पीरियड लीव को लेकर जारी बहस के बीच कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक अहम और स्पष्ट संदेश दिया है कि यह कोई एहसान नहीं बल्कि महिलाओं का अधिकार है।
पीरियड लीव पर हाईकोर्ट की दो टूक
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि कानून के अनुसार पुरुष और महिलाएं बराबर हैं, लेकिन जैविक (Biological) रूप से दोनों अलग हैं इसलिए महिलाओं की विशेष जरूरतों के लिए अलग प्रावधान करना बराबरी के खिलाफ नहीं है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पीरियड लीव को ‘विशेष सुविधा’ नहीं बल्कि अधिकार (Right) के रूप में देखा जाना चाहिए।
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क्या है पूरा मामला
यह मामला एक महिला कर्मचारी की याचिका पर सामने आया, जो एक होटल में काम करती है और उसे शारीरिक रूप से कठिन काम करना पड़ता है। महिला ने अदालत को बताया कि सरकार द्वारा बनाई गई पीरियड लीव पॉलिसी जमीनी स्तर पर लागू नहीं हो रही, खासकर असंगठित क्षेत्र में।
सरकार की पॉलिसी क्या कहती है
कर्नाटक सरकार ने दिसंबर 2025 में एक नीति लागू की थी, जिसके तहत- 18 से 52 वर्ष की कामकाजी महिलाओं को हर महीने 1 दिन की पेड पीरियड लीव. लेकिन अदालत ने पाया कि कई जगहों पर इस नीति का पालन नहीं किया जा रहा है।
हाईकोर्ट का आदेश
हाईकोर्ट ने सरकार को निर्देश दिया कि पीरियड लीव पॉलिसी को हर सेक्टर में लागू किया जाए। संगठित और असंगठित दोनों क्षेत्रों में इसका पालन सुनिश्चित हो। यह नीति सिर्फ कागजों तक सीमित न रहे।
सरकार की दलील और कोर्ट की प्रतिक्रिया
राज्य सरकार ने तर्क दिया कि असंगठित क्षेत्र बहुत बड़ा है और वहां नीति लागू करना मुश्किल है। हालांकि, अदालत ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि नीतियों का लाभ हर महिला तक पहुंचाना सरकार की जिम्मेदारी है।
बराबरी का असली मतलब
कोर्ट ने भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 का हवाला देते हुए कहा कि समानता का मतलब एक जैसा व्यवहार नहीं होता। जरूरत के अनुसार अलग सुविधा देना ही वास्तविक समानता है



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