दिल्ली हाईकोर्ट : बाल देखभाल अवकाश की भावना

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दिल्ली हाईकोर्ट : बाल देखभाल अवकाश की भावना
सर्वोपरि, मनमानी नहीं चलेगी

नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि महिला सरकारी कर्मचारियों को दी जाने वाली चाइल्ड केयर लीव (सीसीएल) का भले ही अधिकार के रूप में दावा नहीं किया जा सकता लेकिन मनमाने तरीके से इसे अस्वीकार भी नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि यह अवकाश नाबालिग बच्चों के कल्याण व मां की जरूरतों को ध्यान में रखकर दिया जाता है, इसके उद्देश्य और भावना को ध्यान में रखना चाहिए।

नियम के अनुसार पूरी सेवा के दौरान अधिकतम 730 दिनों की सीसीएल दी जा सकती है। जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस मधु जैन की खंडपीठ एक महिला शिक्षक की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। स्कूल की ओर से सीसीएल न देने के निर्णय को महिला ने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (सीएटी) में चुनौती दी, लेकिन वहां से राहत नहीं मिली। हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि जब स्कूल ने ईओएल दे दी तो सीसीएल से इनकार करना प्रशासनिक रूप से अनुचित है।

सीसीएल नहीं दी, ईओएल मंजूर

याचिकाकर्ता दिल्ली सरकार के अधीन एक सरकारी स्कूल में टीजीटी (गणित) के रूप में कार्यरत हैं। उन्होंने अपने दो बच्चों की देखभाल के लिए कई बार सीसीएल मांगी थी, क्योंकि उनके पति मरीन इंजीनियर होने के कारण आमतौर पर देश से बाहर रहते थे। स्कूल प्रिंसिपल ने गणित शिक्षक के स्थान पर कोई विकल्प उपलब्ध न होने का हवाला देकर उनका अनुरोध खारिज कर दिया। बाद में उन्हें सिर्फ 78 दिन की सीसीएल दी गई। सीसीएल अर्जी लंबित रहने पर उन्होंने एक्स्ट्रा-ऑर्डिनरी लीव (ईओएल) के लिए आवेदन किया, जिसे 303 दिन के लिए मंजूरी मिल गई।

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