झारखंड हाईकोर्ट : जिंदगी के सामान्य उतार-चढ़ाव क्रूरता नहीं

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झारखंड हाईकोर्ट : जिंदगी के सामान्य उतार-चढ़ाव क्रूरता नहीं

झारखंड हाईकोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण तलाक मामले में पति की याचिका खारिज कर दी। यह मामला एक ऐसे दंपति का था जिनकी शादी 2011 में प्रेम विवाह के रूप में हुई थी, लेकिन बाद में उनके बीच गंभीर विवाद उत्पन्न हो गए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल नौकरी के कारण अलग-अलग राज्यों में रहना या पति-पत्नी के बीच आपसी सामंजस्य की कमी को क्रूरता नहीं माना जा सकता।

कोर्ट ने क्या कहा?

हाईकोर्ट की बेंच ने 10 अप्रैल को अपना आदेश जारी किया, जिसमें फैमिली कोर्ट के उस फैसले को सही ठहराया गया, जिसमें पति-पत्नी के दांपत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना का आदेश दिया गया था। इसका मतलब यह था कि पति-पत्नी को फिर से एक साथ रहकर अपना वैवाहिक जीवन शुरू करना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि शादीशुदा जीवन में छोटे-मोटे विवाद या स्वभाव का मेल न होना क्रूरता नहीं होता।

नौकरी और अलग रहने का मुद्दा

इस मामले में पति केंद्रीय सरकारी कर्मचारी हैं, जिनकी पोस्टिंग ओडिशा में थी, जबकि पत्नी झारखंड सरकार में काम करती थीं और उनकी पोस्टिंग झारखंड में थी। कोर्ट ने यह भी कहा कि पति की नौकरी ट्रांसफर योग्य है और वह चाहें तो पत्नी के पास दुमका में रह सकते हैं।

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दांपत्य अधिकार और कोर्ट का फैसला

कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि दांपत्य अधिकार केवल कानूनी नहीं होते, बल्कि यह विवाह की मूल भावना का हिस्सा होते हैं। यदि कोई पति या पत्नी बिना उचित कारण के अलग रहता है, तो दूसरा पक्ष कोर्ट में दांपत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना की मांग कर सकता है। कोर्ट ने कहा कि अगर कारण उचित नहीं हैं, तो वह एक साथ रहने का आदेश दे सकता है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 2011 में हुए एक प्रेम विवाह का था, जिसके बाद दोनों दंपति रांची में साथ रहे और फिर दुमका चले गए। 2015 में पत्नी को झारखंड में सरकारी नौकरी मिल गई, जिसके बाद पति-पत्नी के बीच विवाद बढ़ गए। 2016 में पति ने फैमिली कोर्ट में दांपत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना के लिए याचिका दायर की, और 2018 में फैमिली कोर्ट ने पति के पक्ष में फैसला सुनाया। पत्नी ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी, जो अब भी लंबित है।

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