बमुश्किल दो साल गुज़रे होंगे एक नया अवसर मानो प्रतीक्षा में बैठा था। ब्रिटिश कौंसिल की ओर से स्कॉलरशिप के लिए आवेदन आमंत्रित किया था जिसमें उन्होंने भी फॉर्म भर दिया। स्कॉलरशिप के लिए चुने जाने के बाद वे बच्चे को साथ लेकर गईं। संयोग से उनके बड़े भाई इंग्लैंड में ही रहते थे, वे उनके पास बच्चे को छोड़कर काम करने जातीं और हफ़्ते  में एक दिन आकर बच्चे को देख लेतीं।

विदेश से अनुभव के साथ दीपाली ज़बर्दस्त आत्मविश्वास भी लेकर लौटीं। यहाँ उनके काम का सिलसिला फिर चल निकला । दीपाली जी कहती हैं एकल प्रदर्शनी के लिए चार-पांच साल तैयारी करनी पड़ती हैं। जब कई स्तरीय कला कृतियाँ इकट्ठी हो जाती हैं तब जाकर ऐसी किसी प्रदर्शनी में शामिल होने की स्थिति बनती है। इस लिहाज से वे चार-पांच एकल और कई समूह प्रदर्शनियों में हिस्सा ले चुकी हैं। वर्तमान में अपने परिवार के साथ खुशहाल रचनात्मक जीवन व्यतीत कर रही हैं|

दीपाली जी अब तक देश के लगभग सभी प्रतिष्ठित कला दीर्घाओं में एकल एवं समूह प्रदर्शनियों में हिस्सा ले चुकी हैं एवं अभी भी कार्यरत हैं।

संदर्भ स्रोत – स्व संप्रेषित एवं दीपाली जी से सारिका ठाकुर की बातचीत पर आधारित

© मीडियाटिक

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