केरल हाईकोर्ट : तलाक की अपील लंबित

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केरल हाईकोर्ट : तलाक की अपील लंबित
होने के बावजूद दूसरी शादी वैध

केरल हाईकोर्ट ने तलाक के बाद महिला के पुनर्विवाह को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि पूर्व पति तलाक के आदेश के खिलाफ निर्धारित समय सीमा समाप्त होने के बाद अपील दाखिल करता है, तो केवल इसी आधार पर महिला की दूसरी शादी को अवैध नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि देरी से दायर अपील महिला के दोबारा विवाह करने के कानूनी अधिकार पर रोक नहीं लगाती।

क्या है पूरा मामला?

मामला 2019 में हुई शादी से जुड़ा है। महिला ने पति और सास पर दहेज प्रताड़ना, मानसिक उत्पीड़न और क्रूरता के आरोप लगाते हुए फैमिली कोर्ट में तलाक की याचिका दायर की थी।

महिला के अनुसार, शादी के कुछ ही महीनों बाद उससे दहेज की मांग की जाने लगी। परिवार के दबाव में उसके पिता ने पति को पहले 5 लाख रुपये और बाद में 3 लाख रुपये दिए, लेकिन प्रताड़ना जारी रही। इसके बाद महिला मायके लौट गई और तलाक के साथ स्थायी गुजारा भत्ता देने की मांग की।

फैमिली कोर्ट में पति ने न तो लिखित जवाब दाखिल किया और न ही अपने पक्ष में कोई सबूत पेश किया। अदालत ने महिला की गवाही और दस्तावेजों के आधार पर तलाक मंजूर करते हुए पति को 20 लाख रुपये स्थायी गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया।

कोर्ट जाने में पति ने कर दी देरी

इसके बाद पति ने हाईकोर्ट में तलाक के फैसले को चुनौती दी, लेकिन उसने 12 दिन की देरी से अपील दाखिल की। अदालत ने देरी को माफ करते हुए अपील स्वीकार कर ली, हालांकि तलाक के आदेश पर कोई स्टे नहीं दिया।

इसी बीच महिला ने सितंबर 2025 में दूसरी शादी कर ली।

पति ने हाईकोर्ट में दलील दी कि अपील लंबित रहने के दौरान हुई दूसरी शादी अमान्य है। हालांकि जस्टिस एके जयशंकरण नांबियार और जस्टिस प्रीता एके की पीठ ने इस दलील को खारिज कर दिया।

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कोर्ट ने क्या कहा?

हाईकोर्ट ने कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम के तहत दूसरी शादी पर रोक तभी लागू होती है, जब तलाक के खिलाफ अपील कानून में तय समय सीमा के भीतर दायर की गई हो।

चूंकि इस मामले में अपील 12 दिन की देरी से दाखिल हुई थी और तलाक के आदेश पर कोई स्टे भी नहीं था, इसलिए महिला को दोबारा शादी करने का पूरा अधिकार था। अदालत ने स्पष्ट किया कि उसकी दूसरी शादी पूरी तरह वैध है।

हालांकि स्थायी गुजारा भत्ते के मुद्दे पर हाईकोर्ट ने अलग रुख अपनाया। अदालत ने कहा कि फैमिली कोर्ट ने पति की गैरमौजूदगी में 20 लाख रुपये का गुजारा भत्ता तय किया था। अब जबकि महिला पुनर्विवाह कर चुकी है, यह दोबारा जांचना जरूरी होगा कि वह स्थायी गुजारा भत्ते की कितनी हकदार है।

इसी आधार पर हाईकोर्ट ने 20 लाख रुपये के स्थायी गुजारा भत्ते के आदेश को रद्द करते हुए मामला दोबारा फैमिली कोर्ट को भेज दिया। अदालत ने निर्देश दिया कि दोनों पक्षों को सुनने के बाद दो महीने के भीतर गुजारा भत्ते के मुद्दे पर नया फैसला सुनाया जाए।

यह फैसला तलाक, पुनर्विवाह और स्थायी गुजारा भत्ता से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल माना जा रहा है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून द्वारा निर्धारित समय सीमा का पालन बेहद महत्वपूर्ण है और देरी से दायर अपील किसी व्यक्ति के वैध पुनर्विवाह के अधिकार को स्वतः प्रभावित नहीं कर सकती।

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