कर्नाटक हाईकोर्ट :  पीरियड लीव

blog-img

कर्नाटक हाईकोर्ट :  पीरियड लीव
एहसान नहीं, महिलाओं का हक है

पीरियड लीव को लेकर जारी बहस के बीच कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक अहम और स्पष्ट संदेश दिया है कि यह कोई एहसान नहीं बल्कि महिलाओं का अधिकार है। 

पीरियड लीव पर हाईकोर्ट की दो टूक

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि कानून के अनुसार पुरुष और महिलाएं बराबर हैं, लेकिन जैविक (Biological) रूप से दोनों अलग हैं इसलिए महिलाओं की विशेष जरूरतों के लिए अलग प्रावधान करना बराबरी के खिलाफ नहीं है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पीरियड लीव को ‘विशेष सुविधा’ नहीं बल्कि अधिकार (Right) के रूप में देखा जाना चाहिए।

ये भी पढ़िए ....

हिमाचल हाईकोर्ट: दिहाड़ी महिला मजदूर को भी मातृत्व अवकाश लेने का हक

सुप्रीम कोर्ट : गोद लेने वाली महिला को भी मातृत्व अवकाश का हक

 

दिल्ली हाईकोर्ट : अब प्राइवेट स्कूलों की महिला टीचर्स को भी मिलेगी चाइल्ड केयर लीव

 

क्या है पूरा मामला

यह मामला एक महिला कर्मचारी की याचिका पर सामने आया, जो एक होटल में काम करती है और उसे शारीरिक रूप से कठिन काम करना पड़ता है। महिला ने अदालत को बताया कि सरकार द्वारा बनाई गई पीरियड लीव पॉलिसी जमीनी स्तर पर लागू नहीं हो रही, खासकर असंगठित क्षेत्र में।

सरकार की पॉलिसी क्या कहती है

कर्नाटक सरकार ने दिसंबर 2025 में एक नीति लागू की थी, जिसके तहत- 18 से 52 वर्ष की कामकाजी महिलाओं को हर महीने 1 दिन की पेड पीरियड लीव. लेकिन अदालत ने पाया कि कई जगहों पर इस नीति का पालन नहीं किया जा रहा है।

हाईकोर्ट का आदेश

हाईकोर्ट ने सरकार को निर्देश दिया कि पीरियड लीव पॉलिसी को हर सेक्टर में लागू किया जाए। संगठित और असंगठित दोनों क्षेत्रों में इसका पालन सुनिश्चित हो। यह नीति सिर्फ कागजों तक सीमित न रहे।

सरकार की दलील और कोर्ट की प्रतिक्रिया

राज्य सरकार ने तर्क दिया कि असंगठित क्षेत्र बहुत बड़ा है और वहां नीति लागू करना मुश्किल है। हालांकि, अदालत ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि नीतियों का लाभ हर महिला तक पहुंचाना सरकार की जिम्मेदारी है।

बराबरी का असली मतलब

कोर्ट ने भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 का हवाला देते हुए कहा कि समानता का मतलब एक जैसा व्यवहार नहीं होता। जरूरत के अनुसार अलग सुविधा देना ही वास्तविक समानता है

Comments

Leave A reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *



सुप्रीम कोर्ट : घरों की महिलाएँ सिर्फ घर
अदालती फैसले

सुप्रीम कोर्ट : घरों की महिलाएँ सिर्फ घर , नहीं संभालतीं राष्ट्र-निर्माण भी करती हैं

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, सड़क हादसे में गृहिणी की मौत के 25 साल बाद पति को 62.77 लाख रुपये मुआवजा, अन्य मामलों म...

दिल्ली हाईकोर्ट :  बेरोजगार बता बच्चे के खर्च से नहीं बच सकता पति
अदालती फैसले

दिल्ली हाईकोर्ट :  बेरोजगार बता बच्चे के खर्च से नहीं बच सकता पति

कोर्ट ने कहा, “अपने खर्चों का प्रबंधन करना प्रतिवादी यानी पति की जिम्मेदारी है।

त्रिपुरा हाईकोर्ट : पिता की मृत्यु के बाद तलाकशुदा
अदालती फैसले

त्रिपुरा हाईकोर्ट : पिता की मृत्यु के बाद तलाकशुदा , पुत्री पारिवारिक पेंशन की हकदार नहीं

त्रिपुरा हाईकोर्ट ने कहा कि पिता की मृत्यु के बाद तलाक लेने वाली पुत्री पारिवारिक पेंशन की पात्र नहीं होगी।

मप्र हाईकोर्ट : बेटियों को उच्च शिक्षा
अदालती फैसले

मप्र हाईकोर्ट : बेटियों को उच्च शिक्षा , से वंचित नहीं कर सकता पिता

मप्र हाईकोर्ट ने कहा कहा - महिला सशक्तिकरण हकीकत में हो बेटियों को उच्च शिक्षा से वंचित नहीं कर सकता पिता, पढ़ाई का खर्च...

दिल्ली हाईकोर्ट : तलाक के लिए एक साल
अदालती फैसले

दिल्ली हाईकोर्ट : तलाक के लिए एक साल , का इंतजार हर मामले में जरूरी नहीं

दिल्ली हाई कोर्ट ने विशेष विवाह अधिनियम के तहत तलाक के लिए एक साल की इंतजार अवधि को विशेष परिस्थितियों में माफ करने का अ...

सुप्रीम कोर्ट : कागजों पर जिंदा रिश्ते का कोई अर्थ नहीं
अदालती फैसले

सुप्रीम कोर्ट : कागजों पर जिंदा रिश्ते का कोई अर्थ नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने 15 साल से अलग रह रहे दंपति का विवाह समाप्त करते हुए मानसिक क्रूरता और टूट चुके वैवाहिक संबंधों को तलाक...