उड़ीसा हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि पत्नी द्वारा पति को छोड़ देने के आधार पर तलाक मिलने के बावजूद पति, भरण-पोषण देने की जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकता। अदालत ने कहा कि CrPC की धारा 125 (अब BNSS की धारा 144) के तहत ‘पत्नी’ की परिभाषा में तलाकशुदा महिला भी शामिल है, बशर्ते उसने पुनर्विवाह न किया हो। जस्टिस डॉ संजीव कुमार पाणिग्राही की पीठ ने कहा कि केवल ‘डेजर्शन’ (Desertion) के आधार पर तलाक मिलने से पत्नी के भरण-पोषण के अधिकार खत्म नहीं होते।
क्या है पूरा मामला
पति और पत्नी का विवाह 5 दिसंबर 2003 को हिंदू रीति-रिवाज से हुआ था। आरोप के अनुसार, पत्नी जनवरी 2004 में वैवाहिक घर छोड़कर चली गई और वापस नहीं लौटी। इसके बाद पति ने तलाक की याचिका दायर की। सुनवाई के दौरान पत्नी को अंतरिम भरण-पोषण (Pendente Lite) देने का आदेश दिया गया, लेकिन पति ने इसका पालन नहीं किया। इस कारण उसकी याचिका खारिज कर दी गई। इसके बाद पत्नी ने CrPC 125 के तहत अलग से केस दायर किया, जिसमें उसे ₹20,000 प्रति माह भरण-पोषण देने का आदेश मिला।
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कोर्ट में आगे क्या हुआ
• फैमिली कोर्ट ने पहले पति की तलाक याचिका खारिज की
• पत्नी की ‘वैवाहिक अधिकारों की बहाली’ की मांग स्वीकार की
• बाद में हाईकोर्ट ने 2023 में “त्याग” के आधार पर तलाक मंजूर किया
• पति द्वारा पहले दिए गए भुगतान को स्थायी गुजारा भत्ता माना गया इसके बाद पति ने भरण-पोषण देना बंद कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा मामला
पत्नी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा, लेकिन दोनों पक्षों को अन्य कानूनी उपाय अपनाने की छूट दी। इसके बाद पत्नी ने फिर से भरण-पोषण के लिए आवेदन किया, जिसे पति ने चुनौती दी।
हाईकोर्ट का अंतिम निर्णय
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि तलाक का आधार पत्नी का छोड़ देना हो, तब भी भरण-पोषण देना होगा।तलाकशुदा पत्नी, यदि पुनर्विवाह नहीं करती है, तो वह भरण-पोषण की हकदार है। यह प्रावधान सामाजिक न्याय और आर्थिक सुरक्षा के लिए है।
क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला
यह फैसला महिलाओं के अधिकारों को मजबूत करता है और यह सुनिश्चित करता है कि तलाक के बाद भी आर्थिक रूप से कमजोर महिला को संरक्षण मिले। यह भी साफ करता है कि भरण-पोषण का उद्देश्य सजा देना नहीं, बल्कि जरूरतमंद को सहारा देना है।



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