गीतों और नाटकों के जरिए लिंगभेद  मिटा रही कुमुद

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गीतों और नाटकों के जरिए लिंगभेद  मिटा रही कुमुद

बदरा झूम के आ गए रे, बे तो सोर मचा रए रे... बधाइयां जोर से गा रए रे, बिटिया आ गई रे... जैसे गीतों से बेटियों के स्वागत के सुर बदलने वाली कुमुद सिंह आज समाज में लिंगभेद को खत्म करने के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं। कुमुद ने लिंग समानता (जेंडर इक्वालिटी) को लेकर अपने काम की शुरुआत गीतों और नाटकों के माध्यम से की, जिनसे वे लोगों के दिलों तक पहुंचने में सफल हुईं। 

कुमुद बताती हैं, "लिंग असमानता मुझे हमेशा परेशान करती थी। मुझे लगा कि सिर्फ परेशान होकर कुछ नहीं होगा, बल्कि इसके लिए ठोस कदम उठाना होगा। जब कोई रास्ता नजर नहीं आया, तो मैंने अपनी 4 साल की बेटी को साथ लिया और लिंग आधारित भेदभाव (जेंडर बायस्डनेस) पर सवाल उठाने वाले गीत लिखकर चौराहों पर खड़ी हो गईं।" कुमुद ने इन गीतों के जरिए इस मुद्दे को समाज के हर हिस्से तक पहुंचाने की कोशिश की। 

इसके बाद, 2006 में कुमुद ने सरोकार’ नाम से एक संस्था की शुरुआत की, जिसका उद्देश्य असमानता को समाप्त करना था। उनका मानना था कि संवाद के माध्यम से समाज में बदलाव लाया जा सकता है। 

नाटक से शुरू हुई लड़ाई, जिसने हजारों जिंदगियां बदल दीं

कुमुद के काम की शुरुआत नाटकों से हुई। वे बताती हैं, "जब मैंने बस्तियों में काम करना शुरू किया, तो सबसे बड़ी समस्या बाल विवाह सामने आई। इसके समाधान के लिए बच्चों ने खुद नाटक लिखे और मोहल्लों में उसे प्रदर्शन किया। असली सफलता तब मिली, जब एक बच्ची का परिवार उसका बाल विवाह कराने लगा, तो वह नाटक के द्वारा सीखी गई बातें अपनी जिंदगी में अपनाकर विवाह रोकने में सफल रही।"  इसके अलावा, एक बच्ची जिसे अपने घर में दूसरी बेटी होने के कारण दूध तक नहीं मिलता था, आज वह राष्ट्रीय स्तर की बॉक्सर बन चुकी है। कुमुद का कहना है, "ऐसी सैकड़ों कहानियां हैं, जिन्होंने साबित किया कि अगर लिंगभेद मिट जाए तो किसी की जिंदगी भी बदल सकती है।"

कुमुद के नाटकों ने समाज में बदलाव की आहट दी, और यह साबित कर दिया कि शिक्षा और जागरूकता से ही लिंगभेद खत्म किया जा सकता है। 

'सोहर' बदलाव की पहल 

कुमुद ने एक और महत्वपूर्ण पहल की शुरुआत की, और वह थी सोहर  (सांस्कृतिक गीत) को बदलने की। अब तक ये गीत सिर्फ लड़कों के जन्म पर गाए जाते थे। कुमुद ने देशभर में इस पर प्रतियोगिताएं आयोजित की और अब उनके पास 12 भाषाओं में हजारों नए और सार्थक सोहर हैं, जो बेटियों के जन्म का भी स्वागत करते हैं। कुमुदकी यह यात्रा लिंगभेद और बाल विवाह के खिलाफ संघर्ष की मिसाल बन चुकी है, और उनके प्रयासों से समाज में एक नई जागरूकता की लहर चल पड़ी है।

सन्दर्भ स्रोत एवं छाया : कुमुद सिंह के फेसबुक अकाउंट से 

संपादन : मीडियाटिक डेस्क 

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