बिंदु जुनेजा : भाव, भक्ति और अभिव्यक्ति का अनूठा संगम

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बिंदु जुनेजा : भाव, भक्ति और अभिव्यक्ति का अनूठा संगम

छाया : बिंदु जुनेजा 

• विभा सिंह

भारतीय शास्त्रीय नृत्य ओडिसी केवल एक नृत्य शैली नहीं, बल्कि सभ्यता, संस्कृति और आत्मा की अभिव्यक्ति है। लगभग दो हजार वर्ष पुरानी इस नृत्य परंपरा को अपनी साधना, संवेदनशील अभिव्यक्ति और मंचीय गरिमा से नई ऊँचाइयाँ देने वाली कलाकार हैं बिंदु जुनेजा (Bindu Juneja)। उनके मंचीय प्रदर्शन की सबसे बड़ी विशेषता उसकी ‘भावात्मक ऊर्जा’ है। वे केवल 'नृत्य नहीं करतीं बल्कि प्रत्येक प्रस्तुति को अभिनय, संगीत और भावनाओं के समन्वय से एक सम्पूर्ण नाट्य अनुभव में बदल देती हैं। बिंदु जुनेजा परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन बनाए रखती हैं। उन्होंने नई पीढ़ी को ओडिसी से जोड़ने का निरंतर प्रयास किया है। उनके लिए नृत्य केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं बल्कि सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने का जरिया है।

प्रारंभिक जीवन और नृत्य के सफर की शुरुआत

लखनऊ में 21 फरवरी 1968 को जन्मी बिंदु (Bindu Juneja) के माता-पिता विभाजन के दौरान सरगोधा (अब पाकिस्तान में) से आकर यहां बस गए थे। दोनों कला प्रेमी थे। इनकी माँ चंद्रा मनचंदा ने सितार में बी.ए. किया था तो पिता बलवंत राज जुनेजा साइंटिस्ट थे। वे वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) की शाखा राष्ट्रीय वानस्पतिक अनुसंधान संस्थान (National Botanical Research Institute) में डिप्टी डायरेक्टर थे और साथ ही संस्था की पत्रिका (NBRI Newsletter) के संपादक भी। वैसे उनका सपना डॉक्टर या कलाकार बनने का था। लेकिन इकलौती संतान होने और विभाजन के समय जीवन में आए बदलाव के कारण उनकी दोनों इच्छाएं पूरी नहीं हो सकीं। बिंदु बताती हैं कि उन्होंने उसी वक्त संकल्प ले लिया था कि अपने सपने को वे बच्चों के जरिए पूरा करेंगे। उसी संकल्प के कारण बिंदु (Bindu Juneja) नृत्यांगना के रूप में प्रतिष्ठित हुईं, जबकि उनकी बड़ी बहन नैनी जुनेजा टंडन डॉक्टर बन गईं। नैनी का पढ़ाई में ज्यादा रूझान था हालांकि उन्हें भी सितार और गायन सिखाने की कोशिश हुई लेकिन उनका मन पढ़ाई की ओर ज्यादा था। संयोग है कि उनके दोनों बेटे और बहुएं भी डॉक्टर हैं।

बिंदु अपने पिता की परी थीं। उनकी अभिलाषाएं अब बिंदु का लक्ष्य थीं। बलवंत जी कथक गुरू लच्छू महाराज (Lachhu Maharaj) के करीबी थे। अक्सर उन्हें शिष्यों को कथक की तालीम देते देखते थे। बावजूद इसके, वे चाहते थे बिंदु दक्षिण भारतीय नृत्य सीखें। उन्हें वह ज्यादा दिव्य और पवित्र लगता था। इसकी शुरुआत भातखंडे संगीत महाविद्यालय से हुई। छह-साढ़े छह साल की उम्र से ही बिंदु भरतनाट्यम सीखने लगीं। वे बताती हैं “ स्कूल से आने के बाद उनके नृत्य की पोशाक तैयार रहती थी। दोपहर का खाना खाकर करीब दो-ढाई बजे रिक्शे से संगीत महाविद्यालय के लिए निकल जाती थीं। यहां पहुंचने में 45 मिनट लगते थे। कभी आसपास की कुछ लड़कियां भी साथ जातीं तो कभी अकेली। बड़ी हुई तो साइकिल से जाने लगी। छोटी-बड़ी सभी कक्षाओं में बैठती। वापस आने में मुझे रात के 8 बज जाते। ये सिलसिला 10 वर्षों तक यूं ही चलता रहा।’’

बिंदु नृत्य में रम गई थी, पढ़ाई में मन नहीं लगा। दिक्कत दिसंबर में तब और बढ़ जाती जब नृत्य की लिखित परीक्षा और स्कूल की अर्धवार्षिक इम्तेहान का समय एक ही होता। वे बताती हैं, “पढ़ाई में मन तो लगता नहीं था इसलिए हमेशा कुछ न कुछ बहाना बनाकर कक्षाएं, यहां तक की अर्द्धवार्षिक परीक्षा तक छोड़ देती थी। लेकिन कभी इसके लिए माता-पिता से डांट नहीं खाई। मेरे नृत्य के आगे पढ़ाई कभी नहीं आई। मजे की बात तो ये है कि भरतनाट्यम की लिखित परीक्षा मुश्किल होती थी तो मेरे पिता उसको पढ़कर सरल भाषा में नोट्स बनाकर मुझे देते थे। 9वीं कक्षा में आते-आते मैंने भरतनाट्यम में विशारद कर लिया था। इसके बाद भी अभ्यास के लिए जाती रही।’’ नृत्य के साथ-साथ कार्मल कॉन्वेंट स्कूल से बिंदु (Bindu Juneja) ने 1983 में हाईस्कूल और 1985 में इंटरमीडिएट कर लिया। वे बताती हैं, “पिताजी अक्सर मुझसे कहते थे, तुम एक अच्छी डांसर बनो। मुझे वे गुरु रुक्मिणी देवी अरुंडेल के पास चेन्नई भी भेजना चाहते थे। दरअसल, पिताजी एक फिल्म सोसायटी चलाते थे। अपनी संस्था एनबीआरआई में उन्होंने दो बार रुक्मिणी जी को बुलाया था। जब उनसे मिली तो मेरी उम्र 8 साल थी। उनके साथ की एक तस्वीर मेरे पास आज भी है। मुझे देखकर उन्होंने मेरे गाल पर हाथ फेरते हुए कहा था कि ये तो अभी बहुत छोटी है, जब बड़ी हो जाए तो नृत्य शिक्षा के लिए भेजना।”

उस समय लखनऊ में उत्तर दक्षिण कल्चरल ऑर्गेनाइजेशन’ (UDCO) काफी सक्रिय थी, जहां बड़े-बड़े कलाकार आते थे। सोनल मानसिंह, यामिनी कृष्णमूर्ति, गुरु केलुचरण महापात्र और संयुक्ता पाणिग्रही को बचपन से देखते-सुनते बड़ी हुईं। इनके पिताजी ने जब पहली बार संयुक्ता पाणिग्रही के नृत्य और केलुचरण की साधना को देखा तो वे मुग्ध हो गए। उन्हें लगा कि ओडिसी नृत्य की कोमलता और भाव-अभिनय बिंदु के व्यक्तित्व के लिए अधिक उपयुक्त है। लखनऊ से उड़ीसा की सीधी ट्रेन न होने और ज्यादा दूरी की वजह से संयुक्ता पाणिग्रही के पास बिंदु नहीं जा पाईं। इस बीच काम के सिलसिले में उनका दिल्ली आना-जाना भी लगा रहता था और ओडिसी नृत्य के लिए गुरुओं की तलाश भी जारी रही। इस दौरान इनके पिताजी की मुलाकात गांधर्व महाविद्यालय के संस्थापक और पद्म श्री गुरु विनय चंद्र मौद्गल्य और उनकी बेटी माधवी मौद्गल्य से हुई। ये परिवार बिंदु के पिता को भा गया।

दिल्ली के मिरांडा हाउस कॉलेज में बिंदु ने बीए में दाखिला ले लिया, तीन साल हॉस्टल में रहीं। 1985 में जब बिंदु गुरू माधवी से मिलीं तो उनकी उम्र महज 17 साल थी। कॉलेज जाना कम होता था, सुबह से शाम तक उनका वक्त गुरू माधवी के साथ गांधर्व महाविद्यालय में बीतता। वे बताती हैं, “1986 में गुरू माधवी को भारत सरकार के फेस्टिवल ऑफ इंडिया में परफॉर्मेंस के लिए अमेरिका जाना था। उनके साथ किसी सीनियर को जाना था लेकिन ऐन वक्त पर उनका कार्यक्रम रद्द हो गया। उन्होंने मुझसे पूछा- चलोगी? मैं तैयार हो गई। ओडिसी सीखते हुए में मुझे सिर्फ एक साल ही हुआ था। मुझे फौरन कुछ कंपोजिशन सिखाए गए और मेरी पोशाक तैयार की गई। इस तरह मैं उनकी को-डांसर बनकर अमेरिका पहुंच गई। इस तरह ओडिसी नृत्य की मेरी पहली प्रस्तुति अपने गुरु के साथ न्यूयॉर्क में हुई। ढाई महीने के टूर में अलग-अलग शहरों में 53 कार्यक्रम किए।” वे बताती हैं कि इस दौरान उनके साथ एक ट्रक चलता था जिसमें स्टेज, लाइट और कॉस्ट्यूम वगैरह होते थे। इसके बाद बिंदु ने एक बाद एक कई विदेशी दौरे किए। दस साल तक उन्होंने गुरू माधवी से नृत्य सीखा। इस बीच गुरु केलुचरण महापात्र का भी दिल्ली आना जाना होता था तो उनसे भी सीखने का मौका मिला और नृत्य समृद्ध हुआ।

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निजी जीवन और मंच पर जीवंत होती कला

दस साल कठोर प्रशिक्षण के बाद बिंदु के मन में ‘खुद की तलाश’ के साथ अकेले कैसे नृत्य को साधा जाए और उसे अपनी भाषा दी जाए- जैसे प्रश्न दिमाग में कुलबुलाने लगे। साथ मिला पति अभय फगरे का, जो उनके साथ बांसुरी बजाते थे और दिल्ली में फ्रीलांसिंग भी करते थे। इनका परिवार भोपाल में रहता था। अभय से प्रेम विवाह के सवाल पर बिंदु बताती हैं, “मैं संगीत से जुड़े व्यक्ति से ही शादी करना चाहती थी। मेरी गुरु माधवी ने पूरा सहयोग किया। अभय से जुड़े सवाल पर गुरु से जो जवाब मिले, पिता उनसे संतुष्ट हो गए और इस तरह हमारी शादी हो गई। नृत्य में संगीत बहुत जरूरी है। अगर अभय का साथ नहीं मिलता तो मैं इतनी लंबी यात्रा नहीं कर पातीं।”

शादी के एक साल बाद दोनों भोपाल आ गए। इस क्षेत्र की लोक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत से उनका परिचय हुआ जिससे उनकी नृत्य को नई संवेदनशीलता और सौंदर्य मिला। इस बीच अभय जी के जरिए बिन्दु की मुलाकात कुमार गंधर्व और बड़े गुलाम अली खां की वरिष्ठ शिष्या मीरा राव से हुई। उस वक्त वे नूतन कॉलेज में संगीत की विभागाध्यक्ष थीं। मीरा जी के सानिध्य में बिंदु का नृत्य और परिष्कृत हुआ। उनकी संगीत की समझ बढ़ी। इन्हीं के मार्फत बिंदु की मुलाकात संस्कृत की विदुषी अजीता त्रिवेदी से हुई। बिंदु कहती हैं, “नृत्य में दो चीजें महत्वपूर्ण हैं- टेक्स्ट और म्यूज़िक। ये दोनों चीजें मुझे मीरा जी और अजीता जी में मिलीं। ये दोनों मेरी गुरू समान हैं। मीरा जी तो संगीत की मीरा थी ही और अजीता जी संस्कृत की मीरा हैं।”

अपनी सूक्ष्मता और काव्यमय प्रस्तुति के कारण उनकी रचना ‘नर्मदा परिक्रमा’ अत्यंत सराही गई। जिसमें उन्होंने नर्मदा नदी की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक यात्रा को नृत्य के माध्यम से प्रस्तुत किया। बिंदु ने अपनी दो शिष्याओं कल्याणी और वैदेही के साथ इस प्रस्तुति से विशाल मंच को जीवंत बना दिया। ओडिसी की मनोहारी गतियों के माध्यम से नर्मदा की लहराती धारा, उसके विविध रूप और पर्वतों से बहते हुए उसके प्रवाह को अत्यंत सुंदर ढंग से दर्शाया गया। मीरा राव और अभय फगरे के मधुर संगीत और अजीता के मालवी और निमाड़ी “रेवा के तीर” और “सोहे धरा” जैसे गीतों ने इसकी कोमल सौंदर्यात्मकता को और अधिक प्रभावशाली बना दिया।

भारत और विदेशों में उनके नृत्य को उनकी गरिमा, सौंदर्य और भावपूर्ण प्रस्तुति के लिए सराहा गया। उन्होंने अमेरिका, यूरोप, ब्रिटेन, जर्मनी और ब्राजील में व्यापक रूप से प्रस्तुतियाँ दी हैं। उनके प्रमुख प्रस्तुतियों में महेश्वर मंदिर में बार-बार होने वाली प्रस्तुतियाँ, 2010 में अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा के लिए राष्ट्रपति भवन में प्रस्तुति, खजुराहो महोत्सव, आईआईसी एक्सपीरियंस 2009, श्रीलंका यात्रा, गुरुवायूर मंदिर महोत्सव, अमेरिका में फेस्टिवल ऑफ इंडिया और नई दिल्ली के पुराना किला में आयोजित अनन्या डांस फेस्टिवल शामिल हैं। उन्हें उनके कार्य के लिए सरकारी और निजी संस्थानों से अनेक फेलोशिप और अनुदान प्राप्त हुए हैं। उन्होंने ओडिसी में भाव-अभिनय को और मजबूत बनाने के लिए कथकली के प्रसिद्ध गुरु मार्गी विजयकुमार से भी प्रशिक्षण लिया, जिससे उनके नृत्य में गहराई और अभिव्यक्ति अधिक प्रभावशाली हो गई।

बिंदु की उपलब्धियां: नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा

बिंदु भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (ICCR) की सूचीबद्ध कलाकार तथा दूरदर्शन की ग्रेड-ए कलाकार हैं। शादी के बाद जब ये ससुराल आईं तो उनकी सास ने उनकी जेठ की बेटियों को ओडिसी नृत्य सिखाने का आग्रह किया। इस तरह घर की ही दो बेटियाँ - कल्याणी और वैदेही उनकी शिष्य बन गईं। वे कहती हैं, “सीमित मंच और कम अवसर मिलना चुनौतीपूर्ण रहा। इसकी वजह मेरा स्वाभिमान और आत्म सम्मान रहा क्योंकि मैं प्रोग्राम मांग नहीं पाई। दूसरा, हिन्दी पट्टी होने की वजह से ओडिसी सीखने के इच्छुक भी कम मिले। हालांकि मैं मानती हूं कि कला का स्वरूप बदल गया है। दूसरी तरफ आजकल के बच्चे ज़्यादा हुनरमंद और खुले दिमाग के हैं। काफी प्रयोग भी कर रहे हैं लेकिन उनके अंदर बेचैनी ज्यादा है। इसलिए सिखाना मेरे लिए मुश्किल होता है। ऐसे में कल्याणी और वैदेही मेरी मदद करती हैं।”

बिंदु अपने पिता को पहला गुरू मानती हैं। वे कहती हैं कि उनका संकल्प दो पीढ़ियों तक फलित हआ। उनके बेटे सारंग ने कम उम्र में ही बतौर शास्त्रीय गायक प्रसिद्धि अर्जित कर ली है, ओडिसी नृत्यांगना अंजलि मोहनदास उसकी जीवन संगिनी है। कला से समृद्ध केरल की मूल निवासी अंजलि ने पहले भरतनाट्यम सीखा और पिछले 10 सालों से बिंदु की शिष्या रहने के बाद अब उनकी बहू हैं।

फिलहाल बिंदु भोपाल में ऊर्ध्वम - सेंटर फॉर क्लासिकल आर्ट्स के माध्यम से नई पीढ़ी को पारंपरिक कलाओं से जोड़ने का काम कर रही हैं, जहां बांसुरी, गायन और नृत्य का प्रशिक्षण दिया जाता है।       

सन्दर्भ स्रोत : बिंदु जुनेजा से  विभा सिंह  की बातचीत पर आधारित 

© मीडियाटिक

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