भोपाल। गरीबी और अभावों के बावजूद इन बेटियों ने संघर्ष की राह पर चलते हुए न सिर्फ अपनी सीमाओं को पार किया, बल्कि देश के लिए अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में मेडल भी जीते। पुराने जूतों, टूटे दिल और खाली जेबों से उन्होंने अपनी मेहनत और हिम्मत के दम पर दुनिया में तिरंगा फहराया। राजधानी की झुग्गी बस्ती और गांवों से निकलकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय खेलों में सफलता हासिल करने वाली ये युवा एथलीट्स, आज लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन चुकी हैं।
एकता डे: गरीबी को पछाड़कर वर्ल्ड रेकॉर्ड तक पहुंची
भोपाल के पंचशील नगर की झुग्गी बस्ती की एकता डे के पिता मजदूर हैं और परिवार में आर्थिक तंगी थी। बावजूद इसके, एकता के सपनों को टूटने नहीं दिया गया। 11 साल की उम्र से दौड़ने वाली एकता के परिवार ने हर संघर्ष सहा, ताकि उसका प्रशिक्षण जारी रहे। 2021 में कोरोना के दौरान जब एकेडमी से निकालने का दबाव आया तब कोच एसके प्रसाद ने मदद दी। 2022 में कुवैत एशियन यूथ में सिल्वर मेडल जीतने के बाद उसकी मेहनत का फल मिला।
बुशरा खान: पिता के निधन के बाद पुराने जूतों से जीत की कहानी
सीहोर जिले की बुशरा खान ने 11 साल की उम्र में लड़कों को दौड़ाकर हराने की इच्छा से दौड़ना शुरू किया। लेकिन पिता के निधन के बाद परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा, और बुशरा ने दौड़ना छोड़ दिया। छह महीने तक ट्रैक से दूर रहने के बाद, खेल मंत्री यशोधरा राजे और कोच एसके प्रसाद ने उसे पुनः प्रेरित किया। पुराने जूते पहनकर उसने फिर से दौड़ने का सफर शुरू किया और पदक जीते।
दीक्षा सिंह: खेत से ट्रैक तक का सफर
अमरोहा जिले के किसान की बेटी दीक्षा सिंह ने तब दौड़ना शुरू किया जब गांव में ट्रैक नहीं था। दूसरे गांव जाकर वह अभ्यास करती। 2017 में भोपाल में सीआईएसएफ ट्रायल्स के दौरान एक सेकंड से चूक गई। निराश होकर घर लौटते वक्त रेलवे स्टेशन पर खड़ी ट्रेन छूट गई, लेकिन कोच एसके प्रसाद ने उसकी प्रतिभा पहचानी और उसे प्रशिक्षण देना शुरू किया। 2023 में कैलिफोर्निया और लॉस एंजेलिस में दो ब्रॉन्ज मेडल जीतकर उसने अपनी मेहनत को मान्यता दी।
सन्दर्भ स्रोत : पत्रिका समाचार पत्र
संपादन : मीडियाटिक डेस्क



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