दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि पहली शादी से औपचारिक तलाक की डिक्री नहीं होने पर भी दूसरी शादी में रह रही महिला को भरण पोषण पाने का अधिकार मिल सकता है। अदालत ने कहा कि CrPC की धारा 125 की व्याख्या सामाजिक न्याय को ध्यान में रखकर उदार तरीके से की जानी चाहिए।
फैमिली कोर्ट का आदेश बरकरार
जस्टिस Saurabh Banerjee ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा जिसमें पति को महिला को हर महीने 3 हजार रुपये भरण पोषण देने का निर्देश दिया गया था।
पति ने दी थी कानूनी चुनौती
पति ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा था that महिला कानूनी रूप से उसकी पत्नी नहीं है क्योंकि उसने अपनी पहली शादी की जानकारी छिपाई और पहले पति से तलाक लिए बिना दूसरी शादी कर ली।
महिला ने कोर्ट में क्या कहा
महिला की ओर से अदालत को बताया गया कि वह अपने पहले पति के साथ केवल एक महीने तक रही थी। इसके बाद लगभग 12 वर्षों तक उसका पहले पति से कोई संपर्क नहीं रहा। महिला ने यह भी कहा कि वर्तमान पति को उसकी पहली शादी की पूरी जानकारी थी।
कोर्ट ने साथ रहने को माना अहम आधार
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट ने मामले की गहराई से जांच की और पाया कि पति को महिला की पूर्व वैवाहिक स्थिति की जानकारी थी। दोनों लंबे समय तक खुले तौर पर पति पत्नी की तरह साथ रह रहे थे।
अदालत ने कहा कि जब विवाह और पति पत्नी की तरह साथ रहने का तथ्य स्वीकार किया गया है तब महिला को धारा 125 CrPC के तहत पत्नी माना जाएगा।
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सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी हवाला
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया के एन उषा रानी बनाम मूडुदुला श्रीनिवास मामले का भी हवाला दिया। उस फैसले में भी सुप्रीम कोर्ट ने दूसरी शादी में रह रही महिला को भरण पोषण का अधिकार दिया था।
सामाजिक न्याय का प्रावधान
अदालत ने कहा कि CrPC की धारा 125 सामाजिक न्याय से जुड़ा प्रावधान है जिसका उद्देश्य महिलाओं को आर्थिक तंगी और असुरक्षा से बचाना है। इसलिए ऐसे कल्याणकारी कानूनों की सख्त तकनीकी व्याख्या कर महिलाओं के अधिकार समाप्त नहीं किए जा सकते।
पति की याचिका खारिज
इन्हीं टिप्पणियों के साथ दिल्ली हाईकोर्ट ने पति की याचिका खारिज कर दी और फैमिली कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।



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