जबलपुर के कंजई गांव में जन्मी संजो बघेल ने वह कर दिखाया जो सदियों से असंभव माना जाता था। बुंदेलखंड की वीर रस परंपरा में आल्हा गायकी हमेशा पुरुषों तक सीमित रही, लेकिन संजो ने इस परंपरा को चुनौती देते हुए अपना अलग मुकाम बनाया।
साधारण परिवार से असाधारण सफर
संजो एक साधारण किसान परिवार से आती हैं। उन्होंने केवल सातवीं कक्षा तक पढ़ाई की, लेकिन बचपन से ही संगीत और मंच से उनका गहरा जुड़ाव रहा। परिवार का धार्मिक माहौल और रामलीला में भागीदारी ने उनके भीतर आत्मविश्वास पैदा किया। उनके बड़े पिता आल्हा गायक थे, जिनसे उन्हें प्रेरणा मिली।
जब आल्हा गाना बना संघर्ष
बुंदेलखंड और बघेलखंड में महिलाओं के लिए आल्हा गाना वर्जित माना जाता था। जब संजो ने इस क्षेत्र में कदम रखने की इच्छा जताई, तो उन्हें कई जगहों से निराशा मिली। यहां तक कि स्टूडियो में भी उनकी रिकॉर्डिंग करने से मना कर दिया गया, लेकिन संजो ने हार नहीं मानी। उन्होंने चतुराई से भजन के रूप में आल्हा गाने की बात कही, जिसके बाद उन्हें पहला मौका मिला। भोलेनाथ पर गाया गया उनका आल्हा गीत लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय हो गया।
20 हजार गीत और लगातार सफलता
संजो अब तक 20,000 से अधिक आल्हा गीत गा चुकी हैं। वे केवल पारंपरिक ही नहीं, बल्कि समसामयिक विषयों पर भी आल्हा प्रस्तुत करती हैं। उनके कार्यक्रमों की संख्या हजारों में है और आज वह बुंदेलखंड की पहचान बन चुकी हैं। संजो ने सिर्फ खुद सफलता हासिल नहीं की, बल्कि महिलाओं के लिए एक नया रास्ता भी खोला। आज कई महिलाएं आल्हा गायकी में कदम रख रही हैं, जिसका श्रेय संजो को जाता है।
उन्होंने यह मुकाम अपनी मेहनत के दम पर हासिल किया है। उनके पास आज एक पूरी टीम है, जिसमें लेखक और कलाकार शामिल हैं। उनके यूट्यूब चैनल पर लाखों सब्सक्राइबर हैं, जो उनकी लोकप्रियता का प्रमाण है। उनका सफर अभी खत्म नहीं हुआ है। वह आल्हा गायकी को नई ऊंचाइयों तक ले जाने का लक्ष्य रखती हैं और लगातार नए प्रयोग कर रही हैं।
सन्दर्भ स्रोत/छाया : ईटीवी भारत
सम्पादन : मीडियाटिक डेस्क



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