सुप्रीम कोर्ट : कार्यस्थल पर यौन शोषण,

blog-img

सुप्रीम कोर्ट : कार्यस्थल पर यौन शोषण,
हर जिले में  नियुक्त हों अधिकारी

कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन शोषण को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने चिंता जाहिर की है। सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बी वी नागरत्ना और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने इससे संबंधित मामले की सुनवाई की। उन्होंने हैरानी जताई कि 10 साल बाद भी कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध व निवारण) अधिनियम 2013 के प्रावधान सही से लागू नहीं हुए। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामले देखने के लिए हर जिले में अधिकारी नियुक्त किया जाए।

गोवा यूनिवर्सिटी के पूर्व विभागाध्यक्ष ऑरलियानो फर्नाडीस ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की थी। इस मामले में मई 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न रोकने के लिए बने कानून के प्रावधानों के लागू न होने पर कड़ी आपत्ति जताई थी। तब कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों को निर्देश दिया था कि इसके प्रावधानों को पूरी तरह से लागू करना सुनिश्चित किया जाए।

कोर्ट ने इस मामले में वकील पद्मा प्रिया को एमिकस क्यूरी नियुक्त किया था। सुप्रीम कोर्ट को बताया गया कि निर्देश के बावजूद प्रावधानों को लागू नहीं किया जा सका है। केंद्र ने निजी क्षेत्र को रेड फ्लैग जारी किया है क्योंकि वे इस एक्ट के प्रावधानों को लागू करने में हिचकिचा रहे हैं। खासतौर पर यौन उत्पीड़न से संबंधित शिकायतों की सुनवाई के लिए आंतरिक कमेटी का गठन करने के मुद्दे पर। जबकि इस कानून को सरकारी कार्यालयों के साथ-साथ निजी कंपनियों में भी प्रभावी रूप में लागू किया जाना चाहिए।

हेल्पलाइन नंबर 15100 पर शिकायत कर सकती हैं महिलाएं, ये हैं बड़े निर्देश

• सुप्रीम कोर्ट ने कहा, सभी राज्य सरकारें 31 दिसंबर 2024 तक हर जिले में अलग से अफसर नियुक्त करें।

• यह अधिकारी 31 जनवरी 2025 तक लोकल कम्प्लेंट कमेटी (एलसीसी) बनाए।

• अगर शिकायत स्वयं किसी नियोक्ता के खिलाफ है या आंतरिक शिकायत कमेटी गठित नहीं की गई है तो जिला अधिकारी एक समिति बनाए। यह काम 31 दिसंबर तक करें।

• जिला अधिकारी ग्रामीण या आदिवासी क्षेत्रों में प्रत्येक ब्लॉक तहसील/तालुका या शहरी क्षेत्रों में नगरपालिका में नोडल अफसर नियुक्त करें, ताकि शिकायतें 7 दिन में ही स्थानीय समिति को चली जाएं।

• पीड़ित कार्यस्थल पर यौन शोषण में शिकायत आसानी से दर्ज करा सकें, इसके लिए स्थानीय स्तर पर राज्य सरकार शी-बॉक्स पोर्टल बनाए।

• शी-बॉक्स पोर्टल पर मिली शिकायतों को आंतरिक शिकायत कमेटी और लोकल कम्प्लेंट कमेटी को तुरंत भेजें। \

• देश के हर सरकारी कार्यालय में अनिवार्य रूप से आंतरिक शिकायत कमेटी हो।

• सभी राज्यों के मुख्य सचिव इन निर्देशों का पालन करवाएं।

• मार्च 2025 तक सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी सभी दिशा- निर्देशों का पालन किया जाना चाहिए और इसकी रिपोर्ट सभी राज्य सुप्रीम कोर्ट को सौंपें।

• पीड़ित महिलाएं विधिक सेवा संस्थानों से मदद के लिए भी संपर्क कर सकती हैं।

• अगर पीड़िता स्थानीय शिकायत समिति तक पहुँचने में असमर्थ है तो वह हेल्पलाइन 15100 या अन्य तरीकों से शिकायत दर्ज करा सकती है। जरूरी मामलों में महिलाओं को पुलिस स्टेशन से संपर्क साधने में भी मदद की जाएगी।

पोश एक्टः कार्यस्थल पर आंतरिक शिकायत कमेटी जरूरी

वकील मनीष भदौरिया ने बताया कि कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न अधिनियम 2013 को संक्षेप में पोश एक्ट कहते हैं। इसके तहत कार्यस्थल पर किसी भी प्रकार के यौन उत्पीड़न की शिकायत को सुनने व निवारण के लिए आंतरिक शिकायत कमेटी बनाई गई। इसे जांच व कार्रवाई के व्यापक अधिकार हैं।

• मै भले ही दिल्ली से नहीं हूं, लेकिन अक्सर ट्रेन से कर्नाटक से दिल्ली तक की यात्रा करती रही हूं। मुझे यह अच्छी तरह पता है कि हर जगह क्या स्थिति होती जा रही है। इस कानून के प्रावधानों को पूरे देश में लागू करना ही होगा।

जस्टिस नागरत्ना, सुप्रीम कोर्ट

सन्दर्भ स्रोत : विभिन्न वेबसाइट

Comments

Leave A reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *



सुप्रीम कोर्ट : सेना में महिला अधिकारियों
अदालती फैसले

सुप्रीम कोर्ट : सेना में महिला अधिकारियों , को मिलेगा परमानेंट कमीशन

प्रणालीगत भेदभाव पर कोर्ट की सख्त टिप्पणी -कोर्ट ने माना कि महिलाओं के साथ लंबे समय से सिस्टम में भेदभाव हुआ जिससे उनके...

दिल्ली हाईकोर्ट : दिल का टूटना आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं
अदालती फैसले

दिल्ली हाईकोर्ट : दिल का टूटना आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं

महिला ने कोई सुसाइड नोट नहीं छोड़ा था, जिसमें अपीलकर्ता को दोषी ठहराया गया हो या इतना बड़ा कदम उठाने की कोई वजह बताई गई...

सुप्रीम कोर्ट : गोद लेने वाली महिला को भी मातृत्व अवकाश का हक
अदालती फैसले

सुप्रीम कोर्ट : गोद लेने वाली महिला को भी मातृत्व अवकाश का हक

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा- मातृत्व संरक्षण एक मूलभूत मानवाधिकार है. 

कर्नाटक हाईकोर्ट : दूसरी महिला के साथ
अदालती फैसले

कर्नाटक हाईकोर्ट : दूसरी महिला के साथ , लिव-इन में रहना शादी नहीं

हाई कोर्ट ने इसी के साथ दूसरी महिला और उसके बच्चों के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को भी रद्द कर दिया है। 

जबलपुर हाईकोर्ट :   'परंपरा' का हवाला देकर
अदालती फैसले

जबलपुर हाईकोर्ट :   'परंपरा' का हवाला देकर , बहुविवाह को वैध नहीं ठहराया जा सकता

कोर्ट ने कहा कि ऐसे दावे के लिए ठोस साक्ष्य जरूरी हैं। केवल आदिवासी परंपरा का हवाला देकर किसी महिला को पति की संपत्ति या...

केरल हाईकोर्ट : बिना किसी ठोस आधार के
अदालती फैसले

केरल हाईकोर्ट : बिना किसी ठोस आधार के , महिला के चरित्र पर कीचड़ उछालना सामाजिक हिंसा

अदालत ने यह भी कहा कि महिलाओं के सशक्तीकरण का मतलब यह नहीं है कि उन्हें संत बना दिया जाए।